अमेरिकी प्रशासन और देश के मीडिया घरानों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। इस बार इस बड़े विवाद की धुरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सबसे सुरक्षित माना जाने वाला विमान एयर फोर्स वन है। विमान की सुरक्षा से जुड़ी कुछ बेहद संवेदनशील जानकारियां सार्वजनिक होने के बाद सरकारी मशीनरी अचानक हरकत में आ गई है। न्यूयॉर्क के एक प्रमुख अखबार के कई वरिष्ठ पत्रकारों को कोर्ट की तरफ से समन जारी किए गए हैं और उन्हें जल्द ही जांच दल के सामने पेश होने का आदेश दिया गया है। राष्ट्रपति के इस नए विमान को लेकर हुए खुलासों ने सुरक्षा चक्र पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके बाद प्रशासन इस बात की तह तक जाने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है कि आखिर ये गोपनीय जानकारियां मीडिया तक कैसे पहुंचीं।
फेडरल एजेंटों की कार्रवाई और पत्रकारों को अदालती समन
अमेरिकी इतिहास में मीडिया की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच टकराव का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। फेडरल एजेंटों ने सीधे उन पत्रकारों के घरों का रुख किया जिन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए विमान की सुरक्षा खामियों को उजागर करने वाली खबरें लिखी थीं। इन पत्रकारों को सीधे अदालती समन थमाए गए हैं, जिसमें उन्हें आने वाले बुधवार को मैनहट्टन की फेडरल ग्रैंड जूरी के सामने हाजिर होने का सख्त निर्देश दिया गया है। जिन पत्रकारों को इस जांच के दायरे में लिया गया है, उनमें जूलियन ई. बार्न्स, एरिक लिप्टन, टायलर पेजर और एरिक श्मिट जैसे बड़े और प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं।
प्रशासन और उसकी जांच एजेंसियां किसी भी कीमत पर उन अनाम सूत्रों की पहचान करना चाहती हैं जिन्होंने मीडिया को यह बेहद संवेदनशील जानकारियां उपलब्ध कराईं। आशंका जताई जा रही है कि ये सूत्र सरकार या अमेरिकी सेना के भीतर उच्च पदों पर बैठे हो सकते हैं, जिनके पास देश के सबसे सुरक्षित विमान की तकनीकी और रणनीतिक जानकारी तक सीधी पहुंच थी। यह कानूनी कदम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अमेरिकी प्रशासन इस सुरक्षा चूक और जानकारी के लीक होने को कितनी गंभीरता से ले रहा है।
वे दो संवेदनशील रिपोर्ट जिन्होंने खड़ा किया सियासी तूफान
इस पूरे विवाद की जड़ में दो अलग-अलग विस्तृत रिपोर्ट हैं, जिन्होंने वाशिंगटन के गलियारों में खलबली मचा दी है। पहली रिपोर्ट अमेरिकी राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार सर्वोच्च एजेंसी सीक्रेट सर्विस की अंदरूनी चेतावनियों से संबंधित है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सीक्रेट सर्विस ने ईरान के साथ बढ़ते सैन्य और कूटनीतिक तनाव के मद्देनजर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक महत्वपूर्ण सलाह दी थी। सुरक्षा एजेंसी का मानना था कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्रपति को कतर द्वारा उपहार में मिले इस नए विमान का उपयोग अस्थायी रूप से रोक देना चाहिए, क्योंकि इससे सुरक्षा संबंधी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
दूसरी रिपोर्ट तकनीकी रूप से और भी अधिक गंभीर थी, जिसने विमान की वास्तविक सुरक्षा क्षमता पर ही सवालिया निशान लगा दिया। इसमें विस्तार से बताया गया कि कतर से उपहार में मिले इस नए बोइंग विमान में वे अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणालियां और एंटी-मिसाइल सुरक्षा तंत्र मौजूद नहीं हैं, जो आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति के पुराने एयर फोर्स वन बेड़े में शामिल विमानों में होते हैं। इसका सीधा मतलब यह था कि यदि इस विमान पर कोई मिसाइल हमला होता है, तो यह उससे निपटने या खुद का बचाव करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। लगभग 40 करोड़ डॉलर की भारी-भरकम लागत वाले इस विमान में ऐसी बुनियादी सुरक्षा प्रणालियों की कमी ने रक्षा विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है।
तुर्की से लेकर ब्रिटेन तक विमानों की रहस्यमयी अदला-बदली
यह सुरक्षा विवाद केवल कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हाल ही में अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान इसके व्यावहारिक संकेत भी देखने को मिले। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसी हफ्ते तुर्की में आयोजित NATO सम्मेलन में भाग लेने के लिए इसी नए विमान से रवाना हुए थे। लेकिन जब सम्मेलन के बाद उनके काफिले को तुर्की से इंग्लैंड के मिल्डेनहॉल एयर बेस के लिए उड़ान भरनी थी, तो अचानक एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाला निर्णय लिया गया। राष्ट्रपति ने नए विमान को छोड़कर अचानक अपने पुराने प्रेसिडेंशियल विमान में सफर करने का फैसला किया।
इस दौरान दोनों ही विमानों ने ब्रिटेन के लिए उड़ान भरी। इसके बाद जब राष्ट्रपति को ब्रिटेन से वापस वाशिंगटन लौटना था, तो वे एक बार फिर नए विमान में सवार हो गए। विमानों की यह रहस्यमयी अदला-बदली ठीक उसी नाजुक समय पर हुई जब अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा अस्थाई सीजफायर पूरी तरह से टूट चुका था। अमेरिका ने ईरान पर नए सिरे से हवाई हमले शुरू कर दिए थे, जिसके जवाब में तेहरान की ओर से भी खाड़ी देशों को निशाना बनाकर जवाबी सैन्य कार्रवाइयां की जा रही थीं। युद्ध जैसी इन परिस्थितियों के बीच विमानों के इस बदलाव ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया कि 40 करोड़ डॉलर के इस विमान में वास्तव में अभी वे सभी सुरक्षा मानक पूरे नहीं हो पाए हैं जो अत्यधिक संवेदनशील सैन्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
व्हाइट हाउस का बचाव और ट्रंप का चिरपरिचित अंदाज
एक तरफ जहां मीडिया और राजनीतिक हलकों में विमान की सुरक्षा को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, वहीं खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन सभी आशंकाओं और दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन खबरों को पूरी तरह से बकवास और मनगढ़ंत करार दिया। उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए लिखा कि इंग्लैंड में उनके रुकने का मुख्य उद्देश्य वहां तैनात अमेरिकी सैनिकों को यह नया और शानदार विमान दिखाना था, न कि कोई सुरक्षा डर। जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों ने उनसे ईरान से मिलने वाले संभावित खतरे और विमान बदलने के कारणों पर सीधे सवाल पूछे, तो ट्रंप ने अपने मजाकिया लहजे में कहा कि उन्हें हमेशा ही खतरा रहता है और वे दुश्मनों की सूची में पहले नंबर पर हैं।
इसके साथ ही व्हाइट हाउस के प्रवक्ता स्टीवन चेउंग ने भी आधिकारिक रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि नया एयर फोर्स वन पूरी तरह से आधुनिक है और इसमें सभी उच्च-सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है। प्रवक्ता ने सुरक्षा रणनीतियों का खुलासा करते हुए एक बेहद दिलचस्प पहलू सामने रखा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अक्सर ध्यान भटकाने और गुमराह करने वाली रणनीतियों का सहारा लिया जाता है, और यात्रा के दौरान विमानों की अदला-बदली करना भी इसी व्यापक सुरक्षा योजना का एक सोचा-समझा हिस्सा था।











