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उत्तराखंड के पहाड़ों में झूम उठे लोकगीत, महिलाओं ने शुरू की धान की रोपाईउत्तराखंड
3 जुल॰ 2026, 12:39 pm (45 दिन पहले)· 2

उत्तराखंड के पहाड़ों में झूम उठे लोकगीत, महिलाओं ने शुरू की धान की रोपाई

जुलाई की बारिश शुरू होते ही कुमाऊं के पहाड़ी गांवों में धान रोपाई का सीजन शुरू हो गया है, जहां पानी से भरे सीढ़ीदार खेतों में महिलाएं लोकगीत गाते हुए घंटों झुककर पौधे रोपती हैं.

जुलाई का महीना शुरू होते ही जब पहाड़ों में अच्छी बारिश होती है, तो कुमाऊं के गांवों में धान की रोपाई का काम तेजी पकड़ लेता है. सबसे पहले किसान खेतों की जुताई करते हैं और पडलिंग यानी कीचड़ तैयार करने का काम करते हैं, इसके बाद नर्सरी में तैयार की गई धान की पौध को उखाड़कर मुख्य खेतों में रोपा जाता है. पानी से लबालब भरे सीढ़ीदार खेत दूर से देखने पर बेहद खूबसूरत नजारा पेश करते हैं और हरियाली, बादलों तथा पहाड़ों के बीच यह रोपाई का दृश्य पर्यटकों और फोटोग्राफरों को भी अपनी ओर खींचता है. खेती के लिहाज से यह समय सबसे अहम माना जाता है क्योंकि सही समय पर रोपाई होने से धान की अच्छी पैदावार की उम्मीद बढ़ जाती है.

खेतों में महिलाओं की मेहनत

कुमाऊं के ज्यादातर गांवों में धान रोपाई की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर होती है. सुबह से शाम तक वे पानी से भरे खेतों में लगातार झुककर एक-एक पौधा हाथ से रोपती हैं. कई बार एक ही खेत की रोपाई पूरी करने में पूरा दिन निकल जाता है. घंटों कीचड़ में खड़े रहना और लगातार झुककर काम करना कमर, घुटनों और पैरों पर भारी दबाव डालता है, फिर भी महिलाएं पूरे जोश के साथ यह काम पूरा करती हैं. यही वजह है कि यह परंपरा आज भी पहाड़ी ग्रामीण जीवन की रीढ़ मानी जाती है और परिवार की खाद्य सुरक्षा में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम है.

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'परमा' यानी सामूहिक श्रम की परंपरा

पहाड़ों के कई गांवों में आज भी 'परमा' यानी सामूहिक श्रम की परंपरा जिंदा है. इसके तहत गांव की महिलाएं और परिवार बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों में रोपाई का काम करते हैं. एक दिन सभी लोग किसी एक किसान के खेत में जुटते हैं तो अगले दिन दूसरे किसान के खेत में काम करते हैं. इससे न सिर्फ मेहनत का बोझ बंट जाता है, बल्कि कम समय में ज्यादा खेतों की रोपाई भी पूरी हो जाती है. यह परंपरा सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों में सामाजिक एकता और आपसी सहयोग की मजबूत मिसाल भी मानी जाती है.

खेतों में गूंजते लोकगीत

पहाड़ों में धान की रोपाई सिर्फ कृषि कार्य नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का भी हिस्सा है. कई गांवों में महिलाएं रोपाई करते समय पारंपरिक कुमाऊंनी लोकगीत और झोड़े गाती हैं. इन गीतों से काम की थकान कम महसूस होती है और पूरे माहौल में उत्साह बना रहता है. स्थानीय महिला नारायणी देवी बताती हैं कि पहले लगभग हर गांव में रोपाई के दौरान गीतों की गूंज सुनाई देती थी. हालांकि बदलते समय के साथ यह परंपरा अब कुछ ही स्थानों तक सिमट गई है, फिर भी कई गांव आज भी इस सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं.

