भारतीय सिनेमा के प्रतिभावान निर्देशक और अभिनेता निशिकांत कामत का जीवन किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। महज दोस्तों या नाटक प्रेमियों के साथ रिहर्सल देखने के उद्देश्य से कदम रखने वाले एक युवा ने धीरे-धीरे सिनेमा के कैनवास पर अपनी अलग छाप छोड़ी। होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई बीच में छोड़कर उन्होंने जब कैमरे के पीछे की दुनिया में कदम रखा, तो शायद ही किसी ने सोचा था कि उनकी बनाई पहली ही फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने 'दृश्यम' जैसी लोकप्रिय फिल्मों का निर्देशन करके न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता पाई, बल्कि अपनी बहुमुखी प्रतिभा से दर्शकों का दिल भी जीता।
अचानक थियेटर पहुंचने से शुरू हुआ था अभिनय का सफर
निशिकांत कामत की परवरिश एक साधारण मराठी परिवार में हुई थी। उनका जन्म 17 जून 1970 को महाराष्ट्र के दादर शहर में हुआ था। छात्र जीवन के दौरान ही उनकी रुचि कला और सिनेमा के प्रति विकसित होने लगी थी। हालांकि, शुरुआत में उनका निर्देशक बनने का कोई सुव्यवस्थित सपना नहीं था। थियेटर की दुनिया में उनका प्रवेश एकदम आकस्मिक था। एक दिन वह केवल मनोरंजन के लिए एक नाटक की रिहर्सल देखने थिएटर पहुंचे थे। वहां मौजूद निर्देशक की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने निशिकांत से पूछा कि क्या वह मंच पर चार अन्य लड़कों के साथ खड़े हो सकते हैं। निशिकांत ने बिना किसी झिझक के हां कह दिया। इस एक छोटे से निर्णय ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।
होटल मैनेजमेंट छोड़ दूरदर्शन में सीखी संपादन की कला
मंच पर चार लड़कों के साथ खड़े होकर शुरू हुआ यह सफर जल्द ही अभिनय के प्रति एक गहरे लगाव में बदल गया। थियेटर के मंच पर लगातार काम करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि कहानियां सुनाना ही उनकी सच्ची लगन है। हालांकि, करियर के तौर पर उन्होंने गोवा जाकर होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन वहां रहकर भी उनका मन पढ़ाई से अधिक थिएटर और फिल्मों की ओर खिंचता रहा। अपनी वास्तविक रुचि को पहचानते हुए उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और फिल्म तथा टेलीविजन उद्योग में काम की तलाश शुरू कर दी।
शुरुआती दौर में उन्हें काफी छोटे-मोटे काम मिले, लेकिन उन्होंने हर जिम्मेदारी को सीखने के एक मौके के रूप में लिया। निशिकांत ने दूरदर्शन के एक मराठी धारावाहिक में सहायक के रूप में अपने करियर की नींव रखी। उनका प्राथमिक काम रिकॉर्डेड टेप को एडिटर तक सुरक्षित पहुंचाना होता था। इस काम के दौरान उन्होंने एडिटर के काम को ध्यान से देखना शुरू किया और धीरे-धीरे संपादन की तकनीक सीख ली। उनकी इस लगन का परिणाम यह निकला कि महज 22 साल की उम्र में वह एक कुशल एडिटर बन गए। लगभग दो वर्षों तक संपादन का काम करने के बाद, जब उनकी उम्र 24 साल हुई, तब उन्हें टीवी निर्देशन का पहला अवसर प्राप्त हुआ। जो युवक कभी केवल दर्शक के रूप में रिहर्सल देखने गया था, वह अब कैमरे के पीछे खड़े होकर धारावाहिकों का निर्देशन कर रहा था। टीवी में लगभग पांच से छह साल तक काम करने के बाद उन्होंने धारावाहिक बनाना छोड़ दिया और पटकथा लेखन यानी स्क्रिप्ट राइटिंग की ओर रुख किया। निर्देशक बनने से पहले उन्होंने उद्योग में कई तरह के काम किए और लंबे संघर्ष का सामना किया। ऐसे समय भी आए जब उनके पास कोई काम नहीं था, परंतु उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार सीखते रहे।
