कर्नाटक भर में एफडीए की बड़ी कार्रवाई के तहत केएफसी आउटलेट और 5 सितारा होटलों से भारी मात्रा में बासी मीट बरामदरियलिटी शो में 12 किलो वजन घटने पर सोहेल खान ने बताई वजह, ओजेंपिक की अफवाहों को बताया गलतवरिष्ठ नागरिकों के लिए 8.2 फीसदी ब्याज वाली बचत योजना की 5 साल की अवधि पूरी होने पर तुरंत उठाएं यह कदमउत्तर प्रदेश के मऊ में अमूल दूध और घर के मक्खन से बनता है खास बंद मक्खन, ₹30 में मिल रहा जबरदस्त स्वादअंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में स्पेन की ऐतिहासिक क्रांति, लगातार 21 जीत दर्ज कर रिकी पोंटिंग के ऑस्ट्रेलिया का रिकॉर्ड तोड़ागॉल टेस्ट में भारत का दबदबा, पडिक्कल के पहले शतक के दम पर टीम इंडिया 288 पर मजबूतचित्रकूट के तुलसी पीठ में बना कांच का मंदिर, रामचरितमानस के प्रसंगों और रंगीन रोशनी से मोह रहा श्रद्धालुओं का मन1500 किलोमीटर मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल के विकास में क्या हैं तकनीकी चुनौतियां और आगे का रोडमैपकर्क साप्ताहिक राशिफल 16-22 अगस्त 2026: शुरुआती भागदौड़ के बाद पारिवारिक सुख, प्रेम और करियर में मिलेगी प्रगति16 अगस्त 2026 का मूलांक 1 राशिफल, भारी जिम्मेदारियों के बीच शांत दिमाग से काम लेना दिलाएगा सफलता
1500 किलोमीटर मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल के विकास में क्या हैं तकनीकी चुनौतियां और आगे का रोडमैपबिहार
16 अग॰ 2026, 7:28 am (1 घंटे पहले)· 4

1500 किलोमीटर मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल के विकास में क्या हैं तकनीकी चुनौतियां और आगे का रोडमैप

भारत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मारक क्षमता को 1500 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है। इसके लिए रक्षा वैज्ञानिकों के सामने मिसाइल का बाहरी आकार बढ़ाए बिना ईंधन क्षमता, रैमजेट इंजन दक्षता और उन्नत नेविगेशन सिस्टम विकसित करने की बड़ी चुनौतियां हैं।

भारत की प्रसिद्ध सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस आने वाले समय में अपनी मौजूदा युद्ध क्षमताओं का व्यापक विस्तार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। ब्रह्मोस मिसाइल अपनी अचूक सटीकता और विनाशकारी प्रहार क्षमता के लिए दुनिया भर में पहचानी जाती है। इसके शक्तिशाली प्रहार का लोहा दुश्मन ही नहीं, बल्कि भारत के मित्र देश भी मानते हैं। अत्याधुनिक तकनीक से लैस इस क्रूज मिसाइल को खरीदने के लिए वैश्विक स्तर पर कई देश उत्सुकता दिखा रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में भारत के लगातार बढ़ते प्रभाव और सामरिक शक्ति से चीन, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश गहरी चिंता महसूस कर रहे हैं। ब्रह्मोस की मौजूदगी अब दक्षिण चीन सागर से लेकर भूमध्य सागर के मुहाने तक महसूस की जा रही है, जिसने क्षेत्रीय रक्षा समीकरणों में बड़ा बदलाव ला दिया है। पाकिस्तान तो पूर्व में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ब्रह्मोस के घातक प्रभाव का प्रत्यक्ष अनुभव कर चुका है। इसी पृष्ठभूमि में, भारतीय रक्षा वैज्ञानिक ब्रह्मोस के विस्तारित दूरी वाले संस्करण (एक्सटेंडेड रेंज) को विकसित करने में रात-दिन जुटे हुए हैं। हाल के महीनों में 800 से 900 किलोमीटर मारक क्षमता वाले वैरिएंट के कई सफल परीक्षण किए जा चुके हैं। अब रक्षा विशेषज्ञों के बीच 1500 किलोमीटर की दूरी तक मार करने वाले सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल संस्करण को साकार करने पर मंथन चल रहा है। हालांकि, इस महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए कई जटिल तकनीकी और इंजीनियरिंग चुनौतियों से पार पाना बेहद जरूरी है।

