घरों और रसोइयों से रोजाना निकलने वाले गीले कचरे को अक्सर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, लेकिन अगर व्यावसायिक और तकनीकी नजरिए से देखें तो यह एक अत्यंत कीमती कच्चा माल है। यदि इसका सही तरीके से पुनर्चक्रण किया जाए, तो गीला कचरा न केवल पर्यावरण की सुरक्षा करता है बल्कि सालाना अच्छी कमाई और स्वरोजगार का एक बेहतरीन जरिया भी बन सकता है। आजकल जैविक कचरे का प्रबंधन एक टिकाऊ व्यवसाय का रूप ले चुका है, जिससे लोग अपनी नियमित नौकरी के विकल्प के रूप में नया स्टार्टअप या छोटा उद्योग शुरू कर सकते हैं।
छोटे स्तर पर प्रोसेसिंग: माइक्रो कंपोस्टिंग का प्रभावी तरीका
कम जगह में और घरेलू या स्थानीय स्तर पर काम शुरू करने के लिए जैविक कचरे के प्रसंस्करण के मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जा सकते हैं। पहला तरीका कंपोस्टिंग यानी खाद बनाने का है। गीले कचरे से तैयार जैविक खाद मिट्टी की सेहत सुधारने में मदद करती है और रासायनिक उर्वरकों का एक उत्कृष्ट विकल्प साबित होती है। आधुनिक तकनीकों के आने से अब खाद बनाने की प्रक्रिया बेहद तेज हो गई है। राजकोट में बने एक सफल मॉडल के अनुसार, जैविक कचरे को मशीन में डालने के महज 10 दिन के भीतर खाद बनकर तैयार हो जाती है। कचरे के सड़ने से आने वाली दुर्गंध को खत्म करने के लिए क्योरिंग प्रक्रिया के दौरान एक विशेष दवा यानी इनोक्यूलम का इस्तेमाल किया जाता है। छोटी कंपोस्टिंग इकाइयों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये स्थानीय कचरे का उपयोग करती हैं और इन्हें शुरू करने के लिए बड़े संयंत्रों की तुलना में बहुत कम सरकारी स्वीकृतियों और अनुमतियों की आवश्यकता होती है।
छोटे बायोगैस प्लांट से ऊर्जा उत्पादन
छोटे स्तर पर काम करने का दूसरा बेहतरीन विकल्प बायोगैस प्लांट लगाना है। यह तकनीक एनारोबिक डाइजेशन यानी बिना ऑक्सीजन के कचरे को सड़ाने की प्रक्रिया पर काम करती है। यह उन स्थानों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है जहां नियमित रूप से गीला कचरा उत्पन्न होता है और बनी हुई गैस का तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि किसी रिहायशी इलाके, होटल या संस्थान के आसपास रोजाना लगभग 1 टन गीला कचरा आसानी से उपलब्ध हो जाता है, तो छोटा बायोगैस प्लांट लगाना काफी किफायती और व्यावसायिक रूप से लाभदायक साबित होता है। इससे प्राप्त गैस का उपयोग सीधे खाना पकाने के ईंधन के रूप में किया जा सकता है।
व्यावसायिक स्तर पर बायोमेथेनेशन और कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG)
मध्यम और बड़े स्तर पर भारी मात्रा में गीले कचरे को प्रोसेस करने के लिए बायोमेथेनेशन सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी प्रणाली है। यह तकनीक कंपोस्टिंग संयंत्रों की तुलना में काफी बड़े पैमाने पर काम कर सकती है। बायोमेथेनेशन की प्रक्रिया से बायोगैस तैयार होती है, जिसे आगे शुद्धिकरण प्रक्रियाओं जैसे डीसल्फराइजेशन, अपग्रेडेशन और कंप्रेशन से गुजारा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद बनने वाली गैस को कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) या बायो-CNG कहा जाता है। गुण और उपयोग के मामले में यह प्राकृतिक गैस के समान ही होती है।
कंप्रेस्ड बायोगैस का उपयोग वाहनों में ईंधन के रूप में, उद्योगों में, बिजली बनाने में, हीटिंग में और खाना पकाने में आसानी से किया जा सकता है। इसके अलावा, बड़े बायोमेथेनेशन प्लांट्स से बाय-प्रॉडक्ट के रूप में पोषक तत्वों से भरपूर डाइजस्टेट भी प्राप्त होता है। इस डाइजस्टेट को ठोस और तरल दो भागों में विभाजित किया जाता है। तरल हिस्सा तरल किण्वित जैविक खाद (LFOM) के रूप में इस्तेमाल होता है, जबकि ठोस हिस्सा जैविक खाद (FOM) बनाता है। किसी भी CBG प्लांट को वित्तीय रूप से टिकाऊ और मुनाफे में रखने के लिए ठोस और तरल दोनों प्रकार की जैविक खादों की नियमित बिक्री सुनिश्चित करना बेहद जरूरी होता है।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) की सीनियर प्रोग्राम लीड प्रियंका सिंह के अनुसार, कचरे की उपलब्धता और पूंजी के आधार पर नए उद्यमी इन जैविक तकनीकों का चयन करके अपना सफल व्यवसाय स्थापित कर सकते हैं।



















