24 जून की उस तारीख को वेनेजुएला के लोग कभी नहीं भूल पाएंगे जब धरती इस तरह हिली कि संभलने का मौका तक नहीं मिला। वहां मौजूद लोगों को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि वे किसी सामान्य भूकंप का नहीं, बल्कि विज्ञान की दुनिया में बेहद दुर्लभ माने जाने वाले एक दोहरे भूकंप का सामना कर रहे थे। वेनेजुएला में उस दिन प्रकृति का एक ऐसा भयानक रूप देखने को मिला, जिसमें महज 39 सेकंड के भीतर 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो बड़े भूकंप दर्ज किए गए। पहला तीव्र झटका याराकुई को केंद्र बनाकर उठा था, जिसके कंपन से लोग अभी उबर भी नहीं पाए थे कि कुछ ही पलों बाद उसी क्षेत्र में उससे भी कहीं अधिक विनाशकारी दूसरा भूकंप आ गया। इस दोहरी मार ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया और देखते ही देखते कई हंसती-खेलती जिंदगियां मलबे के नीचे दफन हो गईं।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, ये दोनों ही भूकंप धरती की सतह से काफी कम गहराई पर आए थे। इनकी गहराई लगभग 10 से 20 किलोमीटर (6 से 12 मील) के बीच दर्ज की गई थी। कम गहराई पर होने के कारण भूकंपीय तरंगों की ऊर्जा बेहद आक्रामक रूप में सीधे सतह तक पहुंची, जिससे भारी तबाही हुई। इन झटकों का असर इतना व्यापक था कि इनकी थरथराहट वेनेजुएला की सीमाओं को लांघकर पड़ोसी देश कोलंबिया, उत्तरी ब्राजील और कैरिबियाई द्वीपों जैसे अरूबा, बोनेयर और कुराकाओ तक साफ महसूस की गई। वैसे तो इनमें से कोई एक भूकंप भी भारी तबाही मचाने के लिए पर्याप्त था, लेकिन इन दोनों झटकों के एक के बाद एक लगातार आने से ऐसी विनाशकारी स्थितियां पैदा हो गईं जिसने कंक्रीट की मजबूत इमारतों को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया। इस भीषण आपदा के बाद मलबे में दबे जीवित लोगों को बाहर निकालने के प्रयास लगातार जारी हैं, लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है, मरने वालों का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है।
याराकुई में तबाही की आंखों देखी दास्तां
भूकंप के उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए कानास बताती हैं कि वे अपने घर में बैठी थीं जब अचानक भोजन की मेज हिलने लगी। शुरुआत में उन्हें लगा कि यह कोई सामान्य झटका है, लेकिन देखते ही देखते कंपन बेहद हिंसक हो गया। दीवारों में गहरी दरारें पड़ने लगीं और छत का प्लास्टर टूट-टूटकर नीचे गिरने लगा। ऐसा लग रहा था कि पूरी इमारत ही उनके ऊपर जमींदोज हो जाएगी। इस भयानक स्थिति में कानास और उनका परिवार किसी तरह हिम्मत जुटाकर बाहर भागा। वे इमारत के ठीक सामने बने एक खेल के मैदान में पहुंचे, जहां उनके पड़ोस के अन्य लोग भी घबराए हुए इकट्ठा हो रहे थे। लेकिन राहत की सांस लेने से पहले ही धरती एक बार फिर से कांप उठी और लोग दहशत में आ गए।
कानास ने बताया कि उस मैदान में मौजूद सभी लोग बुरी तरह डरे हुए थे और एक-दूसरे को गले लगाकर रो रहे थे, क्योंकि वे इस तरह की विनाशकारी आपदाओं के आदी नहीं हैं। वे कहती हैं कि मैक्सिको और चिली जैसे देशों में भूकंप से निपटने के लिए एक व्यवस्थित तैयारी और सुरक्षा संस्कृति मौजूद है। वहां जब भी कोई अलार्म बजता है या कंपन महसूस होता है, तो लोग पहले से जानते हैं कि उन्हें खुद को बचाने के लिए क्या करना है। इसके विपरीत, वेनेजुएला के लोगों में इस तरह की आपदाओं को लेकर कोई खास तैयारी नहीं थी, जिसके कारण वहां अफरा-तफरी का माहौल बहुत ज्यादा बढ़ गया।
टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल का वैज्ञानिक विश्लेषण
कानास की आपबीती वेनेजुएला और उन देशों के बीच के बड़े अंतर को उजागर करती है जहां लगातार भूकंप आते रहते हैं। भौगोलिक रूप से वेनेजुएला कैरिबियन प्लेट और दक्षिण अमेरिकी प्लेट की सीमा पर स्थित है। इसके बावजूद, इस क्षेत्र में इतनी उच्च तीव्रता वाले भूकंपीय झटके आना काफी दुर्लभ माना जाता है। इस भौगोलिक संरचना और टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों को समझने के लिए मैक्सिको की इबेरो-अमेरिकन यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियर और ढांचागत क्षति मूल्यांकन विशेषज्ञ एलन डेमियन सांचेज़ पुलिडो ने विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन प्लेटों की स्थिति और उनकी गतिशीलता ही यह तय करती है कि इस क्षेत्र में भूकंप बार-बार क्यों नहीं आते, और जब आते हैं तो वे इतने विनाशकारी क्यों साबित होते हैं।
विशेषज्ञ एलन डेमियन सांचेज़ पुलिडो के अनुसार, वेनेजुएला में कैरिबियन प्लेट और दक्षिण अमेरिकी प्लेट के बीच समानांतर या पार्श्व गति होती है। इसका मतलब यह है कि ये प्लेटें आपस में टकराने के बजाय एक-दूसरे के बगल से रगड़ते हुए आगे बढ़ती हैं। यही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से इतने कम समय के भीतर इतनी बड़ी तीव्रता के दो लगातार भूकंप देखने को मिले। यह प्रक्रिया मैक्सिको से काफी अलग है, जहां कोकोस प्लेट सीधे उत्तरी अमेरिकी प्लेट के नीचे समा जाती है, जिसे सबडक्शन कहा जाता है। वेनेजुएला में होने वाली पार्श्व हलचल के परिणाम बिल्कुल अलग होते हैं। हालांकि यह एक अत्यंत दुर्लभ भूवैज्ञानिक घटना है, लेकिन इसकी संभावना को कभी नकारा नहीं जा सकता। दुनिया में जहां कहीं भी टेक्टोनिक प्लेटों का आपस में संपर्क होता है, वहां ऐसी घटनाएं घटित हो सकती हैं।
39 सेकंड के अंतराल ने कैसे बदला विनाश का पैमाना
इस पूरी घटना में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि दो बड़े भूकंपों के बीच केवल 39 सेकंड का अंतर था। ढांचागत मामलों के विशेषज्ञ एलन डेमियन सांचेज़ पुलिडो का मानना है कि इतने कम समय के अंतराल ने ही इस आपदा को इतना भयानक और जानलेवा बना दिया। वे समझाते हैं कि जब पहला भूकंप आया, तो उससे कई इमारतों के ढांचे को कुछ न कुछ नुकसान जरूर पहुंचा था। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी इमारतें तुरंत गिर गईं, लेकिन शुरुआती झटके ने उनके मूल कंक्रीट और लोहे के ढांचे की उस मजबूती को कमजोर कर दिया, जिसके आधार पर उन्हें डिजाइन किया गया था।
जब एक भूकंप के तुरंत बाद उसी तीव्रता का दूसरा झटका आता है, तो इंजीनियरों या प्रशासन को उन इमारतों का निरीक्षण करने, उन्हें सहारा देने या उनकी मरम्मत करने का कोई मौका नहीं मिलता। परिणामस्वरूप, पहले से ही कमजोर हो चुके ढांचे दूसरे झटके का दबाव बिल्कुल नहीं झेल पाते और पूरी तरह ध्वस्त हो जाते हैं। यही वजह थी कि लोग अपनी आंखों के सामने बहुमंजिला इमारतों को जमींदोज होते देख रहे थे।
