अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर चीन को सीधी चेतावनी दी है और कहा है कि पनामा नहर पर कब्जा जमाने की कोशिश किसी भी सूरत में कामयाब नहीं होने दी जाएगी। ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही यह साफ कर दिया था कि अमेरिका को सबसे ऊपर रखा जाएगा और इसके लिए वे हर मोर्चे पर लड़ने को तैयार हैं। इस बार निशाने पर है दुनिया के सबसे अहम जलमार्गों में गिना जाने वाला पनामा नहर, और सामने खड़ा है उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी चीन।
उत्तरी डकोटा से चीन को सीधी वॉर्निंग
ट्रंप ने पनामा नहर को दुनिया का सबसे अहम व्यापारिक रास्ता बताते हुए आगाह किया कि यह जल्द ही अमेरिका और चीन के बीच नए टकराव की वजह बन सकता है। हाल ही में नॉर्थ डकोटा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने चीन पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, "चीन पनामा नहर पर कब्जा करने की फिराक में है। हम इसे कभी नहीं होने देंगे। यह हमारा बनाया हुआ है और जरूरत पड़ी तो हम इसे वापस लेंगे।" ट्रंप ने इस नहर को दुनिया की सबसे महंगी और सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली संपत्तियों में गिनाया।
पनामा नहर की अहमियत आखिर है क्या
पनामा नहर अटलांटिक और प्रशांत महासागर को आपस में जोड़ने वाला 82 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है। हर साल हजारों जहाज इसी रास्ते से गुजरते हैं और इसमें दुनिया के व्यापार का बड़ा हिस्सा शामिल रहता है। यह रास्ता जहाजों को हजारों मील का सफर बचाता है, यही वजह है कि इसे इतना कीमती माना जाता है। इसका सबसे बड़ा इस्तेमाल अमेरिका करता है, जबकि दूसरे नंबर पर चीन आता है।
अगर किसी तरह चीन इस नहर पर नियंत्रण जमा लेता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर उसकी पकड़ काफी मजबूत हो जाएगी। ट्रंप का कहना है कि चीनी कंपनियां पहले से ही नहर के दोनों छोर पर बंदरगाहों का कामकाज संभाल रही हैं, जिसे वे बड़ा रणनीतिक खतरा मानते हैं। अमेरिका इसे अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र यानी पश्चिमी गोलार्द्ध में चीन की घुसपैठ के तौर पर देखता है।
वेनेजुएला के बाद अब निशाने पर ईरान और चीन
ट्रंप वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई को पूरी तरह सफल मानते हैं, जहां वे निकोलस मादुरो की सरकार को उखाड़ फेंकने में कामयाब रहे। अब वे उसी तरह की रणनीति ईरान पर भी आजमाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसी कड़ी में चीन को लेकर भी उनका रुख सख्त हुआ है। ईरान पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, "ईरान कुछ-कुछ वेनेजुएला जैसा हो रहा है, जो पहले मुनाफे वाला देश था। हमने वेनेजुएला को काबू में कर लिया और अब ईरान के साथ भी वैसा ही कर रहे हैं।"
क्या पनामा नहर बन सकता है नया होर्मुज
अगर यह विवाद और गहराया तो पनामा नहर भी होर्मुज की खाड़ी जैसा नया टकराव केंद्र बन सकता है। होर्मुज से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है और वहां ईरान तथा अमेरिका-इजराइल के बीच तनाव लगातार बना रहता है। पनामा नहर भी वैश्विक व्यापार का एक बड़ा चोकप्वाइंट है। अगर यहां अमेरिका और चीन की टक्कर बढ़ी तो व्यापारिक जहाजों की आवाजाही पर सीधा असर पड़ सकता है, माल की कीमतें बढ़ सकती हैं और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है।
