अंतरिक्ष विज्ञान और मानव अंतरिक्ष यात्रा के विस्तार में भारत और अमेरिका के वैज्ञानिक संस्थान एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं। न्यूयॉर्क स्थित इंट्रेपिड म्यूजियम में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के शीर्ष नेतृत्व ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की बढ़ती तकनीकी क्षमताओं की खुलकर सराहना की। नासा के सहायक प्रशासक, मुख्य परिचालन अधिकारी एवं चीफ इंजीनियर अमित क्षत्रिय ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष अनुसंधान को लेकर असाधारण तालमेल बना हुआ है। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में वैज्ञानिक खोजों और मानव अभियानों के क्षेत्र में यह आपसी साझेदारी और ज्यादा गहरी होगी।
इसरो की वैज्ञानिक प्रगति और मानव अंतरिक्ष अभियानों की सराहना
अमित क्षत्रिय ने कहा कि विज्ञान मिशनों के साथ-साथ मानव अंतरिक्ष यात्रा में इसरो की तेज प्रगति देखना वास्तव में प्रेरणादायक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नासा और इसरो के बीच पहले से ही बेहद मजबूत रणनीतिक साझेदारी काम कर रही है। अंतरिक्ष अभियानों को लेकर भारत जिस तरह नए मानक तय कर रहा है, उससे वैश्विक मंच पर संयुक्त अनुसंधान की संभावनाएं और अधिक विस्तृत हुई हैं।
नासा अधिकारी ने बताया कि मानव अंतरिक्ष कार्यक्रमों जैसी जटिल परियोजनाओं में दोनों संस्थान निरंतर अपने अनुभवों और तकनीकी सीखों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। क्षत्रिय के अनुसार, आधुनिक युग में अंतरिक्ष की खोज केवल प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह गई है। वैश्विक समुदाय के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण तब अधिक सार्थक होता है जब अलग-अलग देश मिलकर अपनी विशेषज्ञता और संसाधनों को साझा करते हैं।
संयुक्त पृथ्वी अवलोकन परियोजना निसार की अहमियत
द्विपक्षीय तकनीकी सहयोग का एक बड़ा उदाहरण देते हुए क्षत्रिय ने नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार यानी निसार उपग्रह का विशेष उल्लेख किया। निसार परियोजना को दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों के साझा वैज्ञानिक प्रयासों से तैयार किया गया है। जुलाई 2025 में प्रक्षेपित किए गए इस उन्नत उपग्रह का प्राथमिक कार्य पृथ्वी के पर्यावरण, जलवायु और सतही बदलावों का विस्तृत अध्ययन करना है।
यह उपग्रह विशेष तौर पर धरती की वनस्पति आवरण, हिमनदों की हलचल, जल संसाधनों और भू-भाग में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों को मापने और विश्लेषित करने में सक्षम है। नासा के मुख्य परिचालन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि निसार जैसी बड़ी वैश्विक पहल दोनों संगठनों के आपसी सहयोग के चलते ही इतने प्रभावी ढंग से सफल हो सकी है।
आर्टेमिस समझौते और वैश्विक लोकतांत्रिक मूल्य
अंतरिक्ष में अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के विस्तार पर चर्चा करते हुए क्षत्रिय ने कहा कि अमेरिका अंतरिक्ष क्षेत्र में केवल मशीनों की संख्या के बल पर नेतृत्व नहीं करना चाहता, बल्कि वह स्थापित मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा कि अन्वेषण के नियम, मानक और तौर-तरीके ही किसी मिशन की वास्तविक गरिमा तय करते हैं।
इसी संदर्भ में उन्होंने आर्टेमिस समझौते की चर्चा की, जिस पर अब तक 70 से अधिक देश हस्ताक्षर कर चुके हैं। नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण को व्यवस्थित करने वाला यह समझौता गैर-कानूनी रूप से बाध्यकारी सिद्धांतों की एक व्यवस्था है। क्षत्रिय ने स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य मकसद एक-दूसरे की संप्रभुता का पूरा आदर करते हुए साझा लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत अंतरिक्ष की खोज को आगे बढ़ाना है। उन्होंने इसरो को इस पूरी प्रक्रिया में एक अविश्वसनीय और मजबूत साझेदार बताया।
