भारतीय सिनेमा के 1990 के दौर में बने मेलोडियस नगमों का असर आज भी श्रोताओं के दिलों में गहराई से महसूस किया जाता है। उसी स्वर्णिम दौर में रिलीज हुई फिल्म 'मोहरा' का बेहद चर्चित गीत 'ना कजरे की धार' प्रेम और सादगी का प्रतीक बनकर उभरा था। सुनील शेट्टी पर फिल्माया गया यह गाना रिलीज के दशकों बाद भी पुरानी यादों को ताजा कर देता है और हर पीढ़ी के आशिकों के दिलों की बात बयां करता है।
सादगी भरे बोल और दिल छू लेने वाला संगीत
इस यादगार रचना को अपनी मखमली आवाज से पंकज उधास और साधना सरगम ने सजाया था। गाने के बोल बाहरी दिखावे और बनावटी खूबसूरती से परे जाकर सच्चे जज्बातों और आत्मिक जुड़ाव को रेखांकित करते हैं। इसमें बताया गया है कि प्रेम में किसी कृत्रिम श्रृंगार की जरूरत नहीं होती, बल्कि मन की पवित्रता और रिश्ते का गहरा समर्पण ही सबसे ज्यादा मायने रखता है।
सिनेमाई पर्दे से परे बना दिलों का तराना
यही वजह रही कि यह रचना महज एक आम फिल्मी ट्रैक तक सीमित नहीं रही, बल्कि मोहब्बत को महसूस करने वाले हर इंसान के निजी अहसासों का हिस्सा बन गई। 'मोहरा' की सफलता के साथ ही इस गीत की संजीदगी ने इसे भारतीय संगीत इतिहास की उन चुनिंदा रचनाओं में शामिल करा दिया, जिनकी ताजगी समय बीतने के बाद भी फीकी नहीं पड़ती।

















