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स्टार बनने आए नवाज और विजय राज को डायरेक्टर ने बना दिया 'पेड़', मनोज बाजपेयी ने सुनाए संघर्ष के किस्सेबॉलीवुड
13 जून 2026, 2:05 am (137 दिन पहले)· 0

स्टार बनने आए नवाज और विजय राज को डायरेक्टर ने बना दिया 'पेड़', मनोज बाजपेयी ने सुनाए संघर्ष के किस्से

मनोज बाजपेयी ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज के थिएटर के शुरुआती दिनों की मजेदार यादें ताजा कीं, जब दोनों को मंच पर ढाई-ढाई घंटे तक पेड़ बनकर खड़ा रहना पड़ता था।

नई दिल्ली: मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज आज हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में गिने जाते हैं, जिनके अभिनय का हर कोई कायल है। लेकिन इस ऊंचाई तक पहुंचने से पहले इन तीनों ने जबरदस्त संघर्ष देखा था। हाल ही में मनोज बाजपेयी ने बीते दौर का एक दिलचस्प वाकया साझा किया और नवाज तथा विजय के थिएटर वाले दिनों को याद किया।

बात उन दिनों की है जब नवाजुद्दीन और विजय राज काम की तलाश में एक नामी थिएटर के डायरेक्टर से मिलने पहुंचे थे। डायरेक्टर साहब ने उनसे उनके बैकग्राउंड के बारे में पूछा और जानना चाहा कि वे अभिनय की ओर क्यों आना चाहते हैं। मुश्किल यह थी कि उस नाटक में कोई किरदार खाली ही नहीं बचा था। मगर डायरेक्टर साहब भी काफी जुगाड़ू निकले। उन्होंने कहा कि नाटक में पेड़ों की जरूरत है, इसलिए इन दोनों को ही पेड़ बना दिया जाए।

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'फीवर एफएम' को दिए इंटरव्यू में मनोज बाजपेयी बताते हैं कि मंच पर पेड़ बनने वाले सिर्फ ये दोनों ही नहीं थे, बल्कि सात-आठ लोगों का पूरा समूह इस काम में लगा था। इन होने वाले सुपरस्टार्स को नाटक के दौरान ढाई-ढाई घंटे तक बिना हिले-डुले, सीधे खड़े होकर पेड़ का रोल निभाना पड़ता था। जरा सोचिए, जो लोग अभिनेता बनने का सपना लेकर आए थे, उन्हें मंच पर लकड़ी की तरह खड़ा कर दिया गया।

किस्सा यहीं नहीं रुकता। मनोज बाजपेयी उस वक्त थिएटर में दिन-रात पागलों की तरह रिहर्सल किया करते थे। उनकी इस कड़ी मेहनत को देखकर नवाजुद्दीन और विजय राज के होश उड़ गए। उन्हें अपने अभिनय में आने के फैसले पर ही संदेह होने लगा। वे सोचने लगे कि क्या सचमुच स्टार बनने का रास्ता इतना कठिन होता है।

मनोज ने हंसते हुए पुरानी यादें ताजा करते हुए बताया कि नवाज और विजय अक्सर बाहर जाकर आपस में बातें किया करते थे। वे मनोज की ओर इशारा करते हुए कहते थे, 'यार, यह आदमी तो इतनी गधा मजदूरी कर रहा है, क्या अभिनय में सचमुच इतनी घिसाई करनी पड़ती है?' मनोज की कड़ी रिहर्सल देखकर तो दोनों एक बार के लिए अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस लौटने का मन तक बना चुके थे।

मजेदार मोड़ तब आया जब ये दोनों कलाकार डायरेक्टर साहब के लिए 'पनौती' साबित हो गए। हुआ यूं कि एक बार डायरेक्टर साहब जोश में आकर डायरेक्शन दे रहे थे और अचानक इन दोनों से टकराकर जोर से गिर पड़े। चोट इतनी गहरी थी कि डायरेक्टर के हाथ में स्क्रू तक लगवाने पड़ गए।

इसके बाद थिएटर के बाकी लोग डायरेक्टर साहब को चिढ़ाने लगे कि ये दोनों लड़के उनके लिए पनौती हैं। हाल यह हो गया कि उस हादसे के बाद डायरेक्टर साहब पूरे नाटक के दौरान सिर्फ एक ही हाथ से निर्देश दे पाते थे। आज भी जब ये तीनों इस बात को याद करते हैं तो हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं।

मनोज बाजपेयी का मानना है कि पेड़ बनने और गधा मजदूरी वाले उन्हीं दिनों ने उनकी दोस्ती को और मजबूत कर दिया। वे तीनों सिर्फ काम के साथी नहीं थे, बल्कि साथ में सफर करते, एक ही हॉल में सोते और मेस या ढाबे पर जो मिलता उसे मिल-बांटकर खाते थे। संघर्ष के उसी दौर ने आज उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।

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