बलूचिस्तान का क्षेत्र बीते कई दशकों से राजनीतिक उथल-पुथल, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और वहां के नागरिकों पर हो रहे गंभीर अत्याचारों का केंद्र बना हुआ है। पाकिस्तानी अधिकारियों और सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर के नेतृत्व में बलूच युवाओं को अगवा करने, विरोध प्रदर्शनों को दबाने और बुनियादी मानवाधिकारों के हनन की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। बलूचिस्तान की धरती से सोना, प्राकृतिक गैस और कीमती खनिजों का बड़ा भंडार निकाला जाता है, लेकिन वहां के आम लोगों को बुनियादी नागरिक सुविधाएं और अधिकार तक नसीब नहीं होते। इसी निरंतर दमन और स्वायत्तता की लड़ाई के बीच, बलूच समाज का एक बड़ा वर्ग भारत की ओर उम्मीद और आत्मीयता की नजर से देखता है। भारत और बलूचिस्तान के बीच यह स्वाभाविक झुकाव कोई अचानक उभरी कूटनीतिक परिघटना नहीं है, बल्कि यह उन 5 ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भाषाई और राजनीतिक कड़ियों पर टिका हुआ है जो दोनों क्षेत्रों को सदियों से एक-दूसरे से जोड़ती आई हैं।
मेहरगढ़ की प्राचीन सभ्यता से जुड़े सांस्कृतिक सूत्र
भारत और बलूचिस्तान के सामाजिक व सांस्कृतिक जुड़ाव को समझने के लिए सबसे पहला और ऐतिहासिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण आधार मेहरगढ़ की प्राचीन बस्ती है। बलूचिस्तान के काछी मैदान में स्थित मेहरगढ़ का इतिहास प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना माना जाता है। पुरातात्विक अध्ययनों के अनुसार, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में यह वही स्थान है जहां मानव समाज ने सबसे पहले व्यवस्थित रूप से खेती-बाड़ी करने और पशुपालन की शुरुआत के अकाट्य प्रमाण छोड़े। प्राचीन काल में मेहरगढ़ का संबंध हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और वर्तमान भारत के विभिन्न हिस्सों में बसे पुराने व्यापारिक केंद्रों के साथ निरंतर बना हुआ था। इस इलाके से फसलों की कटाई, शुरुआती सामाजिक व्यवस्था, खान-पान की आदतों और मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीकों का विकास हुआ। यही वजह है कि इतिहासकार बलूचिस्तान की सांस्कृतिक जड़ों को पंजाब या सिंध के बजाय प्राचीन भारतीय समाज और उसकी जीवन शैली से अधिक गहराई से जुड़ा हुआ मानते हैं।
हिंगलाज माता का पवित्र शक्तिपीठ और अटूट आस्था
बलूचिस्तान और भारत के बीच का दूसरा सबसे पवित्र और भावनात्मक संबंध हिंगलाज माता मंदिर से जुड़ता है, जिन्हें स्थानीय लोग और श्रद्धालु हिंगलाज भवानी के नाम से पूजते हैं। बलूचिस्तान के लसबेला जिले में हिंगोल नदी के किनारे एक प्राकृतिक पहाड़ी गुफा में स्थित यह पावन धाम हिंदू धर्म के 51 प्रमुख शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान पर माता सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था, जिसके चलते हर साल भारत और दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने की अभिलाषा रखते हैं। इस धार्मिक केंद्र का सबसे अद्भुत और सौहार्दपूर्ण पहलू यह है कि बलूचिस्तान के स्थानीय मुस्लिम बलूच भी इस मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हैं। वे इसे सम्मानपूर्वक 'नानी मां का मंदिर' या 'नानी का हज' कहकर पुकारते हैं। पाकिस्तानी कट्टरपंथियों के तमाम दबावों और हमलों की आशंकाओं के बावजूद, स्थानीय बलूच समुदाय सदियों से इस पवित्र मंदिर की सुरक्षा और देखभाल पूरी निष्ठा से करता आ रहा है।
द्रविड़ भाषा ब्राहुई का हैरान करने वाला भाषाई कनेक्शन
यदि भाषाई दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जाए, तो बलूचिस्तान और भारत के बीच का संबंध अत्यंत अनूठा और गहरा दिखाई देता है। बलूचिस्तान के एक बड़े विस्तृत भूभाग, रेगिस्तानी इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी 'ब्राहुई' भाषा बोली जाती है। भाषाविदों और भाषाशास्त्रियों के अनुसार, ब्राहुई भाषा का सीधा संबंध द्रविड़ भाषा परिवार से है। यह वही भाषा परिवार है जिससे दक्षिण भारत में बोली जाने वाली तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम जैसी समृद्ध भाषाएं निकली हैं। उत्तर-पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र के दुर्गम पहाड़ों में द्रविड़ परिवार की भाषा का जीवित रहना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि प्राचीन काल में भारत के दक्षिणी राज्यों और उत्तर-पश्चिमी इलाकों के बीच व्यापारिक, सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय संपर्क बेहद सुदृढ़ थे।
वर्ष 1948 में भारत में विलय का ऐतिहासिक प्रयास
भारत और बलूचिस्तान के संबंधों में चौथा महत्वपूर्ण स्तंभ पूरी तरह से ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं पर आधारित है, जिसका संबंध 1947 के विभाजन के समय से है। उस दौर में बलूचिस्तान की सबसे बड़ी और प्रभावशाली रियासत कलात थी। कलात के तात्कालीन शासक खान ऑफ कलात किसी भी स्थिति में नवगठित देश पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे और वे कलात को एक स्वतंत्र व प्रभुत्वसंपन्न देश के रूप में बनाए रखने के पक्षधर थे। ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखों के अनुसार, 1947 और 1948 के दौरान खान ऑफ कलात ने भारत में शामिल होने की स्पष्ट इच्छा व्यक्त की थी और इस संबंध में भारतीय राजनीतिक नेतृत्व तक बाकायदा औपचारिक संदेश भी भिजवाए थे। हालांकि, उस समय की जटिल परिस्थितियों, भौगोलिक दूरी और पाकिस्तान के कूटनीतिक दबावों के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद, मार्च 1948 में पाकिस्तान ने अपनी सैन्य टुकड़ियां भेजकर बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा कर लिया। यह सैन्य कब्जा ही आगे चलकर बलूच जनता की आजादी की जंग की मुख्य वजह बना, और बलूच समाज आज भी उस दौर के राजनीतिक संपर्कों को याद रखता है।
ऑल इंडिया रेडियो का भावनात्मक व सूचनात्मक माध्यम
आधुनिक दौर में भारत और बलूचिस्तान की जनता को आपस में जोड़े रखने में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) ने एक अत्यंत मजबूत और विश्वसनीय पुल की भूमिका निभाई है। ऑल इंडिया रेडियो पिछले कई दशकों से बलूची भाषा में विशेष समाचार बुलेटिनों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विश्लेषणात्मक शो का नियमित प्रसारण करता आ रहा है। बलूचिस्तान के सुदूर, पहाड़ी और पिछड़े क्षेत्रों में, जहां स्थानीय मीडिया पर कड़े प्रतिबंध और सेंसरशिप लागू रहती है, वहां के नागरिक इस रेडियो सेवा पर गहरा विश्वास करते हैं। बलूच लोग इस प्रसारण को बेहद सम्मान की नजर से देखते हैं, क्योंकि यह उनके लिए भारत से सीधे जुड़ने और निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करने का एक बड़ा और भावनात्मक जरिया बना हुआ है।



















