हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई गीत दर्ज हैं, जिनकी रचना केवल कागज और कलम का खेल नहीं थी बल्कि जिंदगी के कड़े संघर्षों की गवाही थी। मशहूर गीतकार और प्रख्यात उर्दू शायर मजरूह सुल्तानपुरी के जीवन से जुड़ा एक ऐसा ही यादगार वाकया है, जब सलाखों के पीछे रचे गए उनके शब्दों ने भारतीय सिनेमा को एक अमर गीत दिया। 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे मजरूह अपनी बेबाक शायरी और प्रगतिशील लेखक आंदोलन से गहरे जुड़ाव के लिए जाने जाते थे। सामाजिक सरोकारों पर मुखर होकर लिखना और अपनी मान्यताओं पर अडिग रहना उनकी पहचान थी।
वैचारिक लड़ाई और जेल की मुश्किलें
1940 के दशक के अंतिम वर्षों में भारत का राजनीतिक परिदृश्य भारी उठापटक और तनाव के दौर से गुजर रहा था। मजरूह सुल्तानपुरी की वामपंथी विचारधारा और तत्कालीन सरकारी नीतियों के खिलाफ लिखी गई तल्ख कविताओं के कारण हुकूमत ने उनके खिलाफ सख्त कदम उठाया। इसी कार्रवाई के चलते उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। कारागार की कठिन परिस्थितियों के बावजूद मजरूह का हौसला नहीं टूटा। उन्होंने मुश्किल दिनों में भी अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को नहीं रोका और जेल की कोठरी में रहकर भी निरंतर लिखते रहे।
राज कपूर की पेशकश और आत्मसम्मान की मिसाल
मजरूह के जेल चले जाने के बाद बाहर उनका परिवार भीषण आर्थिक तंगी से घिर गया। घर का दैनिक खर्च चलाना भी मुश्किल साबित हो रहा था, क्योंकि परिवार के मुखिया जेल में बंद थे और उनके लिए किसी तरह की कमाई का जरिया नहीं बचा था। जब हिंदी सिनेमा के जाने-माने फिल्मकार राज कपूर को मजरूह के परिवार के इस संकट का पता चला, तो वह बेहद चिंतित हुए। राज कपूर उनके असाधारण हुनर के मुरीद थे और इस कठिन समय में उनकी आर्थिक मदद करना चाहते थे।
राज कपूर ने जेल में मजरूह को सीधे तौर पर आर्थिक सहायता की पेशकश की। मजरूह ने पूरी विनम्रता के साथ इस मदद को स्वीकार करने से मना कर दिया। वह अपने आत्मसम्मान को लेकर बेहद सजग थे और किसी भी सूरत में बिना मेहनत के पैसे या खैरात लेना पसंद नहीं करते थे। मजरूह ने स्पष्ट कहा कि अगर सहायता करनी ही है, तो उन्हें किसी गीत का काम दिया जाए ताकि वह अपने हुनर और पसीने की कमाई से परिवार का भरण-पोषण कर सकें। मजरूह के इस स्वाभिमान का सम्मान करते हुए राज कपूर ने उनसे एक गीत लिखने का सौदा तय किया। उस दौरान मजरूह के पास जेल में ही लिखी हुई एक विशेष रचना मौजूद थी, जिसे उन्होंने राज कपूर को सौंप दिया।
धरम करम में गूंजे वे अमर बोल
जेल में लिखी गई यह रचना तुरंत किसी फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुई, बल्कि लंबे समय तक सहेज कर रखी गई। कई वर्षों के अंतराल के बाद राज कपूर ने अपनी फिल्म ‘धरम करम’ में इन पंक्तियों को शामिल करने का फैसला किया। इस रचना को संगीतकार आरडी बर्मन ने अपनी खास धुनों में ढाला, जबकि गायक मुकेश ने अपनी दर्दभरी और असरदार आवाज से इसे हमेशा के लिए अमर बना दिया। ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ शीर्षक वाले इस गीत ने जीवन के शाश्वत सत्य को बहुत गहराई से पेश किया।
यह गीत इंसानी नश्वरता और उसके कर्मों के महत्व को रेखांकित करता है। संसार से हर इंसान को एक न एक दिन विदा होना है, लेकिन उसके पीछे उसके नेक काम, उसकी वाणी और उसके विचार ही लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहते हैं। यही दार्शनिक भाव इस गीत को आज भी श्रोताओं के बीच बेहद प्रासंगिक और लोकप्रिय बनाए रखता है।
सिनेमा को समृद्ध करने वाली विरासत
मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने कई दशकों के शानदार करियर में भारतीय सिनेमा को अनगिनत यादगार गीतों का उपहार दिया। उन्होंने हिंदी फिल्म जगत के कई अलग-अलग पीढ़ियों के संगीत निर्देशकों के साथ मिलकर काम किया और हर दौर में अपनी लेखनी की छाप छोड़ी। उनके लिखे नगमों में प्रेम, विरह, मानवीय रिश्तों और जीवन के गूढ़ फलसफे का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
सिनेमा और साहित्य में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया। मजरूह सुल्तानपुरी की यह जीवन यात्रा स्पष्ट करती है कि विकट से विकट हालात भी सच्चे कलाकार के स्वाभिमान और उसकी प्रतिभा को दबा नहीं सकते। ‘इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ जैसे बोल आज भी उनकी कलम की ताकत, विचार की गहराई और गौरवमयी विरासत का सजीव प्रमाण हैं।


