ट्रंप का आक्रामक रुख यह भी दिखाता है कि अमेरिका अपने परंपरागत प्रभाव क्षेत्र में किसी भी बाहरी ताकत को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। हालांकि चीन के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलना या उसे उकसाना अमेरिका के लिए इतना आसान भी नहीं होगा, लेकिन ट्रंप के अब तक के रिकॉर्ड को देखते हुए आगे क्या होगा, इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।
नहर के अंदर काम कैसे करता है यह इंजीनियरिंग का करिश्मा
पनामा नहर का समंदर से सीधा जुड़ाव नहीं है। इसकी जगह गाटुन लॉक में पानी भरकर जहाजों को करीब 26 मीटर तक ऊंचा उठाया जाता है और फिर दूसरी तरफ समंदर में उतार दिया जाता है। जहाजों को इस नहर से गुजरने में तीन चरण लगते हैं। अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली इस नहर को इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना माना जाता है। इसमें कुल तीन लॉक बनाए गए हैं, जिनके जरिए जहाज को प्रशांत महासागर से निकालकर अटलांटिक महासागर तक पहुंचाया जाता है।
अमेरिका ने आखिर यह नहर हासिल कैसे की थी
पनामा नहर की कहानी बीसवीं सदी की शुरुआत से जुड़ी है। साल 1901 से 1909 तक अमेरिका के राष्ट्रपति रहे थियोडोर रूजवेल्ट ने इसे अमेरिका की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षाओं में शामिल कर लिया था। इससे पहले फ्रांस भी इस नहर को बनाने की कोशिश कर चुका था, लेकिन वह असफल रहा।
1903 में रूजवेल्ट ने कोलंबिया, जिसका हिस्सा उस समय पनामा भी था, के साथ समझौता करने की कोशिश की, लेकिन कोलंबिया ने इनकार कर दिया। इसके बाद रूजवेल्ट ने पनामा के स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन दे दिया और अमेरिकी युद्धपोतों की मौजूदगी में पनामा कोलंबिया से अलग हो गया।
नई बनी पनामा सरकार के साथ हाए बुनाउ वरीला संधि हुई, जिसके तहत अमेरिका को 10 मील चौड़ी एक पट्टी मिल गई। इसके बदले अमेरिका ने 10 मिलियन डॉलर एकमुश्त और साथ में सालाना किराया भी दिया। नहर का निर्माण 1904 से 1914 तक चला। रूजवेल्ट खुद 1906 में साइट पर पहुंचे थे और वहां खुदाई मशीन पर खड़े होकर तस्वीर भी खिंचवाई थी।
1914 में पनामा नहर आम लोगों के लिए खोल दी गई और रूजवेल्ट ने गर्व से कहा था कि नहर उन्होंने बनवाई है। अमेरिका ने साल 1999 तक इस नहर पर पूरा नियंत्रण बनाए रखा। जिमी कार्टर के कार्यकाल में टॉरिजोस कार्टर संधि के तहत यह नहर पनामा को सौंप दी गई, हालांकि इसकी न्यूट्रैलिटी की गारंटी अमेरिका ने ले ली थी।
पानी की कमी से बढ़ी नहर की रणनीतिक अहमियत
नहर में पानी कम होने से इसका रणनीतिक महत्व और भी बढ़ गया है। अब लड़ाई सिर्फ कब्जे की नहीं बल्कि पानी की भी है। इसके बावजूद पनामा नहर आज भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन बनी हुई है और इसकी स्थिरता सीधे तौर पर पूरी दुनिया की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है।
ट्रंप के दावे के पीछे की सोच
ट्रंप का दावा अमेरिका के ऐतिहासिक गौरव और मौजूदा हालात, दोनों पर टिका है। उनका कहना है कि अमेरिका ने यह नहर बनाई, इसमें खून-पसीना बहाया, इसलिए इस पर हक भी अमेरिका का ही बनता है। चीन की बढ़ती मौजूदगी को वे आर्थिक और रणनीतिक, दोनों ही तरह का खतरा मानते हैं। विशेषज्ञों की राय है कि पनामा नहर को लेकर अमेरिका और चीन के बीच टकराव आगे बढ़ सकता है, हालांकि कूटनीति के जरिए इसे सुलझाया भी जा सकता है। अगर तनाव बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक व्यापार, तेल और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर सीधे तौर पर पड़ेगा। ट्रंप का यह बयान सिर्फ पनामा तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दबदबा फिर से कायम करने की उनकी बड़ी रणनीति का हिस्सा नजर आता है।