एंटरप्राइज ऑर्बिटर की अर्धशताब्दी पर जुटे दिग्गज
यह महत्वपूर्ण परिचर्चा द्वितीय विश्व युद्ध के ऐतिहासिक विमानवाहक पोत के आधार पर बने इंट्रेपिड म्यूजियम में आयोजित हुई थी। अवसर था नासा के प्रोटोटाइप ऑर्बिटर एंटरप्राइज के सार्वजनिक प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे होने का। एंटरप्राइज एक ऐसा परीक्षण अंतरिक्ष यान था, जिसे नई तकनीकों और एरोडायनामिक डिजाइन की बारीकियों को परखने के लिए तैयार किया गया था। इसी यान ने भविष्य के मशहूर स्पेस शटल कार्यक्रम की मजबूत नींव रखी थी।
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम के मंच पर नासा के पूर्व प्रशासक व अंतरिक्ष यात्री चार्ल्स एफ. बोल्डेन जूनियर तथा प्रसिद्ध महिला अंतरिक्ष यात्री एवं एक्सिओम स्पेस में मानव अंतरिक्ष उड़ान निदेशक पेगी व्हिटसन भी मौजूद थीं। इन दोनों दिग्गजों ने भी भारत के अंतरिक्ष सफर और भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान पर अपने विचार रखे।
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के काम की प्रशंसा
मंच से बोलते हुए पेगी व्हिटसन ने भारतीय वायुसेना के अधिकारी ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के साथ किए गए काम को याद किया। लखनऊ में जन्मे शुक्ला अशोक चक्र विजेता और एक कुशल सैन्य पायलट हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए संचालित किए गए एक्सिओम मिशन-4 में बतौर पायलट अपनी जिम्मेदारी संभाली थी।
व्हिटसन ने कहा कि एक्सिओम-4 मिशन में शुभांशु शुक्ला के साथ काम करना उनके लिए बेहद सुखद रहा। उन्होंने रेखांकित किया कि शुक्ला के समर्पण और उत्साह को देखकर स्पष्ट होता है कि भारत में मानव अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर जबरदस्त ऊर्जा और सकारात्मक माहौल है।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का शोध अभियान
जून 2025 में रवाना हुए एक्सिओम मिशन-4 का नेतृत्व पेगी व्हिटसन ने कमांडर के रूप में किया था, जबकि शुभांशु शुक्ला इसके पायलट थे। इस दल में पोलैंड के स्लावोस्ज उजनांस्की-विस्निव्स्की तथा हंगरी के तिबोर कापू बतौर मिशन विशेषज्ञ शामिल थे। इस चार सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय दल ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी आईएसएस पर लगातार 18 दिनों तक रहकर विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोगों और जटिल शोध गतिविधियों को अंजाम दिया।
व्हिटसन स्वयं अंतरिक्ष इतिहास की सबसे अनुभवी हस्तियों में गिनी जाती हैं। वह अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की कमान संभालने वाली पहली महिला कमांडर रही हैं। एक्सिओम-4 मिशन के पूरा होने के बाद अंतरिक्ष में उनका कुल संचयी समय 695 दिनों तक पहुंच गया, जो किसी भी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री या दुनिया भर की किसी भी महिला अंतरिक्ष यात्री के लिए अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है।
मंगलयान के जरिए रचा गया था स्वर्णिम इतिहास
भारत की ऐतिहासिक अंतरिक्ष उपलब्धियों को याद करते हुए चार्ल्स एफ. बोल्डेन जूनियर ने देश के मंगल अभियान का विशेष तौर पर उल्लेख किया। बोल्डेन ने कहा कि पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह तक सफलतापूर्वक पहुंचने का गौरव केवल भारत के नाम दर्ज है।
भारत ने अपना पहला अंतरग्रहीय अभियान मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान नवंबर 2013 में पीएसएलवी-सी25 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा था। इस साहसिक मिशन के साथ ही इसरो लाल ग्रह की कक्षा में अपने पहले ही प्रयास में यान स्थापित करने वाली दुनिया की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बनकर उभरी थी। वैश्विक स्तर पर भारत की इस उपलब्धि को आज भी बेहद सम्मान के साथ देखा जाता है।



















