हिंदी सिनेमा के इतिहास में राज कपूर और नरगिस की ऑन-स्क्रीन जोड़ी को सबसे पसंदीदा और कामयाब जोड़ियों में गिना जाता है। 50 और 60 के दशक के दौरान इस लोकप्रिय जोड़ी ने दर्शकों को कई यादगार और सदाबहार फिल्में दीं। इसी सिलसिले में साल 1955 में सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई फिल्म श्री 420 ने सफलता के नए आयाम गढ़े थे। यह फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त रूप से सफल रही बल्कि दर्शकों के दिलों में भी अपनी खास जगह बनाने में कामयाब हुई। श्री 420 की असली खूबी सिर्फ राज कपूर और नरगिस की बेहतरीन केमिस्ट्री या इसकी मनोरंजक कहानी तक सीमित नहीं थी। यह फिल्म उस दौर के नए आजाद भारत की महत्वाकांक्षाओं, सामाजिक चिंताओं, गरीबी, लालच और तेजी से बदलते मानवीय दृष्टिकोण को भी बहुत गहराई से उजागर करती थी।
ढाबे के तेलुगु वेटर से जुड़ी है 'रमैय्या वस्तावैय्या' बनने की कहानी
यूं तो फिल्म श्री 420 का पूरा म्यूजिक एल्बम ही सुपरहिट साबित हुआ था और इसके सभी गाने आज भी चाव से सुने जाते हैं। लेकिन फिल्म के बेहद लोकप्रिय ट्रैक रमैय्या वस्तावैय्या के तैयार होने की कहानी बेहद दिलचस्प और रोचक है। फिल्म की पटकथा में जब मुख्य किरदार राजू धन-दौलत और चकाचौंध से भरी बंबई की दुनिया में भटक जाता है, तब रमैय्या वस्तावैय्या गाना ही उसे उसकी जड़ों, उसके अपने लोगों और नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है। यह गीत कहानी के मोड़ को फिर से आम समाज और सामूहिकता के भाव की ओर मोड़ देता है।
इस गाने के मुखड़े के पीछे एक ऐतिहासिक किस्सा जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि फिल्म के संगीतकार जिस स्थानीय ढाबे पर बैठकर अपनी धुनों पर चर्चा करते थे, वहां रमैय्या नाम का एक तेलुगु वेटर काम करता था। संगीतकार जोड़ी के सदस्य शंकर तेलुगु भाषा को अच्छी तरह समझते थे। ढाबे पर बातचीत के दौरान ही रमैय्या वस्तावैय्या जैसे शब्द उनके ध्यान में आए। बाद में इन्हीं शब्दों को आधार बनाकर शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के साथ मिलकर एक ऐसा शानदार गाना तैयार किया गया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अमर हो गया।
धारा 420 और सामाजिक व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य
फिल्म के शीर्षक श्री 420 में भी एक गहरा सामाजिक संदेश और व्यंग्य छिपा हुआ था। 420 दरअसल भारतीय दंड संहिता की उस विशेष धारा को दर्शाता है जो जालसाजी, ठगी और धोखाधड़ी के अपराधों से जुड़ी होती है। राज कपूर ने इस धारा के आगे 'श्री' जैसा सम्मानसूचक शब्द जोड़कर समाज की दोहरी मानसिकता पर सीधा प्रहार किया था।
फिल्म की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह बात साफ हो जाती है कि असली धोखेबाज सिर्फ सड़कों पर छोटी-मोटे अपराध करने वाले ठग नहीं हैं। इसके विपरीत, समाज में बड़ा रुतबा, सम्मान और ऊंचा दर्जा हासिल किए हुए कुछ प्रतिष्ठित लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए गरीब और लाचार वर्ग का शोषण करते हैं। फिल्म सामाजिक तंत्र की उस कड़वी सच्चाई पर गंभीर सवाल उठाती है जहां बाहर से शरीफ दिखने वाले धनवान लोग ही आम जनता के अधिकारों पर डाका डालते हैं।
दिग्गज फनकारों के संगम ने गानों को बनाया सदाबहार
फिल्म की कहानी इलाहाबाद से आए राजू नाम के एक शिक्षित युवा के इर्द-गिर्द घूमती है। राजू बीए की डिग्री और अपनी ईमानदारी के बल पर बंबई शहर में अपनी किस्मत आजमाने पहुंचता है। उसे उम्मीद होती है कि उसकी पढ़ाई और अच्छे संस्कार उसे तरक्की दिलाएंगे, लेकिन जल्द ही उसे अहसास होता है कि केवल किताबी ज्ञान और ऊंचे आदर्शों से आजीविका नहीं चलाई जा सकती।
श्री 420 के संगीत को अमर बनाने में उस दौर के सबसे दिग्गज कलाकारों का योगदान रहा। फिल्म की संगीतमय धुनों को शंकर-जयकिशन की मशहूर जोड़ी ने स्वरबद्ध किया था, जबकि इसके बोल शैलेंद्र और हसरत जयपुरी की कलम से निकले थे। गानों को अपनी सुरीली आवाज देने के लिए मुकेश, लता मंगेशकर, मन्ना डे, मोहम्मद रफी और आशा भोंसले जैसे महान गायक एक साथ आए। इन सभी संगीत साधकों के साझा प्रयास का ही परिणाम था कि फिल्म का हर एक गाना भारतीय संगीत इतिहास का अमूल्य हिस्सा बन गया।



