MTCR पाबंदियों की समाप्ति और 1500 किलोमीटर मारक क्षमता का रणनीतिक लक्ष्य

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक डॉ. जयतीर्थ राघवेंद्र जोशी के अनुसार, लंबी अवधि में मिसाइल की मारक क्षमता को 1500 किलोमीटर तक पहुंचाना एक प्रमुख रणनीतिक उद्देश्य है। यदि भारत इस क्षमता को हासिल कर लेता है, तो ब्रह्मोस केवल एक क्षेत्रीय सटीक हमला करने वाली मिसाइल नहीं रह जाएगी, बल्कि यह भारत की लंबी दूरी की पारंपरिक प्रहार क्षमता (कन्वेंशनल स्ट्राइक कैपेबिलिटी) का मुख्य आधार बन जाएगी। जब ब्रह्मोस को पहली बार भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया था, तब इसकी अधिकतम रेंज लगभग 290 किलोमीटर तक ही सीमित थी। यह सीमा किसी तकनीकी विफलता या डिजाइन की कमी के कारण नहीं थी, बल्कि मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के तहत लागू अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का परिणाम थी। रूस MTCR का संस्थापक सदस्य था, और इस संधि के नियमों के तहत 300 किलोमीटर से अधिक रेंज तथा निर्धारित पेलोड वजन वाली मिसाइल प्रणालियों के संयुक्त विकास, हस्तांतरण और निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लगे हुए थे।

ये भी पढ़ें

वर्ष 2016 में भारत को MTCR की औपचारिक सदस्यता मिली, जिसके बाद ब्रह्मोस की रेंज बढ़ाने के रास्ते खुल गए। सदस्यता मिलने के बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने क्रमिक परीक्षणों के माध्यम से मिसाइल की मारक क्षमता को पहले 450 किलोमीटर और फिर 500 किलोमीटर तक बढ़ाया। हालिया तकनीकी प्रगति के आधार पर अब ब्रह्मोस को 800 से 900 किलोमीटर श्रेणी की मारक क्षमता प्रदान की जा चुकी है। 1500 किलोमीटर की मारक क्षमता हासिल करना इस मिसाइल कार्यक्रम का अगला बड़ा तकनीकी पड़ाव है, जो भारत की सामरिक पहुंच को एक नया आयाम देगा।

बाहरी आयामों की सीमा और हल्के कंपोजिट मटीरियल का इस्तेमाल

1500 किलोमीटर की लंबी दूरी हासिल करने की राह में सबसे बड़ी चुनौती मिसाइल के बाहरी आकार (एक्सटर्नल डाइमेंशन्स) से जुड़ी है। मिसाइल के आकार को मनमुताबिक बढ़ाया नहीं जा सकता, क्योंकि इसे भारतीय नौसेना के युद्धपोतों पर लगे वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS), तटीय मोबाइल लॉन्चर (कोस्टल लॉन्चर) और भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों से दागने के लिए डिजाइन किया गया है। यदि मिसाइल का बाहरी व्यास या लंबाई बढ़ाई जाती है, तो यह मौजूदा सैन्य प्लेटफार्मों और लॉन्च ट्यूबों में फिट नहीं बैठ पाएगी। इसलिए, रक्षा वैज्ञानिकों को मिसाइल के बाहरी आयामों को लगभग समान रखते हुए अंदर अधिक ईंधन स्टोर करने और बेहतर प्रोपल्शन क्षमता हासिल करने की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

इस समस्या के समाधान के लिए आधुनिक कंपोजिट सामग्रियों का इस्तेमाल बेहद महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। मिसाइल के निर्माण में पारंपरिक धातुओं की जगह कार्बन-फाइबर जैसे हल्के और अत्यधिक मजबूत कंपोजिट मटीरियल का उपयोग किया जा रहा है। कार्बन-फाइबर कंपोजिट मिसाइल की मुख्य संरचना और आंतरिक घटकों का कुल वजन काफी हद तक कम कर देते हैं। वजन में इस बचत का सीधा फायदा यह होता है कि मिसाइल के अंदर उपलब्ध स्थान और कुल वजन क्षमता का बड़ा हिस्सा अतिरिक्त लिक्विड फ्यूल के लिए आरक्षित किया जा सकता है। इस प्रकार, मिसाइल के भौतिक आकार को बढ़ाए बिना उसकी ईंधन धारण क्षमता और उड़ान दूरी को बढ़ाना संभव हो जाता है।

