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मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी दो पंक्तियां कैसे बनीं राज कपूर की तीसरी कसम का अमर गीतबॉलीवुड
20 सित॰ 2026, 12:30 am (38 दिन पहले)· 0

मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी दो पंक्तियां कैसे बनीं राज कपूर की तीसरी कसम का अमर गीत

जेल में बंद मजरूह सुल्तानपुरी की आर्थिक मदद के लिए राज कपूर ने उनसे एक मुखड़ा लिखवाया था, जो 17 साल बाद फिल्म तीसरी कसम का सदाबहार गाना बना।

आजादी के तुरंत बाद का दौर भारतीय सिनेमा और अदब दोनों के लिए बेहद हलचल भरा था। उस जमाने में एक क्रांतिकारी शायर अपनी बेबाक नज्मों और गजलों से मुशायरों में अलग ही पहचान बना रहे थे। मशहूर अभिनेता बलराज साहनी उनके करीबी दोस्तों में शामिल थे। एक बार मजदूरों की एक सभा का आयोजन हुआ, जिसमें इन शायर को आमंत्रित किया गया था। जब वे बलराज साहनी के साथ उस सम्मेलन में पहुंचे, तो वहां मौजूद कामगारों ने उनसे अपने मिजाज के मुताबिक कुछ क्रांतिकारी पंक्तियां सुनाने की अपील की।

शायर ने मजदूरों की दरख्वास्त पर अपनी कुछ तल्ख पंक्तियां मंच से पढ़ीं, जिनमें व्यवस्था पर सीधा कटाक्ष था। उन पंक्तियों के बोल कुछ यूं थे, 'दिल में ख्वाब डॉलर का बसाकर फिरती है भारत की अहिंसा।' सभा में मौजूद लोगों ने इन शब्दों को हाथों-हाथ लिया और खूब तालियां बजाईं। इस शायरी की चर्चा तेजी से फैली, लेकिन हुकूमत और सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ लोगों को यह तीखा तंज बिल्कुल पसंद नहीं आया। नतीजतन, इस रचना की वजह से शायर और बलराज साहनी दोनों को दो साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

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मुश्किल घड़ी में राज कपूर की अनूठी मदद

जब इस क्रांतिकारी गीतकार को जेल में बंद किया गया, तब उनके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। उनकी पत्नी गर्भवती थीं और घर में आर्थिक तंगी चरम पर थी। जब शोमैन राज कपूर को इस नाजुक स्थिति की जानकारी मिली, तो वे चुप नहीं बैठ सके और उन्होंने अपने साथी कलाकार की मदद करने की ठानी। वे जानते थे कि सामने वाला शायर बेहद खुद्दार है और कोई भी मुफ्त की माली इमदाद या खैरात कभी कबूल नहीं करेगा।

राज कपूर ने जेल पहुंचकर उनसे मुलाकात की और एक रचनात्मक रास्ता निकाला। उन्होंने गीतकार से कहा कि वे सृष्टि और इस जहान पर एक नया तराना चाहते हैं, इसलिए वे इस पर कुछ विचार लिखें कि यह दुनिया क्यों और कैसे बनी। उस शायर ने फौरन कागज पर एक मुखड़ा रच दिया, जिसके अमर बोल थे, 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई, काहे को दुनिया बनाई।' यह कलम किसी और की नहीं बल्कि मजरूह सुल्तानपुरी की थी। राज कपूर ने उस मुखड़े के एवज में उन्हें 1000 रुपये थमा दिए, जो 1948-49 के दौर में बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। इस तरह मजरूह के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए बिना उनके परिवार को जरूरी सहारा मिल गया।

17 साल का लंबा इंतजार और तीसरी कसम

इस घटना के बाद वक्त का पहिया घूमता रहा और पूरे 17 साल का लंबा अरसा बीत गया। जब राज कपूर अपनी ऐतिहासिक फिल्म 'तीसरी कसम' के निर्माण में जुटे थे, तब मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी वे दो पंक्तियां अचानक फिर चर्चा में आईं। राज कपूर ने वह पुराना मुखड़ा मशहूर गीतकार शैलेंद्र के सामने रखा। हालांकि शैलेंद्र उस वक्त फिल्म के निर्माता होने के नाते अन्य व्यवस्थाओं में बहुत व्यस्त चल रहे थे, इसलिए उन्होंने यह मुखड़ा गीतकार हसरत जयपुरी को सौंप दिया और उनसे पूरा गीत तैयार करने का आग्रह किया।

हसरत जयपुरी ने मजरूह के उस ऐतिहासिक मुखड़े के आगे शानदार अंतरे लिखे और पूरे गीत को मुकम्मल शक्ल दी। इस रचना को संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने अपनी धुन से सजाया, जबकि पार्श्वगायक मुकेश ने इसे अपनी दर्दभरी आवाज देकर हमेशा के लिए अमर बना दिया। जब यह पूरा गाना तैयार होकर मजरूह सुल्तानपुरी के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने बड़े दिल का परिचय देते हुए पूरा क्रेडिट हसरत जयपुरी को ही देने की बात कही। यही वजह है कि आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इस गीत के रचनाकार के तौर पर हसरत जयपुरी का नाम दर्ज है, मगर इतिहास के पन्नों में यह हकीकत हमेशा दर्ज रहेगी कि इसके मूल मुखड़े का जन्म जेल में बंद मजरूह सुल्तानपुरी की कलम से हुआ था।

