भारतीय सिनेमा में भगवान राम के स्वरूप को पर्दे पर उतारने वाले कलाकारों का एक समृद्ध इतिहास रहा है। टेलीविजन पर रामानंद सागर की रामायण में अरुण गोविल का अभिनय हो या फिर आधुनिक दौर में रणबीर कपूर की आने वाली फिल्में, दर्शकों ने इन कलाकारों को हमेशा विशेष स्नेह दिया है। हालांकि, टेलीविजन के दौर से करीब 84 साल पहले हिंदी सिनेमा का एक ऐसा सितारा हुआ, जिसने भगवान राम के किरदार को इस तरह जीवंत किया कि लोग उनकी तस्वीरों को अपने घरों और मंदिरों में रखकर पूजने लगे थे। वह दिग्गज अभिनेता थे प्रेम अदीब, जिन्होंने अपने करियर में एक दो नहीं बल्कि पूरे आठ बार भगवान राम की भूमिका निभाई।
पारिवारिक विरोध के बीच अभिनय का सफर
प्रेम अदीब का जन्म 10 अगस्त 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में एक संभ्रांत कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित राम प्रसाद अदीब पेशे से एक प्रतिष्ठित वकील थे। एक पढ़े-लिखे और अनुशासित परिवार में जन्मे प्रेम अदीब से यह उम्मीद की जाती थी कि वह शिक्षा प्राप्त कर एक पारंपरिक और सुरक्षित करियर चुनेंगे। हालांकि, प्रेम अदीब का रुझान बचपन से ही कला और सिनेमा की ओर था। जब उन्होंने अभिनय को अपना पेशा बनाने की इच्छा जताई, तो परिवार ने इसका कड़ा विरोध किया। इसके बावजूद प्रेम अदीब ने अपने सपने को नहीं छोड़ा और संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने 1936 में फिल्मी दुनिया में कदम रखा और साल 1938 में आई फिल्म 'निराला हिंदुस्तान' में मुख्य अभिनेता के रूप में अपनी पहली बड़ी भूमिका निभाई।
'भरत मिलाप' और 'राम राज्य' से मिली ऐतिहासिक सफलता
1940 के दशक तक आते-आते प्रेम अदीब हिंदी सिनेमा के स्थापित अभिनेताओं की सूची में शामिल हो चुके थे। उन्हें कई सामाजिक और ड्रामा फिल्मों में सराहा जा रहा था, लेकिन उनके करियर का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ साल 1942 में आया। निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म 'भरत मिलाप' में प्रेम अदीब ने भगवान राम का किरदार निभाया, जबकि प्रसिद्ध अभिनेत्री शोभना समर्थ ने माता सीता की भूमिका निभाई। फिल्म की सफलता और दर्शकों की प्रतिक्रिया अभूतपूर्व थी। अगले ही वर्ष, यानी 1943 में, इस जोड़ी ने फिल्म 'राम राज्य' में एक बार फिर राम और सीता का किरदार निभाया। यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि इसने उस दौर के सारे बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तोड़ दिए।
घरों और मंदिरों तक पहुंचीं तस्वीरें
'भरत मिलाप' और 'राम राज्य' की अपार सफलता के बाद प्रेम अदीब और शोभना समर्थ की जोड़ी केवल एक फिल्मी पर्दे तक सीमित नहीं रही। दर्शकों के मन में दोनों की छवि साक्षात राम और सीता के रूप में बस गई थी। धार्मिक प्रकाशनों, कैलेंडर और तस्वीरों में प्रेम अदीब और शोभना समर्थ की राम-सीता वाली छवियां छपने लगीं। स्थिति यह थी कि लोग इन कैलेंडरों को खरीदकर अपने घरों के पूजा घर और मंदिरों में स्थापित करने लगे थे। उस दौर में जब भी धार्मिक या पौराणिक फिल्मों की बात होती थी, तो सबसे पहला नाम प्रेम अदीब का ही सामने आता था।
आठ फिल्मों में निभाया प्रभु राम का किरदार
प्रेम अदीब और शोभना समर्थ का यह पौराणिक सफर आगे भी कई वर्षों तक जारी रहा। दोनों ने इसके बाद फिल्म 'राम बाण' और साल 1954 की फिल्म 'रामायण' में भी राम और सीता के रूप में अपनी केमिस्ट्री से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। प्रेम अदीब ने अपने पूरे करियर के दौरान कुल मिलाकर आठ फिल्मों में भगवान राम की भूमिका निभाई। उनके इस आध्यात्मिक फिल्मी सफर की प्रमुख फिल्मों में 'भरत मिलाप', 'राम राज्य', 'राम बाण', 'राम विवाह', 'राम नवमी', 'राम-हनुमान युद्ध', 'राम लक्ष्मण' और 'राम भक्त विभीषण' शामिल हैं। इन सभी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया।
असमय निधन और अंतिम फिल्म
प्रेम अदीब का जीवन और फिल्मी करियर बहुत लंबा नहीं चल सका। 25 दिसंबर 1959 को केवल 42 वर्ष की अल्पायु में मुंबई में उनका निधन हो गया। उनके असमय चले जाने से हिंदी सिनेमा जगत को गहरा सदमा पहुंचा। उनके निधन के बाद, साल 1960 में फिल्म 'अंगुलीमाल' प्रदर्शित हुई, जिसे उनके अभिनय करियर की अंतिम रिलीज फिल्म माना जाता है। प्रेम अदीब भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पर्दे पर पौराणिक पात्रों की प्रामाणिकता और भक्ति भाव की नींव रखने में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।



















