किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को संभालना केंद्रीय बैंक की मुख्य जिम्मेदारी होती है। मुद्रा में गिरावट आने पर उसे संभालना और शेयर बाजार में सुस्ती के समय उसे गति देना, यह सब बैंक इंडोनेशिया के गवर्नर पेरी वारजियो बखूबी निभा रहे थे। हालांकि, सोमवार को उन्होंने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इसकी वजह निजी बताई है, लेकिन वित्तीय जगत में यह माना जाता है कि बड़े पदों पर होने वाले ऐसे फैसलों के पीछे कई अन्य कारण भी छिपे होते हैं। जैसे ही उनके इस्तीफे की खबर सार्वजनिक हुई, इंडोनेशियाई रुपिया कमजोर हो गया और शेयर बाजार में भी जोरदार हलचल देखने को मिली, हालांकि बाद में बाजार कुछ संभल गया।
पेरी वारजियो का कार्यकाल और उपलब्धियां
पेरी वारजियो पहली बार साल 2018 में बैंक इंडोनेशिया के गवर्नर के पद पर आसीन हुए थे। उनके शानदार प्रदर्शन और बेहतरीन उपलब्धियों को देखते हुए उन्हें 2023 में दूसरे पांच साल के कार्यकाल के लिए फिर से नियुक्त किया गया था। वह वित्तीय मामलों के एक अनुभवी और बेहद भरोसेमंद प्रमुख माने जाते थे। उनके नेतृत्व में देश की मौद्रिक नीतियों को काफी स्थिरता मिली थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से सरकार के साथ उनके मतभेदों की खबरें सामने आ रही थीं। उन पर लगातार यह दबाव बनाया जा रहा था कि वह सरकार की आर्थिक नीतियों का पूर्ण समर्थन करें। इसी तनातनी का नतीजा था कि बीते जून महीने में इंडोनेशियाई रुपिया ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर लुढ़क गया था। इसके अलावा, पिछले महीने देश की संसद ने एक नया कानून पारित किया, जिसके बाद केंद्रीय बैंक के गवर्नर की भूमिका काफी सीमित कर दी गई। इस नए कानून के तहत यह प्रावधान किया गया कि सेंट्रल बैंक को सांसदों और अन्य स्वतंत्र वित्तीय नियामकों के निर्देशों का पालन करना होगा।
बाजार पर असर और उत्तराधिकारी को लेकर चिंताएं
सिंगापुर स्थित एलेथिया कैपिटल के ASEAN विशेषज्ञ एंगस मैकिन्टोश का कहना है कि पेरी वारजियो का यह इस्तीफा वित्तीय बाजार के लिए एक नकारात्मक संकेत साबित होगा, क्योंकि वह एक बेहद अनुभवी और भरोसेमंद केंद्रीय बैंक प्रमुख थे। अब निवेशकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उनका उत्तराधिकारी किसे बनाया जाता है। फिलहाल डेस्ट्री दमायंती ने कार्यभार अपने हाथ में ले लिया है। यदि राष्ट्रपति प्रबोवो के भतीजे थॉमस जिवांडोनो को अगला गवर्नर नियुक्त किया जाता है, तो बाजार इसे बहुत संदेह की नजर से देखेगा, क्योंकि केंद्रीय बैंक का यह पद पूरी तरह से तकनीकी और राजनीतिक प्रभावों से स्वतंत्र होना चाहिए।
मुद्रा और शेयर बाजार में उथल-पुथल
पेरी वारजियो के इस्तीफा देने की खबर सामने आते ही इंडोनेशियाई मुद्रा रुपिया शुरुआती कारोबार के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.14 प्रतिशत तक कमजोर हो गई और 17,960 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गई। वहीं दूसरी ओर, देश का प्रमुख शेयर सूचकांक कारोबार की शुरुआत में 0.68 प्रतिशत तक लुढ़क गया था, लेकिन बाद में इसने रिकवरी की और 0.26 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ कारोबार करता हुआ नजर आया।
वित्त मंत्री के इस्तीफे से जुड़ी पुरानी चिंताएं
इससे पहले पिछले साल वित्त मंत्री श्री मुल्यानी इंद्रावती को अचानक हटाए जाने के बाद भी वित्तीय बाजारों में काफी चिंता का माहौल बन गया था। उस समय निवेशकों के मन में यह बड़ा डर था कि राष्ट्रपति प्रबोवो की लोकलुभावन और भारी भरकम खर्च वाली योजनाओं के कारण देश की वित्तीय साख और विश्वसनीयता को तगड़ा झटका लग सकता है।
अन्य एशियाई बाजारों के मुकाबले इंडोनेशिया की स्थिति
एक ऐसा दौर भी देखा गया था जब भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशक लगातार अपना पैसा बाहर निकाल रहे थे और भारी बिकवाली के चलते सेंसेक्स पर लगातार दबाव बना हुआ था। उस चुनौतीपूर्ण समय में इंडोनेशिया का जकार्ता कंपोजिट इंडेक्स भारत के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन करता हुआ नजर आ रहा था। कई ऐसे दिन भी आए जब भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देशों के बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई, जबकि इंडोनेशियाई बाजार या तो अपेक्षाकृत काफी मजबूत बना रहा या फिर हल्की बढ़त के साथ बंद हुआ।
मजबूत नीतियों और कमोडिटी सेक्टर का योगदान
इस अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन के पीछे केंद्रीय बैंक की सख्त और प्रभावी नीतियों को मुख्य वजह माना गया था। इसके अलावा घरेलू निवेशकों की तरफ से बाजार में मजबूत भागीदारी भी देखने को मिली थी। देश के कमोडिटी सेक्टर, विशेष तौर पर निकेल और पाम ऑयल का उत्पादन करने वाली कंपनियों का प्रदर्शन भी काफी शानदार रहा था, जिससे कुल मिलाकर आर्थिक विकास को लेकर निवेशकों के मन में सकारात्मक उम्मीदें बनी हुई थीं।



















