आजमगढ़ जिले में इस बार मानसून का मिजाज किसानों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। बारिश की कमी के कारण धान की खेती पर भारी संकट के बादल मंडरा रहे हैं, क्योंकि इस फसल को पनपने के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। मौसम की यह अनिश्चितता सीधे तौर पर फसल की पैदावार में कमी आने के जोखिम को बढ़ा रही है, जिससे क्षेत्र के किसानों में चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खेतों में समय पर पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाया, तो धान की फसल को सूखने से बचाना कठिन हो जाएगा।
धान की नर्सरी और नमी का संकट
इस गंभीर स्थिति पर आजमगढ़ के कृषि अधिकारी सदानंद चौधरी ने किसानों को आगाह करते हुए कहा कि वर्तमान मौसमी दशाएं धान की सामान्य रोपाई के लिए बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि बारिश न होने से किसानों को न केवल खेती में कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है, बल्कि उन्हें भारी आर्थिक चपत लगने का भी अंदेशा है। जिले के ज्यादातर किसानों ने धान की नर्सरी तो लगा ली है, लेकिन वर्षा की कमी से खेतों में आवश्यक नमी का स्तर बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है। परिणामस्वरूप, तैयार हो चुकी नर्सरी के सूखने और बर्बाद होने का जोखिम लगातार बना हुआ है।
सिंचाई के संसाधन और मौसम विभाग के पूर्वानुमान
सदानंद चौधरी ने सलाह दी है कि जिन किसानों की नर्सरी पानी न मिलने के कारण सूख रही है, उन्हें बिना किसी देरी के सिंचाई की वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके लिए किसान अपने निजी संसाधनों या उपलब्ध पंपिंग सेट का उपयोग कर सकते हैं ताकि फसल को मरने से बचाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि जो किसान पूरी तरह से केवल मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहते हैं, उन्हें अभी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। ऐसे किसानों को मौसम विभाग द्वारा जारी पूर्वानुमानों पर लगातार नज़र रखनी चाहिए और धान की बुवाई करने से पहले कुछ समय तक प्रतीक्षा करना उचित होगा।
वैकल्पिक खेती और कम अवधि की फसलें
कृषि अधिकारी ने किसानों को सलाह दी कि वे अपने जोखिम को कम करने के लिए केवल धान पर निर्भर न रहें। यदि मौसम साथ नहीं दे रहा है, तो कम पानी की खपत वाली वैकल्पिक फसलों का चुनाव करना आर्थिक दृष्टि से अधिक समझदारी भरा हो सकता है। इसके अलावा, उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसान धान की ही खेती करना चाहते हैं, तो उन्हें लंबी अवधि की किस्मों के बजाय कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बाजार में ऐसी किस्में उपलब्ध हैं जो मात्र 90 दिनों की अवधि में तैयार हो जाती हैं, जो मौजूदा अनिश्चित मौसम में एक सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती हैं।
हाइब्रिड धान का बढ़ता महत्व
अंत में सदानंद चौधरी ने हाइब्रिड धान की किस्मों की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि हाइब्रिड धान कम पानी और कम देखभाल के बावजूद भी बेहतर पैदावार देने में सक्षम होता है। हालांकि, आजमगढ़ में हाइब्रिड किस्मों का प्रचलन फिलहाल कम है, लेकिन बदलते जलवायु चक्र को देखते हुए इनका उपयोग न केवल उत्पादन को बढ़ाने में सहायक होगा बल्कि किसानों को संभावित आर्थिक नुकसान से बचाने में भी प्रभावी साबित होगा।











