पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पहली बार इस निर्वाचन क्षेत्र में अपना परचम लहराया है। इस मुकाबले में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए, जहां बीजेपी उम्मीदवार शंखराव सरकार ने भारी बढ़त के साथ मुकाबला अपने नाम किया। वहीं दूसरी ओर, कभी इस इलाके में एकछत्र दबदबा रखने वाली पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस धड़े की हालत बेहद चिंताजनक रही और उनके प्रत्याशी को महज 3,847 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। साल 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के अंदर मचे अंदरूनी घमासान और विभाजन ने इस सीट पर तृणमूल के आधार को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है।
शंखराव सरकार की रिकॉर्ड जीत और प्रतिद्वंद्वियों का प्रदर्शन
इस उपचुनाव के अंतिम चुनावी नतीजों में बीजेपी प्रत्याशी शंखराव सरकार ने कुल 1,29,914 वोट हासिल किए। उन्होंने अपने सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद उर्फ रॉबिन को 75,816 मतों के भारी अंतर से मात देकर नया चुनावी इतिहास रचा। इस चुनावी मुकाबले में एजेयूपी के गुलाम नबी आजाद को कुल 54,098 मत मिले। यह सीट गुलाम नबी आजाद के पिता हुमायूं कबीर द्वारा खाली की गई थी, जिसके कारण यहां उपचुनाव कराना अनिवार्य हुआ था। वहीं कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल्लाहिल काफ़ी चुनावी दौड़ में काफी पीछे छूट गए और उन्हें केवल 6,168 वोट मिले। ममता बनर्जी के धड़े वाली तृणमूल कांग्रेस की ओर से उतरे रबीउल आलम चौधरी की स्थिति सबसे ज्यादा चौंकाने वाली रही, जो महज 3,847 वोट ही जुटा सके।
2021 के प्रचंड बहुमत से 3,847 वोटों तक का सफर
रेजीनगर निर्वाचन क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के पुराने चुनावी प्रदर्शन पर नजर डालें तो इस उपचुनाव के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। वर्ष 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इसी सीट से तृणमूल उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने 1,18,494 वोट पाकर शानदार जीत हासिल की थी। उस समय उन्हें कुल पड़े मतों का 56.31 प्रतिशत हिस्सा मिला था, जबकि दूसरे स्थान पर रही बीजेपी के उम्मीदवार अरबिंद बिस्वास को 50,226 वोट मिले थे। पांच वर्षों से भी कम समय में तस्वीर इतनी नाटकीय रूप से बदली कि जिस सीट पर तृणमूल भारी अंतर से कब्जा जमाती थी, वहां 2026 के उपचुनाव में ममता बनर्जी के धड़े का वोट बैंक पूरी तरह खिसक गया और पार्टी इकाई को महज 3,847 वोटों के न्यूनतम स्तर पर आना पड़ा।
2026 के आम चुनावों से ही शुरू हो गया था बिखराव
रेजीनगर में तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक आधार में गिरावट के स्पष्ट संकेत 2026 के राज्य विधानसभा आम चुनावों के दौरान ही सामने आ गए थे। उस चुनाव में आम जनता उन्नयन पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे हुमायूं कबीर ने 1,23,536 वोट लेकर शानदार जीत दर्ज की थी। उस समय बीजेपी उम्मीदवार बापन घोष 64,660 मत प्राप्त कर दूसरे स्थान पर रहे थे, जबकि तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी अताउर रहमान 41,718 वोटों के साथ तीसरे पायदान पर खिसक गए थे। 2026 के विधानसभा चुनावों के इन परिणामों ने साफ कर दिया था कि क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक जनाधार तेजी से दरक रहा है और हुमायूं कबीर के प्रभाव के साथ-साथ बीजेपी की जमीन लगातार मजबूत हो रही है। इस उपचुनाव ने उसी प्रक्रिया को अंतिम मुकाम तक पहुंचा दिया।
पार्टी विभाजन से ममता बनर्जी खेमे को लगा गहरा आघात
2026 के विधानसभा चुनावों में मिली व्यापक पराजय के पश्चात तृणमूल कांग्रेस के भीतर गहरा राजनीतिक संकट पैदा हो गया था। आंतरिक मतभेदों के चलते पार्टी दो अलग-अलग धड़ों में बंट गई और दोनों ने अलग राजनीतिक बैनर तले अपनी गतिविधियां शुरू कीं। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गुट ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के नाम से चुनावी मैदान में डटा रहा, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला दूसरा गुट डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के रूप में सामने आया। पार्टी के इस दोफाड़ होने का सीधा असर कैडर और मतदाताओं के मनोबल पर पड़ा। विभाजन के बाद रेजीनगर में ममता बनर्जी के धड़े के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी को मिले 3,847 वोट यह दर्शाते हैं कि पार्टी का पुराना संगठन जमीनी स्तर पर अपनी प्रभावशीलता पूरी तरह खो चुका है।
रेजीनगर का पिछला चुनावी इतिहास और बहुकोणीय मुकाबले
रेजीनगर सीट का अतीत हमेशा से कड़े और बहुकोणीय मुकाबलों का गवाह रहा है। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के रबीउल आलम चौधरी ने 79,770 वोट हासिल कर करीबी जीत दर्ज की थी, जबकि उस वक्त निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतरे हुमायूं कबीर को 74,210 वोट मिले थे। उस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी बेगम सिद्दिका को केवल 14,631 वोट और बीजेपी के बंकिम करमाकर को 10,771 वोट मिले थे। इससे पहले 2013 के उपचुनाव में भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में रबीउल आलम चौधरी ने 66,876 वोटों के साथ जीत दर्ज की थी। यह चुनावी पृष्ठभूमि बताती है कि एक दशक पहले तक यहां मुख्य संघर्ष कांग्रेस और स्थानीय नेताओं के बीच केंद्रित था, जिसके बाद तृणमूल ने बढ़त बनाई और अब बीजेपी ने विशाल बहुमत से इस सीट पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
बीजेपी का अभूतपूर्व उभार और तृणमूल के सामने अस्तित्व का सवाल
रेजीनगर के इस चुनावी नतीजे को राज्य की राजनीति में बीजेपी के लिए एक असाधारण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। 1,29,914 वोट जुटाकर पार्टी ने न केवल अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को मीलों पीछे छोड़ दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि वह नए और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी निर्णायक बढ़त बना रही है। दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस के लिए अपने गढ़ में 3,847 वोटों पर सिमट जाना एक गहरा संगठनात्मक झटका है। अब राज्य के राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर नजर रखे हुए हैं कि क्या बीजेपी इस ऐतिहासिक उपचुनाव जीत को स्थायी जनाधार में बदल पाएगी, और क्या ममता बनर्जी तथा ऋतब्रत बनर्जी के अलग हुए धड़े भविष्य में अपने मतभेदों को सुलझाकर अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने में सक्षम होंगे।


