अल्टामिरा क्षेत्र में रहने वाले एडुआर्डो बर्गर ने भी अपनी आंखों से ऐसा ही खौफनाक नजारा देखा था। वे बताते हैं कि उनके सामने ही सैन मिगुएल नाम की एक इमारत ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। पहली और दूसरी मंजिल की दीवारें टूटकर सीधे उसी जगह पर गिरीं जहां वे कुछ सेकंड पहले खड़े थे। अपनी जान बचाने के लिए जब वे और एक अन्य व्यक्ति सड़क के बीच की ओर भागे, तब उन्होंने देखा कि पास की एक पूरी इमारत किसी पेंडुलम की तरह इधर-उधर डोल रही थी। वह नजारा इतना डरावना था कि उसे याद करके आज भी रूह कांप जाती है।
रेजोनेंस का भौतिक सिद्धांत और मिट्टी का प्रभाव
इस आपदा में यह भी देखा गया कि एक ही सड़क पर स्थित कुछ इमारतें मलबे में बदल गईं, जबकि उनके ठीक बगल में बनी अन्य संरचनाएं सुरक्षित खड़ी रहीं। इस अंतर को स्पष्ट करते हुए सांचेज़ पुलिडो ने रेजोनेंस यानी अनुनाद के सिद्धांत के बारे में बताया। भौतिक विज्ञान के नियमों के अनुसार, हर इमारत की अपनी एक प्राकृतिक कंपन आवृत्ति होती है, जिसे वाइब्रेशन पीरियड कहा जाता है। जब भूकंप से निकलने वाली ऊर्जा की आवृत्ति इमारत की इस प्राकृतिक आवृत्ति से मेल खा जाती है, तो रेजोनेंस की स्थिति पैदा होती है। यह प्रक्रिया इमारत के हिलने की गति को कई गुना बढ़ा देती है। इसे एक उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने कहा कि यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी गायक की आवाज की तीखी आवृत्ति जब कांच के गिलास की प्राकृतिक आवृत्ति से मेल खाती है, तो वह गिलास टूट जाता है।
जब कोई इमारत भूकंपीय तरंगों के साथ रेजोनेंस करने लगती है, तो उसकी अपनी बनावट की मजबूती या डिजाइन का अच्छा-बुरा होना बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता। इस प्रभाव के कारण सामान्य रूप से थोड़ा-बहुत हिलने वाली इमारत भी इतनी हिंसक तरीके से डोलने लगती है कि उसका गिरना तय हो जाता है। इसके अलावा, इमारतों के बचने या गिरने के पीछे एक और बड़ा कारण उस जमीन की मिट्टी का प्रकार है जिस पर उन्हें खड़ा किया गया है। पथरीली, रेतीली, नरम या चिकनी मिट्टी भूकंपीय तरंगों के व्यवहार को बदल देती है।
सांचेज़ पुलिडो ने बताया कि वेनेजुएला के निर्माण नियमों में मिट्टी के इन प्रकारों को लेकर उस स्तर का बारीक विवरण शामिल नहीं है जो अन्य भूकंप संभावित देशों में देखा जाता है। उदाहरण के लिए, मैक्सिको सिटी में वहां के इंजीनियरिंग संस्थान द्वारा विकसित विशेष उपकरणों की मदद से मिट्टी के व्यवहार का सटीक अध्ययन किया जाता है, और उसी के आधार पर इमारतों का डिजाइन तैयार होता है। वेनेजुएला के नियमों में इस बारीकी की कमी साफ दिखाई देती है, जो इस तरह के असाधारण दोहरे भूकंप के दौरान इमारतों के ढहने की बड़ी वजह बनी।
विस्थापन का संकट और राहत कार्यों की चुनौतियां
एक तरफ जहां भूवैज्ञानिक और इंजीनियर इस तबाही के कारणों का विश्लेषण करने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ हजारों बेघर परिवार इस असमंजस में जी रहे हैं कि वे कभी अपने घरों को लौट भी पाएंगे या नहीं। काराकास की रहने वाली कानास की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। वे बताती हैं कि हालांकि उनका पूरा परिवार सुरक्षित है, लेकिन वे अपने घर से दूर शरण लेने को मजबूर हैं। उनके फ्लैट और पूरी इमारत के मुख्य ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचा है और वे अभी भी किसी सरकारी एजेंसी के आने और इमारत की सुरक्षा का आकलन करने का इंतजार कर रही हैं।