रैमजेट इंजन की दक्षता और स्वदेशी बूस्टर तकनीक में सुधार

ब्रह्मोस मिसाइल की सबसे बड़ी ताकत इसका लिक्विड फ्यूल रैमजेट इंजन है, जो इसे अपनी पूरी उड़ान के दौरान सुपरसोनिक (ध्वनि की गति से तेज) रफ्तार बनाए रखने में सक्षम बनाता है। 1500 किलोमीटर की विशाल दूरी तय करने के लिए रैमजेट इंजन की ईंधन खपत दर, दहन दक्षता (कम्ब्यूस्टन एफिशिएंसी) और वायु प्रवाह (एयरफ्लो) प्रबंधन को अत्यधिक उन्नत बनाना होगा। मिसाइल के आंतरिक फ्यूल टैंकों के डिजाइन में संरचनात्मक बदलाव करके कम जगह में अधिक ईंधन संचित करने की तकनीक पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा, बूस्टर सिस्टम में सुधार भी दूरी बढ़ाने का एक अहम जरिया है।

भारत पहले ही मूल रूप से इस्तेमाल होने वाले रूसी सॉलिड प्रोपेलेंट बूस्टर को हटाकर अपने स्वदेशी डिजाइन वाले सॉलिड बूस्टर को मिसाइल में शामिल कर चुका है। 1500 किलोमीटर वाले भावी संस्करणों के लिए अधिक ऊर्जा घनत्व वाले प्रोपेलेंट, हल्के कंपोजिट बूस्टर केसिंग और अनुकूलित थ्रस्ट प्रोफाइल का विकास किया जा रहा है। उन्नत बूस्टर मिसाइल को लॉन्च के तुरंत बाद शुरुआती चरण में अधिक तेजी और कुशलता से गति प्रदान करेगा। इससे रैमजेट इंजन के सक्रिय होने से पहले ही मिसाइल आवश्यक ऊंचाई और अत्यधिक उच्च गति हासिल कर लेगी। जब बूस्टर अलग होगा और रैमजेट इंजन चालू होगा, तब मिसाइल कम ईंधन खर्च करके लंबी दूरी तय करने की स्थिति में होगी, जिससे कुल रेंज में उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव हो पाएगी।

क्रूज उड़ान पथ का पुनर्गठन और सी-स्किमिंग टर्मिनल अटैक

मिसाइल की मारक क्षमता को 1500 किलोमीटर तक बढ़ाने में उड़ान पथ (फ्लाइट ट्रेजेक्टरी) का प्रबंधन सबसे निर्णायक भूमिका निभाता है। कम ऊंचाई पर उड़ान भरने पर हवा का दबाव और प्रतिरोध (ड्रैग) अधिक होता है, जिससे मिसाइल के इंजन को गति बनाए रखने के लिए अधिक ईंधन जलाना पड़ता है। 1500 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए मिसाइल को उच्च ऊंचाई (हाई-ऑल्टीट्यूड) पर क्रूज कराने की रणनीति बनाई गई है, जहां वायुमंडल की परत पतली होने के कारण हवा का ड्रैग बहुत कम होता है। उच्च ऊंचाई पर क्रूज करने से ईंधन की खपत में भारी कमी आती है, जिससे मिसाइल लंबी दूरी तय कर पाती है।

लक्ष्य के करीब पहुंचने पर, मिसाइल तेजी से नीचे की ओर गोता (डाइव) लगाती है और समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ान भरते हुए (सी-स्किमिंग) आगे बढ़ती है। यह दोहरी उड़ान तकनीक मिसाइल को दुश्मन के रडार और वायु रक्षा प्रणालियों की नजरों से छिपाने में मदद करती है। टर्मिनल चरण (अंतिम हमले) में समुद्र की सतह से महज कुछ मीटर ऊपर उड़ते हुए सुपरसोनिक गति बनाए रखना ब्रह्मोस को अभेद्य बनाता है। दुश्मन के एंटी-मिसाइल सिस्टम को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है, जिससे मिसाइल की हमले की सफलता दर लगभग 100 प्रतिशत बनी रहती है।

उन्नत मार्गदर्शन प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध रोधी क्षमता

