देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन राष्ट्रपति के साथ साए की तरह रहने वाले सैन्य अधिकारियों की भूमिका हमेशा से लोगों के बीच जिज्ञासा का विषय रही है। राष्ट्रपति के एडीसी यानी एड-ए-कैंप का दायित्व भारतीय सेना के सबसे गौरवशाली और जिम्मेदारी भरे पदों में शामिल है। हाल ही में मेजर ऋषभ सिंह संब्याल के इस पद से अचानक अलग होने के बाद से यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इस विशेष स्थान तक पहुंचने का मार्ग कैसा होता है और इसके लिए किन मानदंडों को पूरा करना अनिवार्य होता है।
कौन अधिकारी हो सकता है इस पद के लिए पात्र
यह पद किसी सामान्य या खुली भर्ती के अंतर्गत नहीं आता है, और इसके लिए देश का कोई भी आम नागरिक सीधे आवेदन नहीं कर सकता है। इस अति-विशिष्ट जिम्मेदारी के लिए केवल भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के कमिशंड अधिकारी ही योग्य माने जाते हैं। सशस्त्र बलों में कमिशंड अफसर बनने की प्रक्रिया के तहत युवाओं को संघ लोक सेवा आयोग की कठिन एनडीए या सीडीएस परीक्षा को उत्तीर्ण करना होता है। जब कोई अधिकारी सेना में अपनी सेवा के कम से कम पाँच से सात वर्ष पूरे कर लेता है, तब उसके पिछले सेवा रिकॉर्ड, शारीरिक दक्षता और गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर इस पद के लिए नाम छांटे जाते हैं। तीनों सेनाओं से कुल मिलाकर केवल बीस से तीस उत्कृष्ट अधिकारियों को ही इस चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरण के लिए चुना जाता है, जिसके लिए यूनिट में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन होना जरूरी है।
चौदह दिनों की मैराथन चयन प्रक्रिया और राष्ट्रपति भवन की परीक्षा
इस पद के लिए चुनी जाने वाली चयन प्रणाली को देश की सबसे चुनौतीपूर्ण प्रक्रियाओं में शुमार किया जाता है। प्रारंभिक चरण में शॉर्टलिस्ट होने के बाद अधिकारियों को सेवा मुख्यालय के साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है, जहाँ समसामयिक विषयों और परिस्थितियों से निपटने की उनकी समझ की कड़ी परीक्षा ली जाती है। इसके बाद केवल पाँच चुने हुए अधिकारियों को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में बुलाया जाता है, जहाँ उनका लगातार चौदह दिनों तक चलने वाला मैराथन साक्षात्कार होता है। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और राष्ट्रपति के सचिव द्वारा उम्मीदवारों पर भारी मानसिक दबाव बनाया जाता है। वे जानबूझकर ऐसे पहलुओं को टटोलते हैं जो किसी आपात स्थिति में सामने आ सकते हैं। जियोपॉलिटिक्स या किसी विशेष विषय पर ज्ञान कम होने पर चयन पैनल बार-बार उन्हीं बिंदुओं पर सवाल पूछता है। इन चौदह दिनों के दौरान अधिकारियों को उनकी गलतियाँ नहीं बताई जाती हैं, बल्कि यह परखा जाता है कि क्या वे रात में अध्ययन करके अगले दिन अपनी कार्यप्रणाली में सुधार ला पाते हैं या नहीं।
व्यक्तिगत जीवन का त्याग और कड़ा अनुशासन
इस प्रतिष्ठित दायित्व से जुड़ी कुछ ऐसी शर्तें और सीमाएँ हैं जिनके बारे में जानकर हर कोई हैरान रह जाता है। इस पद पर रहते हुए अधिकारी को अपने परिवार और निजी जीवन से पूरी तरह दूर रहना पड़ता है। राष्ट्रपति के साथ चौबीस घंटे तैनात रहने के कारण उन्हें सामान्य जीवन बिताने का अवसर नहीं मिल पाता है। हर पल चौकस रहना और देश-दुनिया की हर गतिविधि से अपडेट रहना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा होता है। हालांकि यह पद देश में अपार शान और सम्मान का प्रतीक है, लेकिन इसके पीछे का अनुशासन और त्याग इसे दुनिया के सबसे कठिन उत्तरदायित्वों में से एक बनाता है।
















