यशराज फिल्म्स के स्पाई यूनिवर्स की पहली महिला प्रधान फिल्म 'अल्फा' आखिरकार सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है और रिलीज होते ही इसे लेकर सोशल मीडिया पर राय पूरी तरह बंट गई है। महीनों तक चले प्रचार, गानों और ट्रेलर्स ने दर्शकों में इस फिल्म को लेकर भारी उम्मीदें जगा दी थीं, लेकिन थिएटर से बाहर निकलते ही लोगों के रिएक्शन मिले-जुले नजर आए। एक्स पर आ रहे शुरुआती रिस्पॉन्स बताते हैं कि फिल्म का स्टाइलिश एक्शन और विजुअल्स दर्शकों को भा रहे हैं, लेकिन कहानी, स्क्रिप्ट और लॉजिक को लेकर तीखी आलोचना का सिलसिला भी शुरू हो गया है। नीचे दर्शकों और समीक्षकों की उन्हीं प्रतिक्रियाओं का ब्योरा है, जो फिल्म के हर पहलू को उजागर करती हैं।
शरवरी के स्क्रीन प्रेजेंस और तकनीकी पक्ष की जमकर तारीफ
कई दर्शकों को फिल्म का तकनीकी पक्ष और कलाकारों का अभिनय खासा पसंद आया है। खासतौर पर शरवरी की स्क्रीन मौजूदगी और उनके किरदार की सराहना हो रही है। एक यूजर ने लिखा कि 'अल्फा' में कुछ दमदार पल जरूर हैं, लेकिन इसकी औसत कहानी फिल्म को पीछे खींच लेती है। उसके मुताबिक फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका स्क्रीन प्रेजेंस है, जो जब भी सामने आता है फिल्म में एक अलग जोश और गहराई भर देता है। सीमित सीन होने के बावजूद यह किरदार दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ने में कामयाब रहा है। चाहे इमोशनल सीन हों या एक्शन सीक्वेंस, इस किरदार ने अपना पूरा दमखम झोंक दिया है, हालांकि कुछ एक्शन सीन बेहद शानदार लगते हैं तो कुछ पल असली नहीं लगते। एक अन्य यूजर, जो फिल्मों के तकनीकी पहलुओं में खास दिलचस्पी रखता है, उसने फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग को सराहा। उसने लिखा कि फिल्म के पहले हाफ की कहानी भले कई हॉलीवुड फिल्मों के कॉन्सेप्ट्स का मिला-जुला रूप लगे, लेकिन अगर उस बात को नजरअंदाज कर दिया जाए तो यह बुरी नहीं लगती। उसे फिल्म देखने में मजा आ रहा था और अब तक बोरियत महसूस नहीं हुई थी। उसने बताया कि फिल्म की एडिटिंग काफी कसी हुई है, सीजीआई और वीएफएक्स भले पूरी तरह असली न लगें लेकिन रेंडर क्वालिटी अच्छी होने की वजह से ध्यान नहीं भटकाते। सराउंड साउंड मिक्स को उसने दिलचस्प बताया और कहा कि 2K लेजर वेन्यू में देखने पर भी डीसीपी पिक्चर क्वालिटी जबरदस्त लगी। उसने रंगों को भी बेहतरीन बताते हुए सलाह दी कि फिल्म को किसी ब्राइट लेजर वेन्यू में ही देखा जाए, क्योंकि इसका कॉन्ट्रास्ट, सैचुरेशन और शार्पनेस, सब कुछ बेहतरीन है।
पहले हाफ ने बढ़ाई दर्शकों की मायूसी
हालांकि जैसे ही फिल्म का पहला हाफ खत्म हुआ, थिएटर से निकलने वाले दर्शकों में भारी असंतोष साफ नजर आया। कई लोगों को कहानी बहुत बिखरी हुई लगी। एक दर्शक ने इंटरवल के दौरान लिखा कि उसे समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर हो क्या रहा है, पूरी फिल्म एक जैसे पैटर्न पर चल रही है और बीच-बीच में कई बेतुके सीन भी आ रहे हैं। उसके मुताबिक पहला हाफ बहुत बिखरा हुआ और कमजोर है, जिसमें कई बचकानी बातें शामिल हैं। उसे भारी निराशा हुई और उसने उम्मीद जताई कि आलिया भट्ट और शरवरी दूसरे हाफ में कुछ अहम करेंगी, लेकिन तब तक फिल्म उसे खराब ही लग रही थी। इसी बीच फिल्म समीक्षक केआरके ने भी आलिया भट्ट के अभिनय और स्क्रीनप्ले पर तीखा तंज कसा। केआरके ने लिखा:
फिल्म अल्फा के 45 मिनट बीत चुके हैं और मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्या बकवास चल रही है और क्यों। आलिया भट्ट हर सीन में ऐसी कॉमेडी कर रही हैं कि कोई भी पूछ बैठेगा कि आखिर तुम कर क्या रही हो और क्यों। पूरी तरह से बकवास!
'कॉपी-पेस्ट' स्क्रिप्ट और जीरो लॉजिक पर भड़का गुस्सा
सोशल मीडिया पर फिल्म के लेखन को खुलेआम 'आलसी' करार दिया जा रहा है। कई दर्शकों का आरोप है कि फिल्म में हॉलीवुड की फिल्मों की बिना सोचे-समझे नकल की गई है और उसी पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले को दोहराया गया है, वह भी बिना दिमाग लगाए और पूरी तरह बेजान अंदाज में। एक यूजर ने इसे बड़ी, देखने लायक ट्रेनव्रेक बताते हुए लिखा कि यह फिल्म यशराज के स्पाई यूनिवर्स को ऊपर उठाने के बजाय आलसी राइटिंग, जीरो लॉजिक और असलियत से ज्यादा ऊपरी स्टाइल की वजह से उसे पूरी तरह खत्म कर देती है। उसके मुताबिक यह दर्शकों की समझ का पूरा अपमान है और शुरू से आखिर तक सिर्फ एक खोखला पैसा कमाने का जरिया भर है। उसने स्क्रीनप्ले को अस्त-व्यस्त गड़बड़ बताया, जो बिना किसी दांव और बिना किसी मकसद के घूमती रहती है। लेखकों ने एक जबरदस्त हाई-स्टेक्स एक्शन थ्रिलर बनाने की पूरी कोशिश जरूर की, लेकिन डायलॉग बहुत ज्यादा अजीब, जबरदस्ती के और बनावटी नजर आते हैं। उसने फिल्म की रफ्तार को भी सुस्त बताया, पहला हाफ महज एक चमकदार और ओवर-एडिटेड मोंटाज जैसा लगा जबकि दूसरा हाफ बेमतलब के मेलोड्रामा में तब्दील हो जाता है, जो दर्शकों के धैर्य की गंभीर परीक्षा लेता है।
विलेन के ट्विस्ट पर भी उठे सवाल
ट्रेड एक्सपर्ट्स और समीक्षकों ने भी कहानी के अजीबोगरीब ट्विस्ट की पोल खोल दी है। एक यूजर ने लिखा कि यशराज फिल्म्स और उसके लेखकों ने एक बार फिर वही पुराना ट्रिक अपनाया है। स्पाई यूनिवर्स की पिछली फिल्मों की तरह इस बार भी एक भारतीय सेना अधिकारी को मुख्य विलेन बनाया गया है जो देश के खिलाफ चला जाता है, लेकिन इस बार लेखकों ने हमजा अली मजारी से प्रेरित एक बेहद कमजोर ट्विस्ट भी जोड़ दिया है। इस बार बॉबी देओल ने उस अधिकारी का किरदार निभाया है जिसने 'अल्फा' सुपर-सोल्जर प्रोग्राम तैयार किया था। जब भारतीय सेना इस प्रोजेक्ट को बंद कर देती है, तब भी वह इसे गैर-कानूनी तरीके से चलाता रहता है। आलिया भट्ट और शरवरी के किरदार भी इसी अल्फा प्रोग्राम की देन बताए गए हैं, जिससे उन्हें ऐसी क्षमताएं मिलती हैं जो स्पाइडर-सेंस जैसी और कई हॉलीवुड फिल्मों से उधार ली गई अन्य ताकतों की याद दिलाती हैं। इस यूजर के मुताबिक कहानी इतनी बेतुकी और अजीब है कि फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दर्शक एक ही समय पर गुस्सा, चिड़चिड़ाहट, हंसी, निराशा और पूरी उलझन जैसी भावनाएं एक साथ महसूस करने लगते हैं।
'पठान' और 'मिशन इम्पॉसिबल' की झलक भी दिखी
एक अन्य यूजर ने फिल्म के सीन्स की तुलना 'पठान' और 'मिशन इम्पॉसिबल' के घालमेल से की। उसने लिखा कि इंटरवल के बाद असली मजा शुरू होता है, जब एजेंट फ्रेंच फ्राइज खाते हुए दुश्मन के इलाके में घुसता है, जो उसे बेहद बुरा लगा। उसके मुताबिक आलिया भट्ट अपनी हंसी और एटिट्यूड की वजह से परेशान करने वाली लगती हैं, हालांकि एक्शन सीन अच्छे बने हैं, वहीं शरवरी स्पेन में नाइक और प्यूमा की रील्स बनाती नजर आती हैं। इस यूजर ने आगे लिखा कि रॉ चीफ को चोर दिखाया गया है और आर एंड एडब्लू का एक पूर्व सैनिक विलेन बन जाता है, ऐसा ट्विस्ट पहले 'पठान' में भी देखा जा चुका है। उसने फिल्म को कैप्टन अमेरिका के फीमेल वर्शन के साथ-साथ 'जुड़वा' और 'मिशन इम्पॉसिबल' का मिश्रण करार दिया। कुल मिलाकर सोशल मीडिया पर आ रही इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि 'अल्फा' को लेकर दर्शक दो साफ खेमों में बंट गए हैं, जिसमें एक धड़ा इसके स्टाइल और परफॉर्मेंस का कायल है तो दूसरा इसकी कहानी और लॉजिक को सिरे से खारिज कर रहा है।