1500 किलोमीटर की लंबी दूरी पर सटीक हमला करने के लिए मिसाइल के नेविगेशन और लक्ष्य पहचान प्रणाली (टार्गेट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) को अत्यधिक उन्नत बनाना अनिवार्य है। इतनी लंबी दूरी तय करते समय मामूली सी दिशात्मक त्रुटि भी मिसाइल को लक्ष्य से भटका सकती है। इसलिए, मिसाइल में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS), सैटेलाइट नेविगेशन, टेरेन रेफरेंस नेविगेशन और आधुनिक टर्मिनल सीकर तकनीक का एक एकीकृत संयोजन इस्तेमाल किया जा रहा है। मिसाइल की उड़ान के शुरुआती और मध्य चरण में इनर्शियल और सैटेलाइट नेविगेशन इसे सटीक रास्ते पर बनाए रखते हैं। वहीं, अंतिम चरण में आधुनिक एक्टिव/पैसिव रडार सीकर और टेरेन रेफरेंस सिस्टम लक्ष्य की सटीक पहचान करके उस पर सटीक प्रहार सुनिश्चित करते हैं।

इसके अतिरिक्त, आधुनिक युद्धक्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर) की चुनौतियां तेजी से बढ़ी हैं। दुश्मन देश सैटेलाइट सिग्नल में रुकावट (जैगिंग) पैदा कर सकते हैं। इससे निपटने के लिए ऑनबोर्ड कंप्यूटिंग पावर और एडवांस्ड सॉफ्टवेयर को अपग्रेड किया गया है, जिससे मिसाइल जीपीएस-मुक्त (GPS-denied) माहौल में भी बिना किसी बाहरी सिग्नल के अपने आंतरिक सेंसरों और एल्गोरिदम के दम पर लक्ष्य को सफलतापूर्वक नष्ट कर सकती है।

सवाल-जवाब

ब्रह्मोस मिसाइल के नए वैरिएंट के लिए कितनी मारक क्षमता का लक्ष्य रखा गया है?
ब्रह्मोस एयरोस्पेस लंबी अवधि में सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की मारक क्षमता को बढ़ाकर लगभग 1500 किलोमीटर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर काम कर रहा है।
ब्रह्मोस की मारक क्षमता शुरुआत में 290 किलोमीटर तक क्यों सीमित थी?
अंतरराष्ट्रीय MTCR संधि की पाबंदियों के कारण शुरुआत में रेंज 290 किमी तक सीमित थी, क्योंकि रूस इसका संस्थापक सदस्य था। भारत के 2016 में MTCR में शामिल होने के बाद रेंज बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।
ब्रह्मोस की रेंज 1500 किलोमीटर करने में सबसे मुख्य भौतिक चुनौती क्या है?
मिसाइल का बाहरी आकार नहीं बढ़ाया जा सकता, क्योंकि इसे भारतीय नौसेना के VLS, कोस्टल लॉन्चर और वायुसेना के Su-30MKI विमानों के साथ अनुकूल बनाए रखना जरूरी है।
1500 किलोमीटर रेंज हासिल करने के लिए मिसाइल में क्या तकनीकी बदलाव किए जा रहे हैं?
इंजीनियर कार्बन-फाइबर कंपोजिट मटीरियल से वजन घटा रहे हैं, लिक्विड फ्यूल रैमजेट इंजन की दक्षता बढ़ा रहे हैं और स्वदेशी सॉलिड बूस्टर को अपग्रेड कर रहे हैं।
लंबी दूरी की उड़ान के दौरान ब्रह्मोस दुश्मन के रडार से कैसे बचेगी?
यह मिसाइल हवा के कम दबाव वाले उच्च ऊंचाई क्षेत्र में क्रूज करेगी और लक्ष्य के पास पहुंचकर सी-स्किमिंग (समुद्र की सतह के बेहद करीब) सुपरसोनिक हमला करेगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 1

Rohan Verma@rohan-verma·14 मिनट पहले

ब्रह्मोस की मारक क्षमता 1500 किमी तक ले जाने का यह लक्ष्य रक्षा आत्मनिर्भरता और सामरिक दबाव के लिहाज से मील का पत्थर साबित होगा। एमटीसीआर नियमों के हटने से जो तकनीकी रास्ते खुले हैं, उनसे पड़ोसी देशों की नींद उड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, बाहरी आकार को बिना बदले ईंधन दक्षता और रैमजेट तकनीक में सुधार करना वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, जिसका सीधा असर भविष्य के भू-राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR