आज यानी 14 जुलाई को हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार मदन मोहन की पुण्यतिथि है. गजलों को फिल्मी परदे पर नई ऊंचाई देने वाले इस संगीतकार का सफर एक फौजी अफसर से शुरू होकर बॉलीवुड के सबसे चहेते धुनकार तक पहुंचा. महज 51 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले मदन मोहन ने अपने छोटे से करियर में ऐसी धुनें रचीं, जो आज भी संगीत प्रेमियों की जुबान पर हैं.
बगदाद से मुंबई तक का सफर
मदन मोहन का जन्म 25 जून 1924 को इराक की राजधानी बगदाद में हुआ था. उनके पिता राय बहादुर चुनीलाल कोहली वहीं नौकरी करते थे, इसलिए बचपन का शुरुआती हिस्सा विदेश में बीता. कुछ समय बाद कोहली परिवार भारत लौट आया और लाहौर में कुछ वक्त गुजारने के बाद आखिरकार मुंबई में जाकर बस गया. बचपन से ही मदन मोहन का रुझान संगीत की तरफ था. उन्होंने शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा तो ली, लेकिन असल में उन्होंने खुद को एक कुशल संगीतकार के तौर पर अपनी मेहनत, लगन और सालों के अनुभव से गढ़ा.
फौज की वर्दी से संगीत की दुनिया तक
पढ़ाई पूरी करने के बाद मदन मोहन ने साल 1943 में भारतीय सेना जॉइन की और सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर सेवाएं दीं. द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद करीब दो साल तक सेना में रहने के बाद उन्होंने वर्दी उतार दी और संगीत की दुनिया का रुख किया. सेना छोड़ने के बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लखनऊ और दिल्ली केंद्रों में प्रोग्राम असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू किया. यहीं पर उन्हें उस्ताद फैयाज खान, उस्ताद अली अकबर खान, बेगम अख्तर और तलत महमूद जैसे उस दौर के दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने और उनसे सीखने का सुनहरा मौका मिला. इन्हीं बरसों में उनकी संगीत की समझ और गहरी होती गई.
फिल्मी करियर की शुरुआत
मदन मोहन ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत सहायक संगीतकार के तौर पर की. साल 1950 में आई फिल्म 'आंखें' ने उन्हें एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया और 'अदा', 'देख कबीरा रोया', 'शराबी', 'वो कौन थी?', 'मेरा साया', 'हकीकत', 'दस्तक', 'हीर रांझा', 'मौसम' और 'लैला मजनूं' जैसी फिल्मों में यादगार संगीत दिया. इनमें से हर फिल्म का संगीत आज भी अपनी अलग पहचान रखता है.
गजलों को मिली नई पहचान
मदन मोहन को खास तौर पर हिंदी फिल्मों में गजल को नया मुकाम देने का श्रेय दिया जाता है. उनकी हर धुन में शास्त्रीय संगीत की गहराई और भावनाओं की मिठास साफ झलकती थी. उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, तलत महमूद, मन्ना डे, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ मिलकर कई सुपरहिट गीत रचे. इनमें लता मंगेशकर के साथ उनकी जोड़ी सबसे ज्यादा पसंद की गई और दोनों ने मिलकर कई ऐसे गीत बनाए, जो आज भी अमर माने जाते हैं. गीतकार राजा मेहदी अली खान, कैफी आजमी, राजिंदर कृष्ण, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ भी उनकी जोड़ी खूब जमी. हर धुन में भावनाओं को बड़ी खूबसूरती से पिरो देना ही उनकी सबसे बड़ी खासियत मानी जाती है.
करियर का सबसे सुनहरा दौर
साल 1960 और 1970 का दशक मदन मोहन के करियर का सबसे सुनहरा समय माना जाता है. इसी दौर में उन्होंने 'लग जा गले', 'नैना बरसे', 'कर चले हम फिदा' और 'ये दुनिया ये महफिल' जैसे कालजयी गीत दिए, जो आज भी उतने ही ताजा लगते हैं जितने उस वक्त लगते थे. साल 1971 में फिल्म 'दस्तक' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला. उनकी प्रतिभा से इतनी प्रभावित थीं कि लता मंगेशकर उन्हें प्यार से 'गजल का शहजादा' कहकर बुलाया करती थीं.
अधूरा सफर, अमर विरासत
14 जुलाई 1975 को महज 51 साल की उम्र में मदन मोहन का निधन हो गया. उनका करियर भले ही ज्यादा लंबा न रहा हो, लेकिन उन्होंने जो गीत और धुनें भारतीय संगीत को दीं, वे आज भी सबसे अनमोल विरासत मानी जाती हैं और हर पीढ़ी के संगीत प्रेमियों को उतना ही सुकून देती हैं.











