छपरा के पप्पू यादव ने मछली पालन से बदली किस्मत, उत्तर प्रदेश और बंगाल से सीखी अनोखी तकनीकव्यापार
1 घंटे पहले· 2

छपरा के पप्पू यादव ने मछली पालन से बदली किस्मत, उत्तर प्रदेश और बंगाल से सीखी अनोखी तकनीक

बिहार के छपरा जिले के रहने वाले युवा किसान पप्पू कुमार यादव ने पारंपरिक खेती को छोड़कर मछली पालन के जरिए बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने बंगाल और उत्तर प्रदेश की यात्रा कर वैज्ञानिक तरीके सीखे और अब वे अपने क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी मिसाल बन गए हैं।

बिहार के छपरा जिले में खेती की पारंपरिक पद्धतियों से हटकर युवा किसान नई-नई तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं। इस बदलाव की लहर में कई किसान अब मछली पालन जैसे व्यवसायों की ओर रुख कर रहे हैं, जो उन्हें पारंपरिक खेती के मुकाबले कहीं अधिक मुनाफा दे रहे हैं। इन किसानों में छपरा के मढ़ौरा प्रखंड के पोझी भूआलपुर गांव निवासी पप्पू कुमार यादव का नाम प्रमुखता से उभरा है, जिन्होंने अपनी मेहनत और तकनीक के दम पर सफलता की एक नई कहानी लिखी है। पप्पू यादव की सफलता देखकर आज आसपास के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं और खेती के आधुनिक तौर-तरीके अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं।

मछली पालन का अनूठा सफर

पप्पू कुमार यादव का मछली पालन की ओर आना तब शुरू हुआ जब उन्हें शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी के अवसरों में सफलता नहीं मिली। हार मानने के बजाय, उन्होंने खुद को स्वरोजगार की दिशा में मोड़ने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि इस कार्य की शुरुआत उन्होंने अपने मोबाइल फोन पर इंटरनेट की मदद से जानकारी जुटाकर की थी। शुरुआती समझ विकसित होने के बाद, उन्होंने अपनी जानकारी को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए उत्तर प्रदेश और बंगाल की यात्रा की। इन राज्यों में उन्होंने मछली पालन की बारीकियां समझीं और वैज्ञानिक तरीके सीखे, जिसके बाद उन्होंने इसे अपने गांव में शुरू करने का निश्चय किया।

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वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन

पप्पू यादव वर्तमान में डेढ़-डेढ़ एकड़ के चार अलग-अलग तालाबों में बड़े पैमाने पर 'मिक्स फिश फार्मिंग' (मिश्रित मछली पालन) कर रहे हैं। उनके काम करने का तरीका बेहद व्यवस्थित है। वह बाहर से मछली के जीरे (अंडे) मंगवाते हैं और सबसे पहले उन्हें एक सुरक्षित डैम में डालते हैं, ताकि उनका प्रारंभिक विकास सही तरीके से हो सके। जब मछली का जीरा एक निश्चित आकार और ग्रोथ हासिल कर लेता है, तब उन्हें मुख्य तालाबों में स्थानांतरित किया जाता है। यही वह तकनीक है जो उन्हें अन्य पारंपरिक किसानों से अलग खड़ा करती है।

मुनाफे का गणित और विस्तार

इस व्यवसाय की खासियत बताते हुए पप्पू यादव ने कहा कि मछली पालन में खेती की तुलना में कई गुना अधिक कमाई है। उनकी मछलियाँ मात्र चार से पांच महीने में बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं। इस तकनीक की बदौलत वह साल में कम से कम दो बार मछली पालन की फसल तैयार कर बेचते हैं। उनके इस सफल मॉडल को देखकर अब क्षेत्र में बदलाव आया है। पप्पू यादव के अनुसार, जब उन्होंने शुरुआत की थी तब वह उस इलाके में मछली पालन करने वाले इकलौते किसान थे, लेकिन अब उनके पास प्रशिक्षण लेने के बाद एक दर्जन से अधिक किसान खुद के तालाब खुदवाकर इस व्यवसाय से जुड़ चुके हैं। कम लागत और अधिक मुनाफा देने वाला यह क्षेत्र अब पूरे गांव और आसपास के इलाकों में किसानों की पहली पसंद बनता जा रहा है, जिससे उनकी आय के स्रोत में भारी इजाफा हुआ है।

सवाल-जवाब

पप्पू कुमार यादव ने मछली पालन की शुरुआत कहां से की?
उन्होंने बिहार के छपरा जिले के मढ़ौरा प्रखंड के पोझी भूआलपुर गांव में मछली पालन की शुरुआत की।
मछली पालन के लिए उन्होंने कहां से प्रशिक्षण लिया?
पप्पू यादव ने उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल जाकर मछली पालन की तकनीकों का प्रशिक्षण लिया।
मछली पालन से कितनी बार कमाई की जा सकती है?
इस तकनीक से साल में कम से कम दो बार मछली पालन की फसल तैयार की जा सकती है।
मछली पालन के लिए पप्पू यादव कौन सी तकनीक अपनाते हैं?
वह बाहर से मछली का जीरा मंगाकर पहले उसे डैम में विकसित करते हैं, और फिर बड़े होने पर उसे तालाब में स्थानांतरित करते हैं।

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