विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर देश भर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया और इस खास मौके पर राजनीतिक गलियारों से भी कई संदेश सामने आए। इसी कड़ी में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के जरिए देश के तमाम आदिवासी भाई-बहनों को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं। उनके इस संदेश ने एक बार फिर से देश के जनजातीय समुदायों के अधिकारों, उनकी संस्कृति और उनकी अस्मिता से जुड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इस दिन देश के विभिन्न हिस्सों में तिरंगा यात्राएं निकाली गईं और लोगों ने देशभक्ति के नारों के साथ इस पर्व को मनाया, वहीं राजनीतिक बयानों के जरिए आदिवासियों के संरक्षण और उनकी जीवनशैली पर भी खुलकर चर्चा की गई।
मूल निवासी और अमूल्य धरोहर
अपने संदेश में राहुल गांधी ने इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी इस देश के पहले मालिक हैं। उन्होंने कहा कि इन समुदायों की ऐतिहासिक और समृद्ध संस्कृति भारत की अमूल्य धरोहर है, जिसे सहेजकर रखना हर नागरिक का कर्तव्य है। आदिवासी समुदायों की जीवनशैली हमेशा से प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम, आस्था और सम्मान से जुड़ी रही है, जिससे पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण और मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा मिलती है। जानकारों का मानना है कि पारंपरिक ज्ञान और जंगलों के साथ आदिवासियों का रिश्ता सदियों पुराना है और उनकी संस्कृति देश की विविधता को और अधिक मजबूत करती है।
जल, जंगल और जमीन के अधिकार की लड़ाई
संदेश में आगे कहा गया कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का हक सर्वोपरि है। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि इन प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकारों के साथ-साथ आदिवासी अस्मिता और सम्मान की रक्षा की लड़ाई में वे हमेशा उनके साथ खड़े हैं। देश के अलग-अलग कोनों से आए दिन आदिवासियों के अधिकारों और उनकी जमीन के संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। इस विशेष दिवस पर विभिन्न संगठनों और नेताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि जनजातीय समुदायों को उनके पारंपरिक आवास और संसाधनों से बेदखल करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने की जरूरत है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और जनता की राय
विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर सोशल मीडिया पर भी तीखी और मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। जहां एक तरफ कई लोगों ने इस संदेश का समर्थन किया और आदिवासियों के अधिकारों के लिए मजबूत आवाज उठाने की बात कही, वहीं दूसरी तरफ इस पर राजनीतिक बहस भी छिड़ गई। आलोचकों और अन्य दलों के समर्थकों ने अतीत के फैसलों और नीतियों को लेकर सवाल उठाए, जबकि आम नागरिकों ने इस बात पर जोर दिया कि केवल बयानों तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने और उनके जल-जंगल-जमीन के हक को कानूनी रूप से सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।


























