भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी रचनाएं दर्ज हैं जो समय के बंधनों को पूरी तरह तोड़कर अमर हो जाती हैं। इन नगमों को सुनने के लिए किसी खास माहौल या मौके की दरकार नहीं होती, बल्कि इनकी धुन बजते ही श्रोता भावनाओं के गहरे समंदर में उतर जाता है। ऐसा ही एक अविस्मरणीय गीत है ‘दिल हुमहुम करे’, जिसे फिल्म रुदाली के लिए तैयार किया गया था। इस गीत की खासियत यह है कि इसमें स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जादुई गायन, गीतकार गुलजार के मर्मस्पर्शी शब्द और पर्दे पर अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया का संजीदा अभिनय एक साथ मिलकर एक अद्भुत अहसास रचते हैं। वक्त गुजरने के साथ इस गीत का असर कम होने के बजाय और गहराता चला गया है।
ग्लैमर से इतर डिंपल कपाड़िया का सशक्त अभिनय
डिंपल कपाड़िया ने जब अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी, तब पहली ही ब्लॉकबस्टर फिल्म से उन्होंने दर्शकों के दिलों पर राज करना शुरू कर दिया था। उस दौर में उनके ग्लैमरस अंदाज ने फिल्म जगत को चौंका दिया था और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि, साल 1993 में रिलीज हुई फिल्म ‘रुदाली’ में उनका एक बिल्कुल अलग और अप्रत्याशित रूप देखने को मिला। पारंपरिक ग्लैमरस किरदारों की छवि से पूरी तरह बाहर निकलकर उन्होंने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई थी। पर्दे पर उनके द्वारा जिए गए किरदार की वेदना और संजीदगी ने उन्हें एक गंभीर अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया। ‘दिल हुमहुम करे’ में उनके चेहरे के हाव-भाव ने गीत की गहराई को कई गुना बढ़ा दिया था।
फिल्म रुदाली की आत्मा बना यह गीत
साल 1993 की चर्चित फिल्म ‘रुदाली’ की कहानी और उसके सभी पात्र जितने संवेदनशील थे, उसका संगीत भी उतना ही बेमिसाल था। यह गीत केवल कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया भर नहीं था, बल्कि मुख्य किरदार की भीतरी कशमकश को बयां करने का सबसे मजबूत माध्यम साबित हुआ। इस गीत के माध्यम से प्रेम की तड़प, अकेलापन, विरह का लंबा इंतजार और दिल के भीतर उठने वाले मौन तूफानों को बड़ी नफासत से दर्शाया गया था। यही कारण रहा कि यह रचना साधारण फिल्मी गीतों के दायरे से ऊपर उठकर संगीत के कद्रदानों के लिए एक निजी अहसास में तब्दील हो गई।
लता मंगेशकर के स्वरों की अलौकिक मिठास
इस गीत को अपनी सुरीली आवाज से सजाने का काम लता मंगेशकर ने किया था। उनकी गायकी का दर्द और सुरों की मिठास शब्दों को सीधे श्रोता के अंतर्मन तक पहुंचा देती है। लता मंगेशकर के फन की यह सबसे बड़ी खूबी रही है कि वे सबसे सरल शब्दों में भी अपनी गायकी के जरिए असाधारण जान फूंक देती थीं। जब ‘दिल हुमहुम करे’ बजता है, तो ऐसा लगता है मानो पर्दे पर मौजूद किरदार का मौन दर्द सुरों की शक्ल में बह निकला हो। तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी जब यह धुन कानों में पड़ती है, तो आज भी लोग भावुक हो उठते हैं।
गुलजार की कालजयी कलम और भावनाओं की अभिव्यक्ति
किसी भी अमर गीत की नींव उसकी शायरी होती है, और इस गीत को कालजयी बनाने का श्रेय पूरी तरह गुलजार की लेखनी को जाता है। गुलजार मानवीय मन की जटिलताओं और अनकहे जज्बातों को शब्दों में पिरोने के अपने अनोखे अंदाज के लिए जाने जाते हैं। इस गीत में उन्होंने मन की घबराहट, आंतरिक बेचैनी और दिल की धड़कनों को ऐसे शब्दों में ढाला जो सुनने वाले को अपनी ही जिंदगी का हिस्सा लगते हैं। आज रिलीज के 33 साल का लंबा सफर तय करने के बाद भी इस गीत की लोकप्रियता में रत्ती भर कमी नहीं आई है।