ऐसी ही पीड़ा 55 वर्षीय कैरोलिना अरमास की भी है। भूकंप के बाद वे अपने परिवार के साथ बाहर आ गईं और फिलहाल एक रिश्तेदार के घर में रह रही हैं। वे सिविल प्रोटेक्शन टीम द्वारा उनकी इमारत के निरीक्षण का इंतजार कर रही हैं। कैरोलिना बताती हैं कि उनकी इमारत में बहुत गहरी दरारें आ गई हैं। उन्होंने खुद सिविल प्रोटेक्शन विभाग को फोन करके नुकसान के आकलन की मांग की थी, लेकिन 12 घंटे से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी कोई अधिकारी वहां नहीं पहुंचा।
राहत कार्यों के बारे में बात करते हुए एडुआर्डो बर्गर ने बचाव दल और स्थानीय लोगों के प्रयासों की सराहना तो की, लेकिन उन्होंने यह भी माना कि शुरुआती घंटों में आपदा प्रबंधन और समन्वय की भारी कमी थी। इसके अलावा, मलबे को हटाने के लिए जरूरी उपकरणों की कमी ने भी रेस्क्यू ऑपरेशन को धीमा कर दिया। कई स्वयंसेवकों के पास कंक्रीट काटने और भारी स्लैब हटाने के बुनियादी औजार तक उपलब्ध नहीं थे।
इस कमी को अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता संगठन प्रोजेक्ट होप ने भी रेखांकित किया है। संगठन के अनुसार, प्रभावित इलाकों में दवाओं, पट्टियों, टांके लगाने की सामग्रियों और मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए विशेष उपकरणों की भारी कमी है और इनकी तत्काल आपूर्ति बेहद जरूरी है। इस मुश्किल घड़ी में वेनेजुएला के आम नागरिकों ने खुद आगे बढ़कर मोर्चा संभाला है और वे राहत सामग्री बांटने से लेकर लापता लोगों की तलाश के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने तक का काम खुद कर रहे हैं।
वैश्विक सहायता और भविष्य के लिए सबक
वेनेजुएला में मची इस तबाही को देखते हुए दुनिया के कई देश मदद के लिए आगे आए हैं। अमेरिका ने इस मानवीय संकट से निपटने के लिए 150 मिलियन डॉलर की सहायता राशि देने की घोषणा की है। इसमें से 50 मिलियन डॉलर की राशि वर्ल्ड विज़न और समैरिटन्स पर्स जैसे संगठनों के माध्यम से सीधे जमीन पर राहत पहुंचाने के लिए उपयोग की जाएगी, जबकि शेष 100 मिलियन डॉलर की राशि संयुक्त राष्ट्र के वेनेजुएला सहायता कोष में जमा की जाएगी। इसके अलावा, मैक्सिको ने अपनी मिनिस्ट्री ऑफ नेशनल डिफेंस के 250 विशेष जवानों, 5 प्रशिक्षित खोजी कुत्तों, 4 विमानों और मलबे में खोजने वाले 1 बचाव ड्रोन को वेनेजुएला भेजा है। स्पेन ने भी अपनी मिलिट्री इमरजेंसी यूनिट की टीमों और राहत कार्यकर्ताओं को वहां तैनात किया है ताकि खोज और बचाव कार्यों को गति दी जा सके।
विशेषज्ञ एलन डेमियन सांचेज़ पुलिडो का मानना है कि इस भयानक त्रासदी से भविष्य के लिए सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि हमें अपने समाज में आपदा से बचाव की एक मजबूत संस्कृति विकसित करनी होगी। वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि अक्सर लोग भूकंप के बीत जाने के बाद ही सचेत होते हैं, और जब लंबे समय तक कोई बड़ी आपदा नहीं आती, तो सुरक्षा ड्रिल करना और सिविल प्रोटेक्शन के नियमों का पालन करना बंद कर देते हैं। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की सटीक भविष्यवाणी करना असंभव है, इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह पता होना चाहिए कि संकट के उन पलों में तुरंत और सही तरीके से कैसे प्रतिक्रिया देनी है ताकि जानमाल के नुकसान को कम से कम किया जा सके।













