बिहार के जहानाबाद जिले में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय तेजी से फल-फूल रहा है, जहां स्थानीय लोग बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस बदलाव के पीछे सरकारी सहायता योजनाओं की बड़ी भूमिका है, जिसका लाभ उठाकर कई युवा उद्यमी स्वावलंबी बन रहे हैं। काको प्रखंड के नदियांवा गांव में रहने वाले संतोष कुमार केसरी इस सफलता की एक बड़ी मिसाल हैं। संतोष ने सात साल पहले मात्र 10 बक्सों से इस व्यवसाय की शुरुआत की थी, और आज वे अपने कठिन परिश्रम और सूझबूझ से 400 बक्सों तक का बड़ा सफर तय कर चुके हैं।
ट्रेनिंग से बदली संतोष की जीवनशैली
संतोष केसरी ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद लंबी अवधि तक बेरोजगारी का सामना किया था। वे इधर-उधर छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा कर रहे थे, लेकिन उन्हें किसी स्थिर करियर की तलाश थी। एक परिचित की सलाह पर उन्होंने गंधार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लिया। वर्ष 2019 में 10 बक्सों के साथ काम शुरू करने के बाद, उन्होंने आत्मा जहानाबाद की सहायता से 50 अतिरिक्त बक्से प्राप्त किए। अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज वे हर महीने 40,000 रुपए तक की कमाई करने में सक्षम हैं।
उत्पादन और बाजार की गणित
जिले में वर्तमान में लगभग 200 परिवार मधुमक्खी पालन के काम में शामिल हैं। बाजार में एक मधुमक्खी बक्से की कीमत लगभग 4,000 रुपए है, लेकिन सरकारी सब्सिडी के चलते यह किसानों को महज 1,200 रुपए में उपलब्ध हो जाता है। एक स्वस्थ बक्से से वर्ष भर में लगभग 60 किलो शहद का उत्पादन संभव है। इस हिसाब से, संतोष के पास मौजूद 400 बक्सों से साल भर में कुल 240 क्विंटल शहद का उत्पादन होता है।
बाजार की चुनौतियां और भविष्य
शहद की बाजार दरें काफी उतार-चढ़ाव भरी रहती हैं। खुदरा बाजार में शहद 500 रुपए प्रति किलो तक बिक जाता है, जबकि व्यापारियों को यह 150 रुपए और थोक भाव में 300 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचना पड़ता है। संतोष का कहना है कि क्षेत्र में शहद का उत्पादन तो बड़े स्तर पर हो रहा है, लेकिन भंडारण की सुविधाओं और उचित बाजार की कमी के कारण किसानों को तत्काल अपना माल बेचना पड़ता है। यदि शहद को सुरक्षित स्टोर करने की सही व्यवस्था हो, तो किसान बेहतर दाम मिलने तक प्रतीक्षा कर सकते हैं और अपनी आय को और भी बढ़ा सकते हैं।











