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भोजपुर एनकाउंटर पर सुलगते सवाल: क्या सरेंडर कर चुके भरत तिवारी की जान लेना जरूरी था?बिहार
20 जून 2026, 11:29 am (45 दिन पहले)· 6

भोजपुर एनकाउंटर पर सुलगते सवाल: क्या सरेंडर कर चुके भरत तिवारी की जान लेना जरूरी था?

शाहपुर के बिटौली गांव में भरत तिवारी के कथित एनकाउंटर को लेकर लोगों में भारी आक्रोश है, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और परिजनों के दावों ने पुलिस की कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शाहपुर के बिटौली गांव की गलियों में इस समय केवल मातम का सन्नाटा नहीं है, बल्कि वहां के लोगों के चेहरों पर एक गहरा आक्रोश साफ देखा जा सकता है। गांव का हर व्यक्ति एक ही मांग कर रहा है कि आरोपी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मामला दर्ज किया जाए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। एक जिम्मेदार मीडिया संस्थान होने के नाते TrendKia का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह इस घटना की तह तक जाए। अगर यह वाकई एक मुठभेड़ थी, तो पुलिस को उठ रहे सवालों के जवाब देने होंगे, वरना एनकाउंटर की आड़ में छिपी इस सच्चाई को सामने लाना बेहद जरूरी है।

क्या सरेंडर के बाद भी चलाई गईं गोलियां?

सोशल मीडिया पर इस घटना से जुड़े कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। इन वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि भरत तिवारी समाज की भलाई की बातें करते हुए अपनी पिस्टल पुलिस के आगे फेंक देते हैं, जो उनके आत्मसमर्पण करने का सीधा प्रमाण है। ऐसे में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि जब उन्होंने अपनी पिस्टल पुलिस के हवाले कर दी थी, तो उन पर गोली चलाने की क्या आवश्यकता थी? जिस व्यक्ति ने खुद को पुलिस के हवाले कर दिया हो, उससे पुलिस को तत्काल क्या खतरा हो सकता था? दूसरा और सबसे गंभीर सवाल यह है कि उन पर एक नहीं बल्कि चार-चार गोलियां क्यों चलाई गईं? क्या उन्हें जिंदा गिरफ्तार करना बिल्कुल असंभव था? देश के कानून का मूल उद्देश्य किसी अपराधी को मारना है या उसे अदालत के समक्ष पेश करना?

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साफ छवि के सामाजिक कार्यकर्ता पर खूंखार अपराधी जैसा एक्शन क्यों?

स्थानीय निवासी भरत भूषण तिवारी को एक राष्ट्रवादी और समर्पित समाजसेवक के रूप में जानते हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भरत पर पहले से किसी भी थाने में कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं था। पुलिस एनकाउंटर का इतिहास गवाह है कि ऐसी कार्रवाई अमूमन आतंकवादियों, शार्प शूटरों या कुख्यात अपराधियों के खिलाफ की जाती है। लेकिन भरत भूषण तिवारी का रिकॉर्ड बताता है कि शाहपुर या भोजपुर के किसी भी थाने में उनके खिलाफ एक भी मुकदमा दर्ज नहीं था। फिर बिना किसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले युवक को पुलिस ने अचानक एक खूंखार अपराधी की तरह सड़क पर कैसे ढेर कर दिया?

कानूनी जानकारों के अनुसार, देश का कानून किसी भी व्यक्ति को अदालत में दोष सिद्ध होने से पहले अपराधी नहीं मानता। अदालतें सजा तय करने के लिए हैं, न कि पुलिस को मौके पर ही फैसला सुनाने का अधिकार देने के लिए। लोगों का मानना है कि भरत की मजबूत और बेबाक आवाज का सिस्टम के पास कोई कानूनी जवाब नहीं था, इसलिए इस एनकाउंटर की साजिश रची गई।

पुलिस परिवार से जुड़ा था नाता

भरत तिवारी के इस एनकाउंटर ने उनके पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया है। उनकी मां रोते हुए इंसाफ की मांग कर रही हैं। यह मामला इसलिए भी अधिक संवेदनशील है क्योंकि भरत का परिवार खुद पुलिस सेवा से जुड़ा रहा है। उनके पिता बिहार पुलिस से सिपाही के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं, जबकि उनकी बहन वर्तमान में बिहार पुलिस में अपनी सेवाएं दे रही हैं।

इलाके के लोग बताते हैं कि भरत उन विस्थापित परिवारों के मसीहा थे, जिन्हें विकास परियोजनाओं के कारण अपने घर-आंगन छोड़ने पड़े थे। गरीबों और वंचितों के हक के लिए खड़े होने के कारण वे स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। उनकी उम्र करीब 30-32 साल थी और वे हिंदू राष्ट्र के समर्थन में बागेश्वर धाम की यात्रा पर भी गए थे। उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अपनी हनुमानी (गले का लॉकेट) बेचकर एक पिस्टल खरीदी थी, लेकिन यही हथियार उनकी मौत का सबसे बड़ा कारण बन गया।

मानसिक बीमारी का दावा और जनता का विरोध

बिहार पुलिस लगातार दावा कर रही है कि भरत तिवारी मानसिक रूप से बीमार थे। हालांकि, उनके बात करने के ढंग और पहनावे से वे कहीं से भी मानसिक रूप से कमजोर नहीं लग रहे थे। ग्रामीणों का कहना है कि अगर वे मानसिक रूप से अस्वस्थ थे भी, तो उन्हें इलाज की जरूरत थी, न कि गोलियों की। इस कथित एनकाउंटर के बाद शाहपुर के बिटौली गांव के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। उनके दाह संस्कार के दौरान कई पंचायतों से आए हजारों लोगों की भीड़ ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ विरोध जताया।

सवाल-जवाब

भरत तिवारी कौन थे?
भरत तिवारी बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर अंतर्गत बिटौली गांव के एक 30-32 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता थे, जो विस्थापित परिवारों के हक के लिए आवाज उठाते थे।
भरत तिवारी के एनकाउंटर पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दिख रहा है कि भरत ने गोली चलने से पहले अपनी पिस्तौल पुलिस के सामने फेंक कर आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद भी उन पर चार गोलियां चलाई गईं।
क्या भरत तिवारी का कोई आपराधिक इतिहास था?
नहीं, स्थानीय लोगों और रिकॉर्ड्स के अनुसार शाहपुर या भोजपुर के किसी भी थाने में भरत तिवारी के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं था।
भरत तिवारी के परिवार का पुलिस से क्या संबंध है?
भरत तिवारी के पिता बिहार पुलिस से सेवानिवृत्त सिपाही हैं और उनकी बहन वर्तमान में बिहार पुलिस में कार्यरत हैं।
पुलिस ने भरत तिवारी के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर क्या दावा किया है?
बिहार पुलिस उन्हें मानसिक रूप से विक्षिप्त बता रही है, जबकि स्थानीय ग्रामीण उनके पहनावे और बातचीत की शैली को देखते हुए पुलिस के इस दावे को गलत मान रहे हैं।
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