सवाल-जवाब

मजरूह सुल्तानपुरी और बलराज साहनी को जेल क्यों हुई थी?
मजदूरों की सभा में भारत की तत्कालीन नीतियों और अहिंसा पर व्यंग्य करती क्रांतिकारी कविता पढ़ने के कारण उन्हें दो साल की जेल हुई थी।
राज कपूर ने जेल में मजरूह सुल्तानपुरी को 1000 रुपये क्यों दिए थे?
मजरूह के परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए राज कपूर ने उनसे 'दुनिया बनाने वाले' गीत का मुखड़ा लिखवाकर मानदेय के रूप में 1000 रुपये दिए थे।
गाना 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई' किस फिल्म में इस्तेमाल हुआ?
यह प्रसिद्ध गीत उस वाकये के 17 साल बाद राज कपूर की फिल्म 'तीसरी कसम' में इस्तेमाल किया गया था।
फिल्म तीसरी कसम में इस गीत का आधिकारिक क्रेडिट किसे मिला है?
इस गीत के अंतरे हसरत जयपुरी ने लिखे थे और मजरूह की सहमति के बाद आधिकारिक रिकॉर्ड में गीतकार का क्रेडिट हसरत जयपुरी को ही दिया गया।
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टिप्पणियाँ 5

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

यह वाकया सिनेमा और साहित्य के उस दौर का आईना है जब वैचारिक आज़ादी और मानवीय रिश्ते व्यावसायिक समीकरणों से ऊपर थे। जेल की सलाखों के पीछे रचे गए एक मुखड़े का सत्रह साल बाद ब्लॉकबस्टर फिल्म में इस्तेमाल होना इस बात का सबूत है कि उत्कृष्ट कला समय की सीमाओं से परे होती है। कला, सत्ता और आपसी सौहार्द के ऐसे ऐतिहासिक दृष्टांत आज के प्रतिस्पर्धी और वैचारिक रूप से बंटे हुए दौर में प्रेरणा का बड़ा स्रोत हैं।

Aisha Khan@aisha-khan·38 दिन पहले

मजरूह सुल्तानपुरी और राज कपूर की यह कहानी सिनेमाई इतिहास का एक दुर्लभ दस्तावेज है, जो यह बताता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों और वैचारिक मतभेदों के बावजूद कला और स्वाभिमान का सम्मान किया जाता था। 1948 में गढ़ा गया वह मुखड़ा सत्रह साल बाद 'तीसरी कसम' का हिस्सा बना, जो यह साबित करता है कि क्लासिक रचनाएं समय की सीमाओं से परे होती हैं और आज के दौर में जब संगीत और रिश्तों का व्यावसायिकरण बढ़ गया है, यह वाकया हमें हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग के मानवीय और रचनात्मक मूल्यों की याद दिलाता है।

Michael Anderson@michael-anderson·38 दिन पहले

माइकल एंडरसन के बतौर अमेरिका संवाददाता के अनुभव से देखा जाए तो, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता के बीच का यह संघर्ष सिर्फ भारतीय सिनेमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर राजनीतिक सत्ता और स्वतंत्र कलाकारों के स्थायी तनाव को दर्शाता है। आर्थिक संकट के समय एक कलाकार की गरिमा को बचाते हुए उसका सहयोग करने का राज कपूर का तरीका यह रेखांकित करता है कि संकट के दौर में संस्थागत दबाव के बावजूद कलात्मक स्वायत्तता और मानवीय संवेदनाएं किस तरह जीवित रहती हैं।

Tanvi Desai@tanvi-desai·38 दिन पहले

क्लासिक सिनेमा के इतिहास में इस तरह के किस्से आज के डिजिटल एरा में कंटेंट मार्केटिंग और वायरल स्टोरीज के दौर के लिए एक बेहतरीन केस स्टडी हैं। यह दिखाता है कि कैसे एक दौर का क्रिएटिव कोलैबरेशन और आपसी सम्मान दशकों बाद भी दर्शकों को सिनेमाघरों और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर बांधे रखने की ताकत रखता है।

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·38 दिन पहले

तन्वी ने सही कहा कि यह किस्सा आज की वायरल कहानियों जैसा है, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस और ट्रेड के नजरिए से यह भारतीय सिनेमा के शुरुआती दिनों के उस स्टूडियो एरा की व्यावसायिक और मानवीय नैतिकता को भी उजागर करता है, जहाँ व्यक्तिगत संबंध और बौद्धिक संपदा का लेन-देन आज के कॉर्पोरेट अनुबंधों से बिल्कुल अलग था। यह उस दौर के गीत-संगीत की दीर्घकालिक कमर्शियल वैल्यू को भी साबित करता है जो आज भी फिल्मों के री-रिलीज और ओटीटी ट्रेंड्स में दर्शकों को खींचने की ताकत रखता है।

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