बिहार की राजधानी पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट हमेशा से राज्य के राजनीतिक पारे को मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना रही है। यहां होने वाले चुनाव केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इन्हें पूरे प्रदेश के राजनीतिक मूड का संकेतक माना जाता है। इस बार उपचुनाव के नतीजों पर हर किसी की निगाहें लगी हुई हैं। राजनीतिक हलकों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि बांकीपुर की जनता अपना पुराना चुनावी रिकॉर्ड दोहराएगी या फिर कोई नया मोड़ देखने को मिलेगा।
वर्तमान उपचुनाव का समीकरण और दांव पर लगी साख
मौजूदा उपचुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी की ओर से नीरज कुमार सिन्हा मैदान में हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल ने रेखा गुप्ता पर दांव लगाया है। इसके अलावा जनसुराज अभियान के तहत प्रशांत किशोर भी अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। हालांकि, इस चुनावी मुकाबले को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रशांत किशोर की राजनीतिक प्रतिष्ठा की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। नितिन नवीन लंबे समय से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते आए हैं, इसलिए यह सीट भाजपा के लिए साख का विषय बनी हुई है।
पटना पश्चिम से बांकीपुर बनने का सफर और शुरुआती दौर
आज जिस सीट को बांकीपुर के नाम से जाना जाता है, उसका पुराना नाम पटना पश्चिम हुआ करता था। वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद इस क्षेत्र को बांकीपुर नाम दिया गया। इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे पहला चुनाव वर्ष 1957 में आयोजित हुआ था। उस दौरान कांग्रेस के उम्मीदवार रामशरण साव ने जीत दर्ज कर पहले विधायक बनने का गौरव हासिल किया था। इसके बाद 1962 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता कृष्ण बल्लभ सहाय ने यहां से जीत दर्ज की थी।
साल 1967 के चुनाव में महामाया प्रसाद सिन्हा ने इस सीट पर परचम लहराया। हालांकि, उनके इस्तीफे के कारण 1969 में उपचुनाव कराना पड़ा, जिसमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के ए.के. सेन ने बाजी मारी। सीपीआई ने अपनी पकड़ बरकरार रखते हुए 1972 के चुनाव में भी जीत दर्ज की, जब पार्टी के उम्मीदवार सुनील मुखर्जी विधायक चुने गए। इसके बाद 1977 में देश भर में चली जनता लहर का असर यहां भी दिखा और जनता पार्टी के ठाकुर प्रसाद चुनाव जीते। वर्ष 1980 के चुनाव में कांग्रेस के रणजीत सिन्हा ने बाजी पलटते हुए यह सीट वापस अपनी पार्टी के पाले में डाल दी।
1985 का ऐतिहासिक उलटफेर: जब निर्दलीय ने बदला इतिहास
बांकीपुर के पूरे इतिहास में सबसे चौंकाने वाला मोड़ वर्ष 1985 के चुनाव में आया। उस दौरान राजनीतिक पंडितों को चौंकाते हुए निर्दलीय प्रत्याशी रामानंद यादव ने जीत हासिल की। उन्होंने उस समय के सभी बड़े स्थापित राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को करारी शिकस्त दी। यह चुनाव आज भी बांकीपुर के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जाता है। इस नतीजे ने यह साफ संदेश दिया था कि पटना की यह प्रबुद्ध जनता किसी भी एकतरफा राजनीतिक गणित को आंख बंद करके स्वीकार नहीं करती।
1995 से भाजपा का अभेद्य किला: नवीन किशोर से नितिन नवीन तक
वर्ष 1995 के विधानसभा चुनाव से इस क्षेत्र का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। भाजपा उम्मीदवार नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने शानदार जीत दर्ज की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2000, फरवरी 2005 तथा अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनावों में लगातार जीत हासिल की। अक्टूबर 2005 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी राजेश कुमार को पराजित किया था। लगातार चार बार मिली इन जीतों ने पटना पश्चिम को भाजपा के एक अभेद्य किले में बदल दिया।
वर्ष 2006 में विधायक नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा का आकस्मिक निधन हो गया। इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने उनके पुत्र नितिन नवीन को मैदान में उतारा, जिन्होंने जीत हासिल कर अपने संसदीय जीवन की शुरुआत की। वर्ष 2008 के परिसीमन में जब सीट का नाम बदलकर बांकीपुर रखा गया, तब भी भाजपा का जीत का सिलसिला निर्बाध रूप से जारी रहा।
परिसीमन के बाद भी बरकरार रहा दबदबा: 2010 से 2025 तक का सफर
नया नाम मिलने के बाद 2010, 2015, 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में नितिन नवीन ने लगातार जीत का परचम लहराया। वर्ष 2010 के चुनाव में उन्होंने 60,840 वोटों के विशाल अंतर से जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2015 के चुनाव में उनकी जीत का अंतर 39,767 वोट रहा, जबकि 2020 में उन्होंने 39,036 वोटों के अंतर से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को हराया।
वर्ष 2025 के चुनाव में नितिन नवीन ने कुल मतदान का 63 प्रतिशत मत प्राप्त कर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया और आरजेडी उम्मीदवार को 51 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। इस प्रकार पिछले तीन दशकों से अधिक समय से यह क्षेत्र लगातार भाजपा के नियंत्रण में बना हुआ है।
दिग्गजों की हार की भूमि: लव सिन्हा से लेकर पूर्व मुख्यमंत्रियों तक
बांकीपुर का इतिहास केवल विजेताओं की कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई बड़े नामों की हार का भी गवाह रहा है। वर्ष 2020 के चुनाव में प्रसिद्ध अभिनेता लव सिन्हा ने यहां से किस्मत आजमाई थी, लेकिन उन्हें नितिन नवीन के हाथों भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा। इसी चुनाव में अपनी नई पार्टी के साथ उतरीं पुष्पम प्रिया चौधरी को भी बांकीपुर की जनता ने नकार दिया था।
अतीत के पन्नों को पलटें तो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय भी इस क्षेत्र से चुनाव हार चुके हैं। इसके अलावा वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम कृपाल यादव को भी अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दौर में पटना पश्चिम सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।
भविष्य का सवाल: क्या पुराना इतिहास दोहराया जाएगा?
अब उपचुनाव के दौर में बांकीपुर एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ चुका है। एक तरफ भाजपा अपने तीन दशक पुराने दबदबे को कायम रखने की चुनौती से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रशांत किशोर की जनसुराज इस मुकाबले को एक नए विकल्प के रूप में पेश कर रही है। अब देखना यह होगा कि बांकीपुर की जनता भाजपा के इस मजबूत गढ़ को बरकरार रखती है या फिर 1985 की तरह कोई नया राजनीतिक अध्याय लिखती है। इसका फैसला मतगणना समाप्त होने के बाद ही हो सकेगा।



















