वाहन बाजार में आजकल गाड़ियों को आधुनिक दिखाने के लिए कई तरह के आकर्षक फीचर्स जोड़े जाते हैं, लेकिन असल इस्तेमाल के दौरान इनमें से कई विकल्प पूरी तरह से बेकार साबित होते हैं। जब ग्राहक शोरूम में नया वाहन खरीदने जाते हैं, तो उन्हें इन महंगे उपकरणों के नाम पर हजारों और लाखों रुपये अतिरिक्त चुकाने पड़ते हैं, जिनका दैनिक जीवन में कोई खास उपयोग नहीं होता है। इन विलासिता से जुड़े उपकरणों पर पैसा खर्च करने से पहले उनकी असल उपयोगिता को समझना बेहद जरूरी है, ताकि मेहनत की गाढ़ी कमाई को बर्बाद होने से बचाया जा सके।
सनरूफ और वायरलेस चार्जिंग की असलियत
भारतीय जलवायु की बात की जाए तो सनरूफ एक ऐसा फीचर है जो साल के अधिकांश समय बिल्कुल काम नहीं आता है। हमारे देश में लंबे समय तक तीव्र गर्मी, चिलचिलाती धूप और भारी धूल-मिट्टी का प्रकोप रहता है, जिसकी वजह से इसे खोलना लगभग असंभव हो जाता है। इसके अलावा कई लोग सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर बच्चों को इससे बाहर निकालते हैं, जबकि इसका रख-रखाव और बारिश के दौरान लीकेज की समस्या एक अलग सिरदर्द बन जाती है। ठीक इसी प्रकार, वाहनों में मिलने वाले इन-बिल्ट वायरलेस फोन चार्जर अक्सर सुविधा के बजाय बड़ी परेशानी खड़ी कर देते हैं। ये उपकरण फोन को बेहद धीमी गति से ऊर्जा प्रदान करते हैं और हमारे देश के गर्म तापमान के बीच स्मार्टफोन को तेजी से गर्म कर देते हैं। जब तक सिस्टम में सक्रिय कूलिंग की व्यवस्था न हो, तब तक पारंपरिक और तेज यूएसबी केबल का उपयोग करना ही सबसे सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित होता है।
ऑटो इंजन स्टार्ट-स्टॉप और वॉयस कमांड की तकनीकी खामियां
गाड़ी की ईंधन दक्षता यानी माइलेज बढ़ाने के दावे के साथ जोड़े जाने वाले ऑटो इंजन स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम से भारतीय बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक में भारी झुंझलाहट पैदा होती है। हर कुछ सेकंड में इंजन का अपने आप बंद होना और क्लच या एक्सीलेटर पर पैर रखते ही दोबारा चालू होना गाड़ी में झटके पैदा करता है। सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि इंजन के बंद होते ही एसी कंप्रेसर कट जाता है और केबिन पलक झपकते ही तपने लगता है। वहीं दूसरी तरफ, वाहन निर्माता कंपनियों द्वारा वॉयस कमांड को एक हाई-टेक फीचर के रूप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन वास्तविक ड्राइविंग के दौरान यह शायद ही कभी सटीक तरीके से काम करता है। हमारे देश के अलग-अलग लहजे और सड़क के बाहरी शोर के कारण यह सिस्टम अक्सर निर्देशों को गलत समझ लेता है। एक साधारण बटन दबाने या डायल घुमाने की तुलना में आवाज के जरिए एसी या सनरूफ को नियंत्रित करना चालक का ध्यान भटकाने का काम करता है।
ADAS और टच-बेस्ड एसी कंट्रोल्स से जुड़ी व्यावहारिक मुश्किलें
विदेशी सड़कों के अनुशासित यातायात को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एडास यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम भारतीय सड़कों की अनिश्चित परिस्थितियों में कई बार जानलेवा साबित हो सकता है। बिना स्पष्ट लेन मार्किंग वाली सड़कों पर इसका लेन-कीप असिस्ट अचानक स्टीयरिंग को अपनी तरफ खींचने लगता है। इसके साथ ही, अचानक सक्रिय होने वाली ऑटो इमरजेंसी ब्रेकिंग की वजह से पीछे से आ रहे वाहन के टकराने का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है, जिसकी वजह से अधिकतर लोग इस सुविधा को बंद ही रखते हैं। इसके अलावा, डैशबोर्ड को एक आधुनिक और साफ-सुथरा रूप देने के उद्देश्य से भौतिक बटनों को हटाकर टच पैनल देना वाहन उद्योग का एक बहुत बड़ा फ्लॉप ट्रेंड बन गया है। गाड़ी चलाते समय अपनी नजरों को सड़क से हटाए बिना तापमान या ब्लोअर की गति को सेट करना असंभव सा हो जाता है। पारंपरिक फिजिकल नॉब की टैक्टाइल फील न मिलने की स्थिति में सफर के दौरान दुर्घटना होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
फ्लश डोर हैंडल देखने में बेहद प्रीमियम और एयरोडायनामिक प्रतीत होते हैं, लेकिन रोजमर्रा के उपयोग में यह व्यवस्था काफी अव्यावहारिक साबित होती है। गाड़ियों पर धूल-मिट्टी और कीचड़ जमने की वजह से इनके मोटर मैकेनिज्म में तकनीकी खराबी आ सकती है। इसके अलावा, किसी भी आपातकालीन स्थिति या दुर्घटना के वक्त बाहर से दरवाजे को तुरंत खींचकर खोलना और मजबूत पकड़ बनाना बेहद कठिन हो जाता है। कम प्रोफाइल वाले टायर्स के साथ आने वाले बड़े अलॉय व्हील्स भी बाहरी सुंदरता बढ़ाते हैं, लेकिन भारतीय गड्ढों, स्पीड ब्रेकर्स और टूटी-फूटी सड़कों पर ये बहुत नुकसानदेह होते हैं। इनके कारण वाहन का सस्पेंशन सख्त हो जाता है और सवारी की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है, जबकि गहरे गड्ढों में जोरदार झटका लगने से टायर फटने और अलॉय व्हील के मुड़ने का जोखिम बहुत अधिक बना रहता है।
पैडल शिफ्टर्स और जेस्चर कंट्रोल की सीमाएं
कम ताकतवर इंजन वाली गाड़ियों में पैडल शिफ्टर्स का होना पूरी तरह से बेमानी है क्योंकि इनका असली रोमांच केवल उच्च प्रदर्शन वाली स्पोर्ट्स कारों में ही मिलता है। एक सामान्य बजट वाली छोटी कार या सुस्त सीवीटी और एएमटी गियरबॉक्स के साथ आने वाले वाहनों में इनका कोई औचित्य नहीं बचता है। इंजन में त्वरित प्रतिक्रिया न मिलने के कारण मैनुअल नियंत्रण का वास्तविक अहसास नहीं हो पाता और खरीदार इनका उपयोग करना छोड़ देते हैं। इसके अलावा, हाथ के इशारों से संगीत बदलने या आवाज कम-ज्यादा करने वाला जेस्चर कंट्रोल सिस्टम केवल एक दिखावे का गिमिक बनकर रह जाता है। यह तकनीक अक्सर चालक या सह-यात्री की सामान्य शारीरिक हलचल को भी एक गलत निर्देश मान लेती है, या फिर बार-बार हाथ हिलने पर भी ठीक से प्रतिक्रिया नहीं देती है। इसके मुकाबले स्टीयरिंग व्हील पर दिए गए साधारण कंट्रोल्स कहीं अधिक बेहतर और पूरी तरह सुरक्षित माने जाते हैं।
























