बॉलीवुड में कई ऐसे फिल्म मेकर हुए हैं जिन्होंने परदे के पीछे रहकर सिनेमा का इतिहास बदल दिया। डेविड धवन का नाम हिंदी फिल्म उद्योग के उन्हीं दिग्गज निर्देशकों में शुमार है, जिन्होंने 90 के दशक में अपनी कॉमेडी फिल्मों से दर्शकों को थिएटर्स में खूब हंसाया। अगरतला में जन्मे राजिंदर धवन कैसे आगे चलकर बॉलीवुड के 'कॉमेडी किंग' डेविड धवन बने, उनका यह सफर बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायक रहा है।
अगरतला से कानपुर तक का शुरुआती सफर और नाम बदलने की कहानी
डेविड धवन का जन्म 16 अगस्त 1951 को त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में एक पंजाबी हिंदू परिवार में हुआ था। उनका शुरुआती बचपन उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में बीता। जन्म के समय परिवार ने उनका नाम राजिंदर धवन रखा था। हालांकि, उनके आसपास रहने वाले कैथोलिक पड़ोसी उन्हें बेहद प्यार से डेविड कहकर पुकारते थे। वक्त के साथ यह नाम उनके बीच इतना लोकप्रिय हो गया कि आगे चलकर राजिंदर धवन हमेशा के लिए डेविड धवन के नाम से ही पहचाने जाने लगे। उनके परिवार का जुड़ाव पहले से ही सिनेमा से था, उनके भाई अनिल धवन भी हिंदी फिल्मों में अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे।
अभिनय का सपना टूटा तो फिल्म एडिटिंग में तलाशी नई राह
अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद डेविड धवन के मन में भी फिल्मों में अभिनय करने की इच्छा जगी। इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने पुणे स्थित प्रसिद्ध फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआई) में दाखिला लिया। वहां पहुंचकर जब उनकी मुलाकात सतीश शाह और सुरेश ओबेरॉय जैसे प्रतिभावान और मंझे हुए कलाकारों से हुई, तो डेविड धवन को अपनी क्षमता का यथार्थवादी अंदाजा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि कैमरे के सामने अभिनय करना उनकी असल मंजिल नहीं है। निराश होने के बजाय उन्होंने तुरंत अपनी दिशा बदली और फिल्म संपादन यानी एडिटिंग के क्षेत्र में किस्मत आजमाने का फैसला किया।
साल 1978 में रिलीज हुई फिल्म 'लाडली' से डेविड धवन ने बतौर एडिटर अपने पेशेवर करियर की शुरुआत की। अपनी लगन और बेहतरीन काम के दम पर उन्होंने जल्द ही इंडस्ट्री में अपनी जगह बना ली। इसके बाद उन्होंने 'सारांश', 'सवेरे वाली गाड़ी' और 'इंसाफ' जैसी चर्चित फिल्मों के संपादन का काम संभाला। एडिटर के तौर पर मिली सफलता के बावजूद उनका असली मुकाम निर्देशन की दुनिया में उनका इंतजार कर रहा था।
निर्देशन में पहला कदम और गोविंदा के साथ ऐतिहासिक जोड़ी
डेविड धवन ने साल 1989 में आई फिल्म 'ताकतवर' के जरिए बतौर निर्देशक अपने करियर की नई पारी शुरू की। इस फिल्म में संजय दत्त, अनिता राज, नीलम कोठारी और गोविंदा मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म 'ताकतवर' के सेट पर ही डेविड धवन और गोविंदा की मुलाकात हुई, जिसने आगे चलकर बॉलीवुड को एक ऐतिहासिक निर्देशक-अभिनेता जोड़ी दी। 90 का दशक डेविड धवन के पूरे करियर का सबसे कामयाब और सुनहरा दौर साबित हुआ।
साल 1990 में रिलीज हुई फिल्म 'स्वर्ग' की बड़ी सफलता ने उन्हें एक भरोसेमंद निर्देशक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने 'शोला और शबनम' बनाई। साल 1993 में आई फिल्म 'आंखें' ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए। गोविंदा और चंकी पांडे के अभिनय से सजी यह एक्शन कॉमेडी फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में गिनी गई। इसके बाद डेविड और गोविंदा की जोड़ी ने 'राजा बाबू' (1994), 'कुली नंबर 1' (1995) और 'साजन चले ससुराल' (1996) जैसी एक से बढ़कर एक हिट फिल्में देकर दर्शकों का मनोरंजन किया।
सलमान खान के साथ ब्लॉकबस्टर फिल्में और करियर का नया मोड़
गोविंदा के साथ कई कामयाब फिल्में देने के बाद डेविड धवन ने सुपरस्टार सलमान खान के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। साल 1997 में रिलीज हुई फिल्म 'जुड़वा' में उन्होंने सलमान खान को डबल रोल में पेश किया। इस फिल्म की कॉमेडी और इसके गाने दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुए। इसके बाद साल 1999 में आई उनकी फिल्म 'बीवी नंबर 1' ने भी बॉक्स ऑफिस पर बेहतरीन प्रदर्शन किया।
हालांकि, 90 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के शुरुआती सालों में हिंदी सिनेमा के बदलते रुझानों के कारण डेविड धवन का पारंपारिक कॉमेडी फॉर्मूला थोड़ा कमजोर पड़ने लगा। एक दौर ऐसा आया जब उन्हें दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाए रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और साल 2004 में फिल्म 'मुझसे शादी करोगी' के साथ एक बार फिर धमाकेदार वापसी की। सलमान खान, अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा के अभिनय से सजी इस रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए झंडे गाड़े और डेविड धवन के खास अंदाज को फिर से स्थापित किया।
पारिवारिक विरासत और सिनेमा में अगली पीढ़ी
डेविड धवन भले ही खुद कैमरे के पीछे रहकर निर्देशन का काम करते रहे, लेकिन उनकी अगली पीढ़ी सिनेमा जगत में उनका नाम रोशन कर रही है। उनके बेटे वरुण धवन पर्दे पर अपनी बेहतरीन एक्टिंग से दर्शकों के दिलों में जगह बना चुके हैं। वहीं उनके दूसरे बेटे रोहित धवन कैमरे के पीछे रहकर निर्देशक के तौर पर अपने पिता की समृद्ध फिल्मी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।



















