बांकीपुर उपचुनाव में मिली हार के तुरंत बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है। अगर बात करें बिहार की राजनीति की, तो राष्ट्रीय जनता दल और भारतीय जनता पार्टी जैसे एनडीए के प्रमुख सहयोगियों के बीच का समीकरण हमेशा से उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद यह तल्खी और अधिक सतह पर आ गई थी, जब तमाम ज्यादा सीटों पर किस्मत आजमाने के बावजूद जनता दल यूनाइटेड केवल 43 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी। इसके बाद से जब भी राज्य में कोई उपचुनाव हुआ, दोनों ही दलों ने गठबंधन की मर्यादा का पालन करने के बावजूद परोक्ष रूप से एक-दूसरे की ताकत को परखने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
बोचहां उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार बेबी कुमारी की हार इसी आपसी खींचतान का एक स्पष्ट उदाहरण थी। उस दौरान जनता दल यूनाइटेड के खेमे में एक अलग ही प्रकार की खुशी देखने को मिली थी। अब तक बड़े भाई की राजनीतिक भूमिका निभाती रही जनता दल यूनाइटेड के लिए भारतीय जनता पार्टी की वह हार किसी मरहम से कम नहीं थी। हालांकि, इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच नीतीश कुमार ने अगस्त, 2022 में बड़ा यू-टर्न लेते हुए सियासी पाला बदल लिया था। उस समय बोचहां में जमीनी स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सवर्ण जातियों की नाराजगी की बातें खुलकर सामने आ रही थीं। इसके ठीक विपरीत, जब कुढ़नी विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराया गया, तो भारतीय जनता पार्टी का जमीनी कैडर जनता दल यूनाइटेड को चुनावी सबक सिखाने की फिराक में था।
कुढ़नी का वह मुकाबला दिसंबर महीने में हुआ था और उस वक्त नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के साथ मिलकर सरकार चला रहे थे। वह सीट राष्ट्रीय जनता दल के एक विधायक को अयोग्य ठहराए जाने के बाद खाली हुई थी। फिर क्या था, जो राजनीतिक ताकतें बोचहां में भारतीय जनता पार्टी की हार की वजह बनी थीं, बिल्कुल वही समीकरण कुढ़नी में केदार गुप्ता की जीत का मुख्य आधार साबित हुए।
अब बांकीपुर में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद जनता दल यूनाइटेड के भीतर क्या चल रहा है, इसे भांपना बहुत मुश्किल नहीं है। जनता दल यूनाइटेड नेता श्याम रजक की ओर से यह नसीहत आ चुकी है कि भारतीय जनता पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं का उचित सम्मान करना चाहिए। यह बयान अपने आप में दोनों दलों के गठबंधन के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और मनोदशा को उजागर करता है। बिहार की राजनीति का मिजाज लंबे समय से मुख्य रूप से त्रिकोणीय रहा है, जहां जो भी दो बड़े ध्रुव आपस में हाथ मिला लेते हैं, सरकार उसी गठबंधन की बनती है। नीतीश कुमार अब सार्वजनिक मंचों से भारतीय जनता ऐसे के साथ स्थायी तौर पर जुड़े रहने की बात कर चुके हैं, इसलिए जब तक जनता दल यूनाइटेड का राजनीतिक अस्तित्व है, वह कभी नहीं चाहेगी कि प्रशांत किशोर जैसा कोई नया तीसरा विकल्प राज्य में मजबूती से उभरे।
वैसे भी अगर गौर किया जाए, तो बिहार के उपचुनावों के नतीजे कभी भी भविष्य के बड़े राजनीतिक संकेत नहीं रहे हैं। साल 2010 के विधानसभा चुनाव से ठीक कुछ महीने पहले राज्य की 10 सीटों पर उपचुनाव संपन्न हुए थे। वे सभी सीटें पहले से राष्ट्रीय जनता उनमें के पास थीं, लेकिन उनमें से पांच पर राष्ट्रीय जनता दल ने बाजी मारते हुए कब्जा जमा लिया था। उस दौर में भी सियासी गलियारों में यही नैरेटिव गढ़ा जाने लगा था कि साल 2010 से पहले राष्ट्रीय जनता दल की जोरदार वापसी हो रही है। लेकिन जब अक्टूबर और नवंबर के महीनों में मुख्य विधानसभा चुनाव के नतीजे आए, तो पूरी तस्वीर ही बदल गई और राष्ट्रीय जनता दल सिमटकर मात्र 22 सीटों पर रह गई।
इसका सीधा सा मतलब यही है कि बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में उपचुनावों के परिणामों को ही अंतिम भविष्यवाणी मान लेना अक्सर गलत साबित होता आया है। इसलिए यदि बांकीपुर के चुनावी नतीजों को किसी उचित फ्रेम में रखकर देखना है, तो इसे एक गंभीर चेतावनी के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि भविष्य की पक्की भविष्यवाणी के तौर पर। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी, स्थानीय समीकरणों की पेंच और आपसी तालमेल की कमी जैसी दिक्कतें निश्चित रूप से मौजूद हैं। मगर इस एक सीट के आधार पर पूरे राज्य के भविष्य का कयास लगा लेना जल्दबाजी होगी। बिहार के मतदाता हमेशा बड़े चुनावों में स्थानीय समीकरणों की सीमाओं से ऊपर उठकर राजनीतिक स्थिरता, मजबूत नेतृत्व और एक व्यापक विकल्प को प्राथमिकता देते हैं।



















