उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में दूध से बनने वाली पारंपरिक मिठाइयों की एक लंबी सूची है, जिसमें ब्राउन कलाकंद का नाम बेहद खास माना जाता है। सामान्य सफेद कलाकंद के मुकाबले इस मिठाई का स्वाद और रंगत पूरी तरह जुदा होती है। इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से फुल क्रीम दूध, ताजा पनीर या छेना, मावा, चीनी और हरी इलायची का इस्तेमाल किया जाता है। पारंपरिक तरीके से बनाने की शुरुआत दूध को बड़े बर्तन में उबालकर उसे अच्छी तरह गाढ़ा करने से होती है। इसके बाद इसमें पनीर और मावा मिलाया जाता है और पूरी प्रक्रिया धीमी आंच पर की जाती है ताकि सभी सामग्रियां आपस में रच-बस जाएं।
धीमी आंच और प्राकृतिक रंगत का कमाल
स्थानीय जानकार और व्यापारी सुनीता भट्ट का कहना है कि इस मिठाई की सबसे बड़ी विशेषता उसका प्राकृतिक रूप से भूरा रंग है। इस रंग को लाने के लिए किसी भी तरह के कृत्रिम रंगों का प्रयोग नहीं किया जाता है, बल्कि दूध और मावे को घंटों तक धीमी आंच पर पकाने की प्राकृतिक प्रक्रिया से यह रंगत खुद-ब-खुद उभरती है। जब कड़ाही में दूध और मावा लगातार पकते रहते हैं, तो उनमें मौजूद प्राकृतिक शर्करा और प्रोटीन के बीच एक खास कैरमलाइजेशन प्रक्रिया होती है, जिससे न सिर्फ मिठाई का रंग हल्का या गहरा भूरा होता है, बल्कि उसका स्वाद भी बिल्कुल अलग हो जाता है।
मखमली बनावट और दानेदार अहसास
सिर्फ रंग ही नहीं, बल्कि इसकी बनावट भी इस कलाकंद को दूसरी मिठाइयों से अलग खड़ा करती है। जब यह मिठाई पूरी तरह बनकर तैयार होती है, तो यह न तो हद से ज्यादा चिकनी होती है और न ही बहुत ज्यादा कठोर महसूस होती है। इसमें मुंह में घुल जाने वाले छोटे-छोटे दाने होते हैं, जबकि कुल मिलाकर मिठाई का टेक्सचर बेहद मुलायम रहता है। छेना या पनीर और मावे का सही संतुलन तथा दूध को गाढ़ा करते वक्त लगातार कड़ाही चलाना इस खास बनावट की मुख्य वजह है, जिसे पकने के बाद ठंडा करके जमाया जाता है.
पकाने की लंबी और सटीक प्रक्रिया
इस अनूठी मिठाई को तैयार करने में सामग्री के साथ-साथ पकाने की तकनीक का बहुत बड़ा हाथ होता है। इसे कभी भी तेज आंच पर नहीं पकाया जाता, वरना दूध और मावे के जलने का खतरा रहता है। पूरी कुकिंग धीमी आंच पर होती है और कारीगर को कड़ाही को लगातार चलाना पड़ता है ताकि मिश्रण बर्तन के तले से न चिपके। धीरे-धीरे जब सारा अतिरिक्त पानी सूख जाता है और मिश्रण गाढ़ा होने लगता है, तब इसमें चीनी और पनीर मिलाए जाते हैं, जिससे इसका स्वरूप निखरकर सामने आता है.
इलायची की खुशबू और आकर्षक सजावट
स्वाद और महक को और ज्यादा बढ़ाने के लिए इस कलाकंद में कुटी हुई इलायची का प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है। इलायची की भीनी-भीनी महक जब दूध और कैरमल जैसे सोंधेपन से मिलती है, तो उसका मेल लाजवाब होता है। पकने के बाद तैयार मिश्रण को एक साफ थाली या ट्रे में फैलाकर पूरी तरह सेट होने के लिए रख दिया जाता है। परोसने से पहले इसके ऊपर कटे हुए पिस्ते या अन्य मेवों के टुकड़े सजाए जाते हैं। ठंडा होने के बाद इसे धारदार चाकू से चौकोर या अपनी पसंद के अन्य आकारों में काट लिया जाता है, जिससे यह देखने में काफी सुंदर लगती है.
हर उम्र के लोगों की पहली पसंद
दूध और मावे के पारंपरिक स्वाद के शौकीनों के लिए यह मिठाई किसी बेहतरीन सौगात से कम नहीं है। इसकी मुलायम और हल्की दानेदार बनावट खाने वालों को एक अलग ही अनुभव कराती है। घर के छोटे बच्चों को इसका मीठा और क्रीमी स्वाद बेहद भाता है, वहीं बड़े लोग इसके सोंधेपन और गहरे कैरमल जैसे जायके की तारीफ करते नहीं थकते। हालांकि, इसे बनाने वाले के हाथ और विधि के छोटे-छोटे बदलावों से इसकी मिठास में हल्का अंतर आ सकता है, जो इसके पारंपरिक स्वाद को और अनूठा बनाता है.
उत्सव और मेहमाननवाजी की परंपरा
कुमाऊं की संस्कृति में दूध से बनी मिठाइयों का हमेशा से एक विशिष्ट स्थान रहा है। चाहे कोई पावन त्योहार हो, घर का कोई बड़ा पारिवारिक समारोह हो या फिर कोई अन्य मांगलिक अवसर, मेहमानों का मुंह मीठा कराने की पुरानी परंपरा यहां आज भी कायम है। ऐसे सभी खास मौकों पर ब्राउन कलाकंद को शान से परोसा जाता है। इसकी चौकोर कतलियां और ऊपर सजे हरे पिस्ते इसे मेहमानों के सामने रखने के लिए बेहद आकर्षक बनाते हैं। इसे लोग घर पर तो बनाते ही हैं, साथ ही स्थानीय मिष्ठान भंडारों से भी आसानी से खरीद सकते हैं.
पहाड़ी संस्कृति और खान-पान की विरासत
इस मिठाई को केवल एक पकवान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह पहाड़ों की समृद्ध खान-पान शैली का एक जीवंत उदाहरण है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मवेशियों के दूध और उससे बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल सदियों से जीवनशैली का अहम हिस्सा रहा है। स्थानीय लोगों की पसंद और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इस कलाकंद को अलग-अलग तरीकों से ढाला गया है, लेकिन लंबी पकाने की प्रक्रिया से मिलने वाला इसका सोंधापन इसकी ऐसी पहचान बन चुका है जो सदियों से चली आ रही है.




















