डिजिटल विज्ञापनों और जाली पॉलिसी दस्तावेजों की आड़ में लोगों की गाढ़ी कमाई हड़पने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। गाजियाबाद में क्राइम ब्रांच और साइबर क्राइम थाने की संयुक्त कार्रवाई में सात संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क ने भोले-भाले पॉलिसीधारकों से अब तक 40 लाख रुपये से ज्यादा की रकम ऐंठ ली है। पकड़े गए आरोपियों की शिनाख्त नीरज भाटी, नीरज सोलंकी, विक्रम सिंह, नितिन, सुशील कुमार, राहुल कुमार और विक्रांत सिंह के तौर पर की गई है। मौके से बरामदगी के दौरान पुलिस ने 4 मोबाइल फोन, 2 एटीएम व डेबिट कार्ड, 2 चेकबुक, एक बैंक पासबुक तथा 3000 रुपये नकद जब्त किए हैं।
जेल की सलाखों के पीछे रची गई थी पूरी साजिश
जांच अधिकारियों की पूछताछ में गिरोह के ताने-बाने से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। इस पूरे षड्यंत्र का मुख्य सूत्रधार दीपक खन्ना उर्फ डीजे बताया जा रहा है, जो मूल रूप से गाजियाबाद का निवासी है और मौजूदा समय में उत्तराखंड में ठिकाना बनाए हुए था। कानून के शिकंजे से बचने की फिराक में घूम रहे दीपक खन्ना और राहुल कुमार की पहली जान-पहचान गाजियाबाद स्थित डासना जेल में बंद रहने के दौरान हुई थी। जेल से रिहाई मिलते ही दोनों ने साइबर अपराध के जरिए तेजी से धन कमाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया।
फर्जी कॉल सेंटर के तौर-तरीकों का सहारा
गिरोह के अन्य सदस्यों नीरज भाटी, नीरज सोलंकी तथा विक्रांत सिंह के पास पहले से ऐसी धोखाधड़ी का व्यावहारिक अनुभव मौजूद था। ये तीनों पहले दिल्ली के एक कॉल सेंटर में मुलाजिम थे, जहां उन्होंने बीमा योजनाओं के नाम पर ग्राहकों को फांसने की कला सीखी थी। दिल्ली पुलिस द्वारा उस कॉल सेंटर पर छापा मारे जाने के बाद वे वहां से भाग निकले थे। बाद में राहुल ने इन तीनों का संपर्क दीपक खन्ना से कराया, जिसके बाद सभी मिलकर एक संगठित गिरोह की तरह सक्रिय हो गए।
सर्च विज्ञापनों और फोटो एडिटिंग से झांसा
यह गिरोह संभावित पीड़ितों को फंसाने के लिए एक सुनियोजित कार्यप्रणाली अपनाता था। जालसाज पहले फर्जी ईमेल आईडी तैयार करते थे और फिर जानी-मानी बीमा कंपनियों के नाम का दुरुपयोग करते हुए गूगल विज्ञापनों का सहारा लेते थे। इंटरनेट पर अपनी पॉलिसी रिन्यू कराने की तलाश कर रहे लोग जब विज्ञापनों में दिए गए नंबरों पर संपर्क करते, तो उन्हें भारी छूट का लालच दिया जाता था। जैसे ही ग्राहक उनके बताए खाते में पैसा जमा करते, आरोपी फोटो संपादन सॉफ्टवेयर की मदद से जाली बीमा प्रमाणपत्र तैयार करके उन्हें ईमेल पर भेज देते थे।
खाते जुटाने पर मिलता था पांच फीसदी हिस्सा
अवैध लेन-देन को छिपाने के लिए बैंक खातों का व्यापक नेटवर्क तैयार किया गया था। गिरफ्त में आए विक्रम सिंह उर्फ विक्की ने स्वीकार किया कि वह कमीशन का लालच देकर अन्य व्यक्तियों के बैंक खाते खुलवाता था और फिर उन खातों का पूरा ब्योरा मास्टरमाइंड दीपक खन्ना को सौंप देता था। इस काम के एवज में उसे ठगी गई कुल रकम का 5 प्रतिशत कमीशन मिलता था, जबकि बैंक खाता खुलवाने वाले व्यक्ति को भी 5 प्रतिशत हिस्सा दिया जाता था। विक्की ने अपने स्वयं के खातों के अतिरिक्त नितिन और सुशील के कुल 6 बैंक खाते दीपक को उपलब्ध कराए थे।
देश के कई हिस्सों में फैला था ठगी का जाल
जांच में पता चला है कि यह गिरोह पिछले 4 महीनों से लगातार वारदातों को अंजाम दे रहा था। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीआरपी (NCRP) पर दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, केरल और झारखंड समेत कई राज्यों के नागरिकों ने इस सिंडिकेट के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं। अकेले नीरज भाटी द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे मोबाइल नंबर को लेकर केरल में ढेरों शिकायतें मिली हैं। पुलिस अब इस वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े अन्य बैंक खातों, लेनदेन के रिकॉर्ड और बाकी सहयोगियों की पड़ताल में जुटी है, जबकि गिरोह के सरगना दीपक खन्ना की तलाश जारी है।



















