बिहार में खरीफ सीजन के दौरान ज्यादातर किसान परंपरागत रूप से धान की खेती को ही प्राथमिकता देते आए हैं, लेकिन इस बार मौसम का मिजाज कुछ अलग दिख रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने इस साल राज्य के कई हिस्सों में कम बारिश होने का अनुमान जताया है, जिसकी वजह से सीतामढ़ी सहित आसपास के इलाकों के किसानों के सामने फसल चयन को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। कृषि वैज्ञानिक अनुराधा रंजन का कहना है कि जिन क्षेत्रों में बारिश कम रहने की आशंका है, वहां के किसानों को धान की पारंपरिक खेती से हटकर कम अवधि में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों की तरफ रुख करना चाहिए। उनके मुताबिक बिहार के ऊपरी और मध्यम मैदानी हिस्सों में सोयाबीन की खेती धान की तुलना में कहीं ज्यादा फायदेमंद और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती है। शिवहर जैसे जिलों में मौजूद हल्की बलुई मिट्टी और ऊंचे भूभाग सोयाबीन की फसल के लिए मुफीद माने जाते हैं, क्योंकि यहां पानी के जमाव जैसी दिक्कत नहीं आती, जो अक्सर धान की खेती में एक बड़ी समस्या बन जाती है।
कितने दिनों में तैयार होती है सोयाबीन की फसल
सोयाबीन को एक ऐसी तिलहन फसल माना जाता है, जिसे कम पानी और कम समय में भी आसानी से उगाया जा सकता है, और यही वजह है कि सूखे जैसी परिस्थितियों में यह किसानों के लिए राहत भरा विकल्प बन जाती है। बाजार में सोयाबीन की कई उन्नत किस्में मौजूद हैं, जिनकी पकने की अवधि अलग-अलग होती है, ताकि किसान अपने इलाके की मिट्टी, पानी की उपलब्धता और मौसम के हिसाब से सही किस्म चुन सकें। आमतौर पर सोयाबीन की फसल पककर तैयार होने में करीब 120 दिन का समय लेती है, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने खासतौर पर 110 दिनों में तैयार होने वाली किस्में भी विकसित कर ली हैं। इससे भी आगे, जिन इलाकों में समय की कमी है या पानी की भारी किल्लत रहती है, वहां के किसान महज 90 दिनों में तैयार होने वाली 'अनामिका' किस्म का चुनाव कर सकते हैं। कम अवधि की ये किस्में न सिर्फ सूखे के खतरे को घटाती हैं, बल्कि अगली फसल की बुवाई के लिए समय पर खेत खाली करने में भी मदद करती हैं, जिससे पूरा फसल चक्र सुचारू बना रहता है।
बुवाई से पहले खेत और मिट्टी की तैयारी कैसे करें
सोयाबीन से अच्छी पैदावार लेने के लिए सही तकनीक और वैज्ञानिक तरीके से खेती करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए, ताकि बीज का अंकुरण बेहतर हो सके, और साथ ही खेत में पानी की सही निकासी का भी पूरा इंतजाम करना चाहिए। बुवाई शुरू करने से पहले बीजों को फफूंदनाशक दवा और राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना नहीं भूलना चाहिए, इससे पौधों को कई तरह के रोगों से बचाया जा सकता है और वे हवा में मौजूद नाइट्रोजन को भी सोखने लायक बन जाते हैं। सोयाबीन के बीज हमेशा कतारों में बोने चाहिए, जिसमें एक कतार से दूसरी कतार के बीच लगभग 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी रखी जाए, जबकि एक पौधे से दूसरे पौधे के बीच करीब 10 सेंटीमीटर का फासला रखना चाहिए। इस बात का खास ध्यान रखें कि बुवाई के वक्त खेत की मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद हो, क्योंकि नमी की कमी से अंकुरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
खाद, पोषण और खरपतवार नियंत्रण का सही तरीका
सोयाबीन दलहनी प्रवृत्ति की फसल है, इसलिए इसे बहुत ज्यादा नाइट्रोजन खाद की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि बुवाई के समय फास्फोरस, पोटाश और सल्फर की संतुलित मात्रा जरूर देनी चाहिए, क्योंकि इससे दानों की गुणवत्ता में सुधार होता है और फसल में तेल की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है। बुवाई के शुरुआती 30 से 40 दिनों के दौरान खेत को पूरी तरह खरपतवार मुक्त बनाए रखना जरूरी होता है, क्योंकि इसी दौरान खरपतवार पौधों की बढ़त को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इसके लिए किसान चाहें तो हाथ से निराई-गुड़ाई कर सकते हैं या फिर बाजार में उपलब्ध उचित शाकनाशी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
कटाई का सही समय और किसानों को होने वाला फायदा
सोयाबीन की फसल की कटाई के लिए सही समय की पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना बाकी प्रक्रियाएं। जब पौधों की पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगें और फलियां पूरी तरह सूख जाएं, तभी किसानों को फसल की कटाई करनी चाहिए। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर किसान धान के बजाय इस तरह की वैकल्पिक खेती को अपनाते हैं, तो वे न सिर्फ कम बारिश और सूखे जैसी स्थितियों से होने वाले नुकसान से बच सकते हैं, बल्कि अपनी सालाना आमदनी को भी पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और मजबूत बना सकते हैं।











