वैश्विक अर्थव्यवस्था में क्या एक बड़ा भूचाल आने की तैयारी चल रही है? दुनिया के उभरते हुए बड़े देशों के संगठन ब्रिक्स (BRICS) की ओर से एक ऐसी भुगतान व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है, जो भविष्य में स्विफ्ट (SWIFT) यानी सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन पर निर्भरता को काफी हद तक घटा सकती है। चूंकि साल 2026 में इस समूह की कमान भारत के पास है और इसका शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित होना है, इसलिए इस विषय की चर्चा पूरी दुनिया में काफी तेज हो गई है। हालांकि