भारतीय हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी रही हैं जिनके गाने फिल्म की व्यावसायिक सफलता से परे जाकर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। साल 1970 में पर्दे पर आई फिल्म प्रेम पुजारी भी एक ऐसी ही ऐतिहासिक रचना है। इस फिल्म में 70 और 80 के दशक की मशहूर और लोकप्रिय ऑन-स्क्रीन जोड़ी देव आनंद और वहीदा रहमान एक साथ नजर आए थे। दोनों कलाकारों की केमिस्ट्री ने हमेशा दर्शकों को आकर्षित किया है और इस फिल्म में भी उनकी जोड़ी का जादू साफ दिखाई दिया। भले ही यह फिल्म सिनेमाघरों में वैसी कमाई नहीं कर सकी जैसी उम्मीद की गई थी, लेकिन इसका एक गाना रंगीला रे, तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए आज भी लाखों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज कर रहा है।
फिल्म का कथानक और देव आनंद का निर्देशन में पदार्पण
6 फरवरी 1970 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म प्रेम पुजारी अभिनेता देव आनंद के करियर की एक बेहद खास और महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है। इसका मुख्य कारण यह था कि इस फिल्म के जरिए देव आनंद ने पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा था। यह उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी। फिल्म में देव आनंद और वहीदा रहमान के साथ अभिनेत्री जहीदा और कई अन्य दिग्गज कलाकारों ने काम किया था। फिल्म की कहानी को युद्ध, देशभक्ति और प्रेम जैसे गंभीर विषयों के इर्द-गिर्द बुना गया था। एक बड़ा विषय, भव्य पैमाना और शानदार स्टारकास्ट होने के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी। हालांकि फिल्म का संगीत और इसके सभी गीत दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय साबित हुए और आज भी इन्हें भारतीय सिनेमा के बेहतरीन गानों में गिना जाता है।
गाने की पर्दे पर कहानी और वहीदा रहमान का अभिनय
गाना रंगीला रे, तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन फिल्म प्रेम पुजारी का सबसे मुख्य आकर्षण बनकर उभरा। पर्दे पर इस गाने का फिल्मांकन बेहद भावुक और नाटकीय मोड़ पर किया गया है। कहानी के उस दृश्य में वहीदा रहमान का किरदार अपने प्रेमी देव आनंद को किसी दूसरी औरत की बाहों में देख लेता है। अपने प्यार को किसी और के साथ देखकर प्रेमिका का दिल पूरी तरह टूट जाता है। इस गाने में वहीदा रहमान ने अपने डांस और चेहरे के जबरदस्त भावों के जरिए प्रेम, जलन, गहरे दर्द और बेबसी की भावनाओं को एक साथ जीवंत कर दिया है।
दूसरी तरफ देव आनंद का किरदार दूर खड़ा होकर इस पूरे घटनाक्रम और अपनी प्रेमिका के टूटते दिल को देखता नजर आता है। गाने के जरिए प्रेमिका यह सवाल उठाती है कि जिस प्यार के सुंदर सपने उसने सजाए थे और जिस पवित्र रिश्ते को अपने दिल की गहराइयों में बसाया था, उसमें किसी दूसरी औरत के लिए जगह कैसे बन गई। वह अपने प्रेमी के रंग में रंगे होने का इजहार तो करती है, लेकिन उसके मन के भीतर एक गहरी जलन, कसमसाहट और पीड़ा भी साफ झलकती है। वहीदा रहमान की अभिनय क्षमता और गाने के बोलों ने मिलकर इस दृश्य को सिनेमा के इतिहास का एक बेहद दर्दनाक और यादगार पल बना दिया।
संगीतकार एस. डी. बर्मन, गीतकार नीरज और लता मंगेशकर का जादुई संगम
इस कालजयी गाने की रचना की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। इस खूबसूरत गीत के बोल उस दौर के प्रसिद्ध कवि और गीतकार गोपालदास नीरज ने लिखे थे। जब नीरज इस गीत की पंक्तियां लेकर महान संगीतकार एस. डी. बर्मन के पास पहुंचे, तो बर्मन शब्दों के जादू में इस कदर खो गए कि वे सुनते ही गाने की धुन तैयार करने के लिए मजबूर हो गए। शब्दों में बयां किए गए जज्बातों ने संगीतकार के दिल को तुरंत छू लिया। इसके बाद इस गाने को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज दी।
गोपालदास नीरज के संवेदनशील शब्द, एस. डी. बर्मन की सुरीली धुन और लता मंगेशकर की सुरीली आवाज ने मिलकर एक ऐसा अद्भुत जादू रचा जिसने संगीत इतिहास में नया अध्याय लिख दिया। यही वजह है कि जब 1970 में फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपनी छाप छोड़ने में असफल रही, तब भी यह गाना हर बीतते दशक के साथ और अधिक बड़ा हिट साबित होता चला गया। आज भी पुराने संगीत के शौकीनों के लिए रंगीला रे एक अनमोल रत्न की तरह है।



















