बिलासपुर के जदूनंदन प्रसाद वर्मा की जैविक खेती: रासायनिक खाद को छोड़कर कमाई का नया जरियाव्यापार
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बिलासपुर के जदूनंदन प्रसाद वर्मा की जैविक खेती: रासायनिक खाद को छोड़कर कमाई का नया जरिया

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक किसान दंपति ने रासायनिक खेती को त्यागकर जैविक और प्राकृतिक पद्धतियों के माध्यम से लाखों की आय अर्जित की है। यह सफलता अब अन्य किसानों के लिए भी एक मिसाल बन गई है।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मस्तुरी विकासखंड के मल्हार क्षेत्र में रहने वाले प्रगतिशील किसान जदूनंदन प्रसाद वर्मा और उनकी पत्नी दिव्या वर्मा ने खेती में अपनी मेहनत और नवाचार के दम पर एक नई लकीर खींची है। पिछले 22 वर्षों से कृषि कार्य में लगे इस दंपति ने एक दशक पहले रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को समझते हुए इसे पूरी तरह से छोड़ने का साहसी निर्णय लिया। आज वे प्राकृतिक और जैविक खेती के मॉडल को अपनाकर न केवल अपनी मिट्टी को बचा रहे हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी संपन्न हो रहे हैं।

खेती में बदलाव का सिलसिला

जदूनंदन प्रसाद वर्मा और दिव्या वर्मा के अनुसार, शुरुआत के वर्षों में वे पारंपरिक ढंग से खेती करते थे, लेकिन बदलते वक्त के साथ उन्होंने कृषि पद्धतियों में सुधार करने का मन बनाया। कोरोना महामारी के दौरान जब दुनिया भर में सेहत को लेकर चिंताएं बढ़ीं, तब उन्होंने जैविक खेती और आधुनिक तकनीक पर गहन अध्ययन किया। इस दौर में उन्हें एहसास हुआ कि रसायन-मुक्त और पौष्टिक उपज की मांग भविष्य में तेजी से बढ़ने वाली है, जिसके बाद उन्होंने धान के साथ-साथ अन्य फसलों के प्रयोग शुरू किए।

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विविध फसलों के माध्यम से मिली खास पहचान

इस दंपति के फार्म की सबसे बड़ी विशेषता वहां उगाई जा रही फसलों की विविधता है। वे केवल पारंपरिक धान तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सेब, स्ट्रॉबेरी, विभिन्न रंगों वाली फूलगोभी और कई विदेशी प्रजाति के फल और सब्जियां उगाना शुरू किया है। केवल आधा एकड़ जमीन पर सेब की सफलतापूर्वक खेती करके उन्होंने इलाके के लोगों को हैरान कर दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि सही वैज्ञानिक प्रबंधन और तकनीक का प्रयोग किया जाए, तो किसी भी क्षेत्र में नई फसलों का उत्पादन संभव है।

जैविक आदानों का महत्व

अपनी खेती में जदूनंदन वर्मा किसी भी तरह के जहरीले कीटनाशकों या रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं करते हैं। उनकी पूरी फसल गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत जैसे पूरी तरह से जैविक संसाधनों पर टिकी है। इन तकनीकों के प्रयोग से न केवल खेती की लागत में भारी कमी आई है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता और फसल की गुणवत्ता में भी गुणात्मक सुधार हुआ है। पर्यावरण के प्रति उनकी यह जिम्मेदारी आज पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय बनी हुई है।

आर्थिक स्थिरता और सरकारी सहयोग

दो एकड़ भूमि पर खेती करने वाला यह कृषक दंपति प्रति वर्ष ढाई से तीन लाख रुपये तक की शुद्ध आय अर्जित कर रहा है। जदूनंदन वर्मा के अनुसार, जैविक खेती में निवेश कम और मुनाफा ज्यादा है, क्योंकि महंगे रसायनों पर होने वाला खर्च बच जाता है। इसके अलावा उन्हें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से नियमित आर्थिक सहायता भी प्राप्त होती है। इस राशि का निवेश वे जैविक खाद खरीदने और उन्नत कृषि उपकरणों की व्यवस्था करने में करते हैं, जिससे उनके खेती के कामों को और गति मिलती है।

ज्ञान साझा करने का केंद्र बना फार्म

जदूनंदन वर्मा का खेत आज केवल एक व्यवसायिक इकाई नहीं, बल्कि एक सीखने का केंद्र बन चुका है। बिलासपुर और प्रदेश के विभिन्न जिलों से किसान और कृषि विश्वविद्यालय के छात्र नई तकनीकें समझने के लिए उनके फार्म का नियमित दौरा करते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा आयोजित कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से मिले ज्ञान को उन्होंने अपने खेत में उतारकर जो सफलता हासिल की है, वह आज दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है। वर्मा का मानना है कि आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का मेल खेती को एक सम्मानजनक और लाभकारी करियर बना सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य की नींव रखेगा।

सवाल-जवाब

जदूनंदन प्रसाद वर्मा खेती में किन खाद का उपयोग करते हैं?
वे किसी भी रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत का उपयोग करते हैं।
वे खेती से सालाना कितनी कमाई कर रहे हैं?
वे अपनी करीब दो एकड़ भूमि में जैविक खेती करके हर साल ढाई से तीन लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं।
वे कौन सी विशेष फसलें उगा रहे हैं?
वे धान के अलावा सेब, स्ट्रॉबेरी, विभिन्न रंगों की फूलगोभी और कई विदेशी फल और सब्जियां उगा रहे हैं।
क्या उन्हें सरकारी सहायता मिलती है?
हाँ, उन्हें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का नियमित लाभ मिलता है जिसका उपयोग वे कृषि कार्यों में करते हैं।

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