रक्षाबंधन का पावन पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। इस वर्ष पर्व की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के मन में कई तरह के प्रश्न उठ रहे हैं। भद्रा का साया, चंद्रग्रहण की संभावना, पंचक का प्रभाव और राहुकाल का समय ऐसे विषय हैं जिन्हें लेकर लोग अक्सर असमंजस में पड़ जाते हैं। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार रक्षाबंधन का उत्सव हमेशा भद्रा रहित पूर्णिमा तिथि में ही मनाया जाना शुभ माना जाता है। इस वर्ष 28 अगस्त को उदया तिथि में सावन पूर्णिमा का योग बन रहा है, जिससे इस दिन बिना किसी धार्मिक बाधा के रक्षाबंधन का पर्व मनाना पूरी तरह शास्त्र सम्मत है। सही मुहूर्त और समय की जानकारी होने से आप अपने भाई की कलाई पर मंगल कामनाओं के साथ रक्षासूत्र बांध सकते हैं।
भद्रा और चंद्रग्रहण का रक्षाबंधन पर प्रभाव
धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल के दौरान रक्षासूत्र बांधना वर्जित माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि भद्रा काल में किया गया कोई भी शुभ कार्य मंगलकारी परिणाम नहीं देता, इसलिए रक्षाबंधन के लिए भद्रा से मुक्त समय का चयन करना अनिवार्य होता है। सावन पूर्णिमा की शुरुआत 27 अगस्त को सुबह 09:08 बजे से हो रही है, लेकिन इसी दिन भद्रा का साया भी उपस्थित रहेगा। 27 अगस्त को भद्रा की उपस्थिति के कारण उस दिन राखी बांधना उचित नहीं है। हालांकि 28 अगस्त की सुबह तक भद्रा समाप्त हो चुका रहेगा, जिससे 28 अगस्त का दिन पूरी तरह से भद्रा मुक्त रहेगा।
चंद्रग्रहण को लेकर भी श्रद्धालुओं में कई भ्रांतियां बनी रहती हैं। स्पष्ट किया जाता है कि 28 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन चंद्रग्रहण का सूतक काल प्रभावी नहीं रहेगा। जब ग्रहण का सूतक काल मान्य नहीं होता, तो उसका कोई भी धार्मिक असर या दुष्प्रभाव पूजा-पाठ और त्योहारों पर नहीं पड़ता है। इसलिए चंद्रग्रहण की चिंता किए बिना भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते के पर्व को उमंग के साथ मनाया जा सकता है।
28 अगस्त को राखी बांधने का सबसे शुभ मुहूर्त
शास्त्रीय नियमों के अनुसार पूर्णिमा तिथि से युक्त और भद्रा रहित मुहूर्त में राखी बांधने से जीवन में सुख, समृद्धि और कल्याण की प्राप्ति होती है। इस वर्ष सावन माह की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 09:08 बजे प्रारंभ होकर 28 अगस्त को सुबह 09:48 बजे तक मान्य रहेगी। क्योंकि 27 अगस्त को दिनभर भद्रा का प्रभाव रहेगा, इसलिए शास्त्रों के विधान के अनुसार 28 अगस्त को उदया तिथि में ही रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा।
यदि आप 28 अगस्त शुक्रवार के दिन राखी बांधने का सबसे उत्तम और मुख्य मुहूर्त खोज रहे हैं, तो सुबह 09:48 बजे तक का समय सर्वश्रेष्ठ है। 28 अगस्त की सुबह 09:48 बजे तक पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, जिसके कारण इस समय अवधि में रक्षासूत्र बांधना अत्यंत फलदायी और शुभ माना गया है। सुबह 09:48 बजे के बाद पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी, लेकिन इसके पश्चात भी दिनभर शुभ चौघड़िया मुहूर्तों के आधार पर रक्षाबंधन के अनुष्ठान संपन्न किए जा सकते हैं।
दिनभर के शुभ चौघड़िया मुहूर्त का समय
यदि आप मुख्य मुहूर्त के समय किसी कारणवश राखी नहीं बांध पाते हैं, तो 28 अगस्त को दिनभर में आने वाले विभिन्न शुभ चौघड़िया मुहूर्तों का उपयोग कर सकते हैं। चौघड़िया तालिका के अनुसार शुभ समय का विभाजन इस प्रकार है
- लाभ चौघड़िया: सुबह 07:33 बजे से सुबह 09:10 बजे तक रहता है। यह समय उन्नति और लाभ की कामना के साथ कार्य शुरू करने के लिए उत्तम है।
- अमृत चौघड़िया: सुबह 09:10 बजे से सुबह 10:46 बजे तक रहेगा। इस मुहूर्त को अत्यधिक पवित्र और चिरंजीवी फल देने वाला माना जाता है।
- शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:22 बजे से दोपहर 01:58 बजे तक उपलब्ध रहेगा। दोपहर के समय रक्षासूत्र बांधने के लिए यह सबसे बढ़िया विकल्प है।
- चर चौघड़िया: शाम 05:11 बजे से शाम 06:47 बजे तक रहेगा। शाम के समय पर्व मनाने वाले परिवारों के लिए यह मुहूर्त अनुकूल है।
पंचक और राहुकाल का विचार
अक्सर लोग त्योहारों के अवसर पर पंचक और राहुकाल को लेकर संशय में आ जाते हैं। शास्त्रों के स्पष्ट निर्देशानुसार रक्षाबंधन के पर्व में पंचक का विचार नहीं किया जाता है। 28 अगस्त को पंचक विद्यमान रहेगा, परंतु रक्षासूत्र बांधने की विधि पर पंचक का कोई निषेध या प्रतिकूल प्रभाव लागू नहीं होता। इसी तरह राहुकाल का समय भी रक्षाबंधन के पावन अनुष्ठान को बाधित नहीं करता है। इसलिए पंचक या राहुकाल की चिंता किए बिना निश्चिंत होकर निर्धारित शुभ चौघड़िया मुहूर्तों में राखी बांधी जा सकती है।
पहली राखी किसे बांधें: धार्मिक परंपराएं
रक्षाबंधन के दिन रक्षासूत्र बांधने की एक तय धार्मिक व्यवस्था और परंपरा है। इस पर्व पर सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी को राखी अर्पित की जाती है। गणेश जी को विघ्नहर्ता माना जाता है, इसलिए उन्हें पहली राखी बांधने से घर में रिद्धि-सिद्धि का वास होता है और त्योहार का आरंभ मंगलमय होता है। गणेश जी के पूजन के पश्चात अपने ईष्टदेव यानी आप जिस देवी या देवता की साधना और पूजा करते हैं, उन्हें रक्षासूत्र अर्पित करना चाहिए। ईष्टदेव को राखी समर्पित करने के साथ ही रक्षाबंधन के मुख्य कार्यक्रम की शुरुआत होती है।
यदि किसी बहन का भाई नहीं है या भाई किसी कारणवश दूर है और उपस्थित नहीं हो पा रहा है, तो उन्हें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी स्थिति में बहनें अपने ईष्टदेव को ही अपना रक्षक और भाई मानकर रक्षासूत्र बांध सकती हैं। भगवान को समर्पित यह रक्षासूत्र परिवार में सुरक्षा, स्नेह और शांति का संचार करता है। देव पूजन पूर्ण होने के उपरांत बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रोली, अक्षत और मिठाई के साथ विधिपूर्वक राखी बांध सकती हैं।



