मशीनों की जगह अब भी हाथ ही सहारा

मैदानी इलाकों में धान की रोपाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, लेकिन कुमाऊं के अधिकांश सीढ़ीदार खेतों तक मशीनें आसानी से नहीं पहुंच पातीं. यहां खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे होते हैं और उनके बीच रास्ते भी संकरे होते हैं. यही कारण है कि आज भी हाथों से रोपाई सबसे व्यावहारिक तरीका मानी जाती है और यही वजह है कि परंपरागत कृषि पद्धति अब भी पहाड़ों में जिंदा है. अगर पर्वतीय क्षेत्रों के लिए हल्की और छोटी कृषि मशीनें विकसित की जाएं, तो भविष्य में किसानों को इससे राहत मिल सकती है.

बीज से लेकर पलायन तक, कई चुनौतियां

पहाड़ों में धान की खेती आसान नहीं मानी जाती. बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और जंगली जानवरों से फसल की सुरक्षा जैसी कई चुनौतियां किसानों के सामने लगातार बनी रहती हैं. युवाओं के पलायन के चलते खेतों में काम करने वाले हाथों की संख्या भी घटी है. इसके बावजूद कई परिवार सीमित संसाधनों के बीच भी अपनी परंपरागत खेती को बचाए हुए हैं. किसानों का कहना है कि अगर उन्हें बेहतर बाजार, उचित मूल्य और सरकारी सहायता मिले तो धान की खेती को और मजबूत बनाया जा सकता है.

प्राकृतिक सुंदरता और कृषि पर्यटन की संभावना

रोपाई के मौसम में कुमाऊं के गांव प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत नजारा पेश करते हैं. पानी से भरे सीढ़ीदार खेत, चारों ओर फैली हरियाली और बादलों से ढके पहाड़ किसी पेंटिंग जैसे दिखते हैं. यही वजह है कि कई प्रकृति प्रेमी और फोटोग्राफर इस मौसम में गांवों का रुख करते हैं. अगर स्थानीय स्तर पर कृषि पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए तो पर्यटक रोपाई की पारंपरिक प्रक्रिया को करीब से देख सकते हैं, जिससे ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय का एक नया स्रोत भी विकसित हो सकता है.

सांस्कृतिक पहचान बचाने की जरूरत

धान की पारंपरिक रोपाई सिर्फ खेती नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है. बदलती जीवनशैली, पलायन और खेती से घटती दिलचस्पी के चलते यह परंपरा धीरे-धीरे प्रभावित हो रही है. ऐसे में नई पीढ़ी को परंपरागत कृषि और स्थानीय खाद्य प्रणालियों से जोड़ना जरूरी हो गया है. अगर आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और स्थानीय ज्ञान का संतुलित इस्तेमाल किया जाए तो खेती को फायदे का सौदा बनाया जा सकता है. इससे न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि कुमाऊं की सदियों पुरानी कृषि संस्कृति भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी.

सवाल-जवाब

धान की रोपाई के लिए सबसे अच्छा समय कब माना जाता है?
जुलाई की शुरुआत में जब पहाड़ों में अच्छी बारिश होती है, तभी धान की रोपाई का काम तेज होता है और यही समय खेती के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.
कुमाऊं में धान रोपाई की मुख्य जिम्मेदारी किसकी होती है?
अधिकांश गांवों में धान रोपाई की मुख्य जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है, जो सुबह से शाम तक पानी से भरे खेतों में झुककर काम करती हैं.
'परमा' प्रथा क्या है?
'परमा' पहाड़ों में सामूहिक श्रम की परंपरा है, जिसमें गांव की महिलाएं और परिवार बारी-बारी से एक-दूसरे के खेतों में रोपाई का काम करते हैं.
कुमाऊं के खेतों में रोपाई के लिए मशीनों का इस्तेमाल क्यों नहीं होता?
खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे होते हैं और उनके बीच रास्ते संकरे होते हैं, जिस वजह से मशीनें आसानी से इन सीढ़ीदार खेतों तक नहीं पहुंच पातीं और हाथों से रोपाई ही व्यावहारिक तरीका है.
किसानों को धान की खेती में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, जंगली जानवरों से फसल की सुरक्षा और युवाओं के पलायन के कारण घटते खेतिहर हाथ, ये सब किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं.
नारायणी देवी कौन हैं और उन्होंने क्या बताया?
नारायणी देवी एक स्थानीय महिला हैं, जिन्होंने बताया कि पहले लगभग हर गांव में रोपाई के दौरान लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी, हालांकि अब यह परंपरा कुछ ही स्थानों तक सिमट गई है.
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