वैश्विक मंच पर भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और दुनिया की धुरी अब पारंपरिक पश्चिमी केंद्रों से हटकर नए शक्ति केंद्रों की ओर शिफ्ट हो रही है। भारत की राजधानी नई दिल्ली में 12 से 13 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाली 18वीं ब्रिक्स समिट इस ऐतिहासिक बदलाव का सबसे बड़ा गवाह बनने जा रही है। भारत मंडपम के इस प्रतिष्ठित आयोजन में दुनिया भर के शीर्ष नेता जुट रहे हैं, जिससे यह बहस फिर से सबसे ऊपर आ गई है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का असली सिकंदर कौन है। यह मुकाबला अब केवल दस्तावेजों या विश्लेषकों के अनुमानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य की दिशा तय कर रहा है। एक तरफ जहां पश्चिमी देशों का पुराना और स्थापित समूह खड़ा है, वहीं दूसरी तरफ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का यह विशाल गठबंधन एक मजबूत चुनौती पेश कर रहा है।
जी7 का ऐतिहासिक ढांचा और पश्चिमी देशों का दबदबा
जी7 यानी ग्रुप ऑफ सेवन की नीव 1973 के तेल संकट के तुरंत बाद रखी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के विकसित औद्योगिक लोकतंत्रों को एक मंच पर लाना था। इस विशिष्ट समूह में अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा जैसे देश शामिल हैं, जबकि यूरोपीय यूनियन भी एक गैर-सूचीबद्ध आठवें सदस्य की भूमिका निभाता है। हालांकि इस गुट की कुल आबादी करीब 80 करोड़ है जो वैश्विक जनसंख्या का 10 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन इसके बावजूद यह ग्लोबल फाइनेंस और अत्याधुनिक तकनीकी इनोवेशन पर गहरी पकड़ बनाए हुए है। जी7 की सबसे बड़ी ताकत इसकी राजनीतिक और वैचारिक एकरूपता है, क्योंकि इसके सभी सदस्य देश उच्च आय वाले बाजार और मजबूत संवैधानिक लोकतंत्र हैं। ये सभी देश नाटो या वॉशिंगटन के साथ रणनीतिक और सैन्य समझौतों के जरिए आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
ब्रिक्स प्लस का विजन और दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व
इसके ठीक विपरीत ब्रिक्स की शुरुआत साल 2001 में निवेश से जुड़े एक शब्द के रूप में हुई थी, जब गोल्डमैन सैक्स ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को मिलाकर ब्रिक नाम गढ़ा था। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह ब्रिक्स बना और हालिया विस्तार के दौर के बाद अब यह ब्रिक्स प्लस के रूप में पूरी दुनिया के सामने है। आज इस समूह में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हो चुके हैं। इसके अलावा मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, कजाकिस्तान, बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, युगांडा और उज्बेकिस्तान जैसे देश पार्टनर देशों के रूप में इस नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। ब्रिक्स प्लस के पूर्ण सदस्यों की कुल आबादी साढ़े तीन अरब से अधिक है, जो दुनिया की कुल आबादी का लगभग 45 से 48 प्रतिशत हिस्सा है। अगर इसमें पार्टनर देशों को भी जोड़ लिया जाए, तो यह पूरा गठबंधन मानवता के आधे से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है और इसका प्रभाव यूरेशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया तक फैला हुआ है।
वैचारिक विविधता और ग्लोबल साउथ की मजबूत होती आवाज
जी7 की तरह ब्रिक्स प्लस किसी एक समान राजनीतिक विचारधारा या शासन प्रणाली से बंधा हुआ संगठन नहीं है। इस मंच पर भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे परिपक्व लोकतंत्र कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, तो वहीं चीन और वियतनाम जैसे देश भी इसके मुख्य स्तंभ हैं। इसके साथ ही यूएई जैसी राजशाही और ईरान जैसे इस्लामिक रिपब्लिक भी इस महासंघ का हिस्सा हैं, जो इसकी वैचारिक विविधता को पूरी तरह से साफ करते हैं। इन तमाम अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों वाले देशों को एक धागे में पिरोने वाली एकमात्र कड़ी पश्चिमी देशों के आर्थिक दबाव से मुक्ति पाना और एक बहुध्रुवीय यानी मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर का निर्माण करना है। नई दिल्ली में आयोजित हो रही 18वीं ब्रिक्स समिट इसी विविधता को एक ठोस शक्ति में तब्दील करने पर फोकस कर रही है, जहां भारत की अध्यक्षता में ग्लोबल साउथ की आवाज को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूती दी जा रही है।
नॉमिनल जीडीपी के मामले में जी7 की मजबूत बढ़त
जब दोनों गुटों की आर्थिक और वित्तीय ताकत का सटीक आकलन किया जाता है, तो विश्लेषकों को मुख्य रूप से दो बड़े पैमानों नॉमिनल जीडीपी और परचेजिंग पावर पैरिटी यानी पीपीपी का अध्ययन करना होता है। यदि मौजूदा बाजार विनिमय दरों के हिसाब से तुलना की जाए, तो जी7 आज भी काफी आगे नजर आता है, जिसमें अकेले अमेरिका की 28 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की विशाल अर्थव्यवस्था इस समूह को सबसे बड़ी ताकत प्रदान करती है। दुनिया की कुल नॉमिनल जीडीपी में अकेले जी7 की हिस्सेदारी लगभग 43 से 45 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है। इसके मुकाबले विस्तारित ब्रिक्स प्लस गठबंधन के पास वैश्विक नॉमिनल जीडीपी का लगभग 28 से 30 प्रतिशत हिस्सा ही आता है। जी7 का यह आर्थिक दबदबा उनके नागरिकों की प्रति व्यक्ति संपत्ति में भी साफ झलकता है, क्योंकि जी7 देशों की औसत प्रति व्यक्ति जीडीपी 50 हजार डॉलर से ज्यादा है, जबकि ब्रिक्स प्लस का औसत अभी भी 10 हजार से 12 हजार डॉलर के दायरे में सिमटा हुआ है।
क्रय शक्ति यानी पीपीपी के मोर्चे पर ब्रिक्स की बादशाहत
हालांकि तस्वीर पूरी तरह से पलट जाती है जब अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन क्रय शक्ति यानी पीपीपी के आधार पर किया जाता है। घरेलू क्रय शक्ति के मानकों के लिहाज से ब्रिक्स प्लस दुनिया की 35 से 37 प्रतिशत जीडीपी को नियंत्रित करता है, जिससे उसने जी7 को पीछे छोड़ दिया है। इस मोर्चे पर जी7 की कुल हिस्सेदारी घटकर 29 से 30 प्रतिशत के आसपास रह जाती है। ब्रिक्स देशों में मैन्युफैक्चरिंग, बुनियादी निर्माण और लेबर कॉस्ट काफी कम होने के कारण वहां खर्च होने वाले एक डॉलर का इस्तेमाल पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक बड़े पैमाने पर होता है। इन तमाम आर्थिक आंकड़ों और रणनीतिक बदलावों के बीच यह समिट यह तय करने जा रही है कि आने वाले समय में दुनिया की दिशा कौन तय करेगा।



















