स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में करियर बनाने और मरीजों की देखभाल करने का सपना देखने वाले युवाओं के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि निजी क्लिनिक शुरू करने के लिए कौन सा कोर्स सबसे उपयुक्त है। देश के मौजूदा कानूनों के तहत मरीजों का उपचार करने और चिकित्सा केंद्र चलाने के लिए किसी भी अधिकृत मेडिकल काउंसिल या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त डिग्री का होना अनिवार्य माना गया है। बिना उचित शैक्षणिक योग्यता के चिकित्सीय कार्य करना सीधे तौर पर लोगों की सेहत से खिलवाड़ साबित होता है और यह गंभीर कानूनी दायरे में आता है।
मेडिकल सेक्टर में कदम रखने के लिए पारंपरिक एलोपैथी के अलावा आयुर्वेद, होम्योपैथी, फिजियोथेरेपी और अलाइड हेल्थ साइंसेज जैसे अनेक विकल्प उपलब्ध हैं। आप अपनी व्यक्तिगत रुचि, वित्तीय स्थिति और समय की उपलब्धता के आधार पर इनमें से सही रास्ता चुन सकते हैं। क्लिनिक स्थापित करने के लिए केवल एमबीबीएस की डिग्री होना ही एकमात्र शर्त नहीं है। ऐसे कई विशेष मेडिकल पाठ्यक्रम भी मौजूद हैं जिन्हें पूरा करके आप बिना नाम के आगे डॉक्टर लिखे भी पूरी तरह वैध और सफल चिकित्सा केंद्र संचालित कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि क्लिनिक खोलने के लिए कौन से कोर्स जरूरी हैं और इसके लिए किन कानूनी नियमों का पालन करना होता है।
एमबीबीएस डिग्री और एलोपैथिक प्रैक्टिस के नियम
यदि कोई व्यक्ति एलोपैथिक यानी अंग्रेजी दवाओं के आधार पर सामान्य चिकित्सा केंद्र चलाना चाहता है, तो इसके लिए एमबीबीएस सबसे बुनियादी और लोकप्रिय डिग्री है। यह कुल साढ़े चार साल की अकादमिक पढ़ाई और एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप वाला पाठ्यक्रम है, जिसमें प्रवेश नीट यूजी परीक्षा के माध्यम से मिलता है। इस कोर्स को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद नेशनल मेडिकल कमीशन या संबंधित राज्य की मेडिकल काउंसिल के पास पंजीकरण कराना आवश्यक होता है। पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कोई भी चिकित्सक जनरल प्रैक्टिस क्लिनिक का संचालन शुरू कर सकता है।
आयुष और होम्योपैथी के माध्यम से चिकित्सा विकल्प
वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच आयुर्वेद और होम्योपैथी से जुड़े पाठ्यक्रमों का दायरा भी काफी बढ़ चुका है। आयुर्वेदिक पद्धति के जरिए उपचार करने के लिए बीएएमएस पाठ्यक्रम साढ़े चार साल की अवधि का होता है, जिसे पूरा करने के बाद आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र खोला जा सकता है। दूसरी ओर, होम्योपैथी आधारित क्लिनिक का संचालन करने के लिए बीएचएमएस की डिग्री होना आवश्यक है। इन दोनों ही धाराओं में दाखिला लेने के लिए नीट परीक्षा उत्तीर्ण करना जरूरी है और अपनी प्रैक्टिस शुरू करने के लिए संबंधित आयुष परिषद में रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य है।
थेरेपी और अलाइड हेल्थ साइंसेज के कोर्स
भारी मात्रा में दवाओं का सेवन कराए बिना उपचार करने वाले थेरेपी सेंटर्स की मांग आज के दौर में तेजी से बढ़ रही है। बैचलर ऑफ फिजियोथेरेपी यानी साढ़े चार साल का यह कोर्स पूरा करने के बाद पेशेवर लोग अपना खुद का फिजियोथेरेपी या रिहैबिलिटेशन सेंटर स्थापित कर सकते हैं। इसके अलावा चार साल का बैचलर ऑफ ऑप्टोमेट्री कोर्स आपको अपना विजन केयर या नेत्र परीक्षण क्लिनिक खोलने की अनुमति देता है। इसी तरह स्पीच थेरेपी और हियरिंग एड क्लिनिक चलाने के लिए चार साल का डिग्री कोर्स बेहद लोकप्रिय हो रहा है।
डिप्लोमा कोर्स और कानूनी सच्चाइयां
अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में लोग एक या दो साल का डिप्लोमा कोर्स करके स्वतंत्र रूप से क्लिनिक चलाने की गलती कर बैठते हैं। जमीनी हकीकत यह है कि इस प्रकार के डिप्लोमा केवल प्राथमिक उपचार देने और विश्व स्वास्थ्य संगठन की तयशुदा सीमित दवाओं की अनुशंसा करने के लिए ही मान्य होते हैं। इनके आधार पर अपने नाम के आगे डॉक्टर लिखना या पूर्ण रूप से विकसित एलोपैथिक क्लिनिक चलाना कानून की नजर में अवैध माना जाता है और यह झोलाछाप प्रैक्टिस की श्रेणी में आता है।
क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट और बुनियादी जरूरतें
चिकित्सा की डिग्री प्राप्त करने के अलावा क्लिनिक के भवन और अवसंरचना से जुड़े कई मापदंडों को पूरा करना पड़ता है। चिकित्सा अपशिष्ट यानी बायो-मेडिकल वेस्ट के सुरक्षित निपटान के लिए किसी अधिकृत एजेंसी के साथ विधिवत अनुबंध होना आवश्यक है। इसके अलावा कंसल्टेशन रूम का क्षेत्रफल कम से कम सौ से एक सौ बीस वर्ग फीट होना चाहिए और मरीजों के बैठने की अलग व्यवस्था होनी चाहिए। क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के प्रावधानों के तहत रजिस्ट्रेशन कराना और स्थानीय नगरपालिका प्राधिकरण से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना भी जरूरी है।
पॉलीक्लिनिक मॉडल अपनाकर खर्च कम करें
शुरुआती दौर में क्लिनिक का भारी किराया और आधारभूत ढांचे का खर्च उठाना नए चिकित्सा पेशेवरों के लिए कठिन हो सकता है। इससे निपटने के लिए स्पेस शेयरिंग मॉडल का उपयोग किया जा सकता है। आप किसी पैथोलॉजी लैब, डायग्नोस्टिक सेंटर या रिटेल फार्मेसी के साथ साझेदारी करके सुबह या शाम के समय अपनी ओपीडी संचालित कर सकते हैं। इसके अलावा विभिन्न स्पेशलाइजेशन के तीन-चार डॉक्टर मिलकर भी पॉलीक्लिनिक शुरू कर सकते हैं जिससे शुरुआती लागत में भारी कमी आती है।



















