एशिया के सामरिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसने चीनी नेतृत्व को गहरे दबाव में डाल दिया है। जापान की ओर से अपनी रक्षा और खुफिया क्षमताओं को तेज गति से आधुनिक बनाने के फैसलों के बाद बीजिंग की चिंताएं खुलकर सामने आ गई हैं। हालिया घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि दशकों पुरानी शांतिवादी नीति को पीछे छोड़ते हुए टोक्यो अब रक्षात्मक मुद्रा से बाहर निकल रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय ने बाकायदा एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके जापान की नई रणनीतिक दिशा पर कड़ा ऐतराज जाहिर किया और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए समझदारी से काम लेने का आह्वान किया।
जापान का बड़ा फैसला और नई खुफिया एजेंसी का गठन
सुरक्षा स्थिति को देखते हुए जापान ने अपनी प्राथमिकताओं में आमूलचूल बदलाव किया है। इसी रणनीति के तहत 31 जुलाई को जापान ने आधिकारिक तौर पर एक नई एवं अत्याधुनिक जासूसी संस्था नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो की स्थापना की। इसके साथ ही जापानी सरकार ने नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल की पहली उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सैन्य और नागरिक खुफिया जानकारी के एकीकरण को मजबूत करना है ताकि देश के सामने मौजूद सुरक्षा चुनौतियों का त्वरित और सटीक जवाब दिया जा सके।
बीजिंग की तीखी प्रतिक्रिया और ऐतिहासिक आशंकाएं
जापान के इस बड़े कदम पर बीजिंग ने तुरंत अपनी तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग से जब ग्लोबल टाइम्स के संवाददाता ने इस नए जासूसी तंत्र के बारे में सवाल पूछा, तो उन्होंने इसे जापानी सुरक्षा नीति में एक नकारात्मक मोड़ बताया। प्रवक्ता माओ निंग ने कहा, "यह जापान की सुरक्षा नीतियों में एक बेहद नकारात्मक और खतरनाक बदलाव है।" उन्होंने आरोप लगाया कि टोक्यो राष्ट्रीय सुरक्षा तथा बाहरी खतरों का हवाला देकर सैन्य पुनर्शस्त्रीकरण को बढ़ावा दे रहा है, जिससे संपूर्ण एशिया-पैसिफिक क्षेत्र की शांति खतरे में पड़ सकती है।
चीन की इस घबराहट के पीछे द्वितीय विश्व युद्ध के दौर का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। माओ निंग ने अपनी बात में 1940 के दशक की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अतीत में जापानी खुफिया और सैन्य तंत्र ने आक्रामकता का रास्ता चुना था, जिससे पड़ोसी देशों की जनता को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। चीन को अंदेशा है कि यदि जापान ने अपनी सैन्य और खुफिया शक्तियों का पुनः विस्तार कर लिया, तो पूर्वी एशिया में चीन का दबदबा कमजोर पड़ जाएगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से नीति में सबसे बड़ा बदलाव
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान ने अपने संविधान के तहत केवल आत्मरक्षणात्मक सैन्य नीति अपनाई हुई थी। इसके तहत उसकी सशस्त्र सेनाएं केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित थीं। हालांकि, हाल के वर्षों में पूर्वी एशियाई क्षेत्र में बदलते हालात ने टोक्यो को सोचने पर मजबूर कर दिया है। चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों, उत्तर कोरिया के निरंतर परमाणु और मिसाइल परीक्षणों तथा जापानी समुद्री मार्गों में अवांछित चहलकदमी ने जापान को अपनी री-मिलिटराइजेशन नीति में तेजी लाने के लिए बाध्य किया है।
जापान के प्रधानमंत्री और शीर्ष रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रक्षात्मक रुख अपनाकर मौजूदा दौर के खतरों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। टोक्यो अब अपनी सेना को आधुनिक हथियारों से लैस कर रहा है और जवाबी हमले यानी काउंटर-अटैक की क्षमताओं को बेहतर बना रहा है ताकि किसी भी दुस्साहस को समय रहते रोका जा सके।
ताइवान और समुद्री रास्तों की सुरक्षा पर असर
जापान की यह नई रणनीतिक तैयारी सीधे तौर पर ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर के इलाकों को प्रभावित करती है। चीन लगातार ताइवान पर सैन्य दबाव बना रहा है और पूरे इलाके पर अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश में है। जापान द्वारा अपने खुफिया नेटवर्क को मजबूत करने से ताइवान के आसपास की हर गतिविधि पर नजर रखना आसान हो जाएगा। सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, यदि जापान अपनी रक्षा प्रणाली और जासूसी क्षमता को इस स्तर पर ले जाता है, तो ताइवान पर सैन्य कदम उठाना चीन के लिए अत्यंत जोखिम भरा और कठिन हो जाएगा।
एशिया में बदलता शक्ति संतुलन और अमेरिका-जापान गठबंधन
विशेषज्ञों का मानना है कि जापान के इस कदम से पूरे एशिया-पैसिफिक क्षेत्र का शक्ति संतुलन बदल रहा है। अमेरिका और जापान के बीच पहले से ही एक मजबूत रक्षा समझौता मौजूद है। अब जापान द्वारा अपनी स्वतंत्र खुफिया एजेंसी नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो स्थापित करने से दोनों देशों का संयुक्त रक्षा ढांचा और अधिक प्रभावी हो जाएगा। चीन, जो इस क्षेत्र में निर्बाध बढ़त हासिल करना चाहता था, उसे अब अपने पड़ोस में एक अत्यधिक सक्षम और सतर्क सैन्य शक्ति का सामना करना पड़ रहा है। यही वजह है कि बीजिंग अब जापान से इतिहास से सबक लेने और शांतिपूर्ण राह पर चलने की अपील कर रहा है।



















