सुल्तानपुर में मानसून की दस्तक के साथ ही धान की रोपाई का काम जोर-शोर से चल रहा है। इस दौरान अपनी फसल को अवांछित घास यानी खरपतवार से सुरक्षित रखना किसानों के लिए बेहद आवश्यक है, क्योंकि यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया गया तो पैदावार पर बुरा असर पड़ सकता है। कई किसान रोपाई के तुरंत बाद ही बिना सोचे-समझे खरपतवारनाशी रसायनों का उपयोग कर देते हैं, जो कि वैज्ञानिक तौर पर सही तरीका नहीं है। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो दवाओं का इस्तेमाल तभी कारगर होता है जब खरपतवार की वृद्धि एक निश्चित चरण में पहुंच जाए।
खरपतवारनाशी का सही समय और चरण
खरपतवार के खिलाफ रसायन का उपयोग करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात पौधों की पत्तियों की संख्या है। जब खरपतवार में 3 से 5 पत्तियां निकल आएं, तभी छिड़काव करना सबसे उचित माना जाता है। यदि खरपतवार में 5 से अधिक पत्तियां निकल आएं, तो दवा का असर काफी कम हो जाता है और उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होता है। इसलिए, सही समय का चुनाव करना पैदावार सुरक्षित रखने की पहली शर्त है।
कृषि वैज्ञानिक की सलाह
कृषि विज्ञान केंद्र, सुल्तानपुर के वैज्ञानिक डॉ. ए.के. सिंह का मानना है कि चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों से निपटने के लिए धान की रोपाई के 15 से 20 दिन बाद का समय सबसे उपयुक्त होता है। इस अवस्था में खरपतवार आमतौर पर 2 से 3 पत्तियों वाले हो जाते हैं। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे प्रति एकड़ खेत के हिसाब से बिस्पाइरिबैक सोडियम (Bispyribac Sodium) की तय मात्रा का घोल बनाकर छिड़काव करें।
छिड़काव के समय बरती जाने वाली सावधानियां
रसायन के उपयोग के दौरान खेत में पानी का स्तर बहुत महत्वपूर्ण है। छिड़काव करते समय खेत में अधिक पानी भरा हुआ नहीं होना चाहिए, बल्कि केवल मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। दवा डालने के 24 घंटे बाद ही खेत की सिंचाई करना सबसे बेहतर परिणाम देता है। इस प्रक्रिया का पालन करने से एक हफ्ते के अंदर खरपतवार पूरी तरह खत्म हो जाते हैं और धान की फसल को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।
निराई-गुड़ाई के लाभ
डॉ. ए.के. सिंह यह भी स्पष्ट करते हैं कि रसायनों के अलावा पुरानी और पारंपरिक निराई-गुड़ाई की पद्धति आज भी बेहद प्रभावी है। समय-समय पर निराई-गुड़ाई करने से मिट्टी में हवा का आवागमन बेहतर होता है, जिससे पौधों की जड़ों का विकास तेजी से होता है। इससे फसल न केवल स्वस्थ रहती है, बल्कि उत्पादन में भी काफी बढ़ोतरी होती है।











