भारतीय सिनेमा के नब्बे का दशक सुरीले संगीत और मनमोहक रचनाओं के लिए हमेशा याद किया जाता है। उस दौर के गीतों में ऐसी कशिश थी जो बिना किसी तड़क-भड़क के सीधे सुनने वालों की रूह तक उतर जाती थी। स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने गायन से कई पीढ़ियों के जज्बातों को अभिव्यक्ति दी। चाहे पहला प्यार हो या किसी को चाहने की मासूम उमंग, उनके गाए सुरों में हर भावना जीवंत हो उठती थी। इसी सिलसिले में साल 1995 की बेहद चर्चित फिल्म का एक खास गीत आज भी लोगों की जुबां पर बना हुआ है, जिसमें एक चुलबुले अंदाज के जरिए दिल के अरमान बयां किए गए थे।
नब्बे के दशक की एक यादगार प्रस्तुति
साल 1995 में सिनेमाघरों में उतरी फिल्म ‘करण अर्जुन’ अपने दौर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। इस फिल्म की कहानी पुनर्जन्म और बदले के रोमांचक सफर पर टिकी थी, जिसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। निर्देशक और निर्माता राकेश रोशन ने इस प्रोजेक्ट को बहुत भव्य तरीके से तैयार किया था। इस फिल्म की अपार कामयाबी में इसकी संगीतबद्ध रचनाओं ने रीढ़ की हड्डी का काम किया। एक्शन और ड्रामे से भरपूर इस कहानी के बीच ‘एक मुंडा मेरी उम्र दा’ नामक गीत ने एक अलग ही ताजगी घोल दी थी। इस गाने में युवा मन की सहज आकांक्षाओं को बेहद नटखट तरीके से पेश किया गया था।
ममता कुलकर्णी और सलमान की मनमोहक जुगलबंदी
इस गीत के दृश्य संयोजन में ममता कुलकर्णी ने अपनी अदाकारी से जान डाल दी थी। पर्दे पर सलमान खान के साथ उनकी जोड़ी और दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ने दर्शकों को पूरी तरह बांध लिया था। उस जमाने में लड़कियां अपने जीवनसाथी की पसंद को लेकर अक्सर खुलकर नहीं बोल पाती थीं, लेकिन इस गीत के जरिए उस हिचकिचाहट को बड़ी सहजता से दूर किया गया। गीत में एक युवती अपने हमउम्र जीवनसाथी के सपने सजाती नजर आती है, जिसकी मौजूदगी उसके मन को खुशी और उमंग से भर देती है। ममता का सहज और चुलबुला अभिनय इस गाने को देखने में भी उतना ही लुभावना बनाता है जितना यह सुनने में लगता है।
राजेश रोशन का संगीत और इंदीवर के बोल
संगीत की दुनिया के जाने-माने फनकार राजेश रोशन, जो सुपरस्टार ऋतिक रोशन के चाचा हैं, उन्होंने इस फिल्म के समूचे एल्बम की रचना की थी। इस खास गाने के लिए उन्होंने पारंपरिक लोकधुनों का ऐसा ताना-बाना बुना, जिसमें उस दौर के आधुनिक बीट्स का संतुलित तालमेल देखने को मिला। इसी वजह से धुन बजते ही लोग खुद को थिरकने से रोक नहीं पाते थे। वहीं दूसरी तरफ, गीतकार इंदीवर ने बेहद सरल, सीधे और दिलकश शब्दों का चयन किया। इन आसान बोलों के चलते यह गाना समाज के हर तबके में तुरंत लोकप्रिय हो गया और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की जुबां पर चढ़ गया।
शादियों और महफिलों में आज भी बरकरार है जादू
भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर के अमर सुरों ने इस गाने को एक कालजयी पहचान दी। उनकी जादुई गायकी का ही कमाल है कि रिलीज के कई दशक गुजर जाने के बावजूद इसकी चमक जरा भी फीकी नहीं पड़ी है। आज भी शादी-ब्याह के समारोहों, पारिवारिक आयोजनों और नब्बे के दशक के नॉस्टैल्जिया को ताजा करने वाली पार्टियों में यह गाना पहली पसंद बना रहता है। यह गीत इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जब उम्दा गायकी, सधा हुआ संगीत और सीधे बोल एक साथ आते हैं, तो वह रचना सदियों तक जिंदा रहती है।