मराठी फिल्म 'डोम्बीवली फास्ट' से मिला पहला नेशनल अवॉर्ड
वर्ष 2005 में निशिकांत कामत ने एक निर्देशक के रूप में अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। उनकी पहली मराठी फिल्म 'डोम्बीवली फास्ट' थी। इस फिल्म में एक आम नागरिक के दैनिक संघर्ष, व्यवस्था के खिलाफ उसके गुस्से और उसकी मजबूरियों को बहुत ही जीवंत तरीके से पर्दे पर उतारा गया था। दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने इस फिल्म को खूब सराहा। यह फिल्म उनके करियर के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुई। वर्ष 2006 में 'डोम्बीवली फास्ट' को मराठी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का नेशनल अवॉर्ड (राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार) प्रदान किया गया। अपनी डेब्यू फिल्म से ही राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करना उनके कौशल का सबसे बड़ा प्रमाण था। इस सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने अपनी इसी मराठी फिल्म का तमिल में 'इवानो ओरुवन' नाम से रीमेक भी बनाया, जिसमें प्रसिद्ध अभिनेता आर माधवन ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
हिंदी सिनेमा में 'दृश्यम' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों का निर्देशन
मराठी सिनेमा में सफलता के झंडे गाड़ने के बाद उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग की ओर कदम बढ़ाया। वर्ष 2008 में निशिकांत ने अपनी पहली हिंदी फिल्म 'मुंबई मेरी जान' का निर्देशन किया। यह फिल्म वर्ष 2006 में हुए मुंबई ट्रेन विस्फोटों के बाद आम जनता के जीवन और उनकी मानसिक स्थिति पर पड़े गहरे प्रभाव को संवेदनशीलता से दर्शाती थी। इसके पश्चात उन्होंने एक्शन शैली की फिल्म 'फोर्स' का निर्देशन किया, जिसमें जॉन अब्राहम मुख्य भूमिका में थे और इस फिल्म के जरिए विद्युत जामवाल ने हिंदी सिनेमा में अपना पहला कदम रखा था।
वर्ष 2014 में उन्होंने मराठी फिल्म 'लाय भारी' का सफल निर्देशन किया। इसके बाद वर्ष 2015 में उनकी सबसे अधिक चर्चित और सफल हिंदी फिल्म 'दृश्यम' सिनेमाघरों में आई। अजय देवगन, तब्बू और श्रिया सरन के दमदार अभिनय से सजा यह थ्रिलर दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। आगे चलकर निशिकांत ने 'रॉकी हैंडसम' और 'मदारी' जैसी बेहतरीन फिल्मों का निर्माण किया। उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म 'मदारी' थी, जिसमें इरफान खान मुख्य भूमिका में नजर आए थे। यह फिल्म एक आम आदमी और देश की भ्रष्ट व्यवस्था के बीच के संघर्ष को बेहद तीखे ढंग से प्रस्तुत करती थी।
कैमरे के आगे और पीछे दोनों जगह दिखाई बेहतरीन प्रतिभा
निशिकांत कामत न केवल एक विजनरी निर्देशक और लेखक थे, बल्कि एक मंझे हुए अभिनेता भी थे। फिल्म 'रॉकी हैंडसम' में उन्होंने खुद मुख्य खलनायक का किरदार निभाकर सभी को चौंका दिया था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने '404', 'डैडी', 'जूली 2' और 'भावेश जोशी सुपरहीरो' जैसी कई प्रमुख फिल्मों में अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया। दुर्भाग्यवश, लिवर की गंभीर बीमारी से जूझने के बाद 17 अगस्त 2020 को 50 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। भले ही वह बहुत कम उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन निर्देशन, लेखन और अभिनय के क्षेत्र में उनका असाधारण योगदान भारतीय सिनेमा में सदैव याद रखा जाएगा।



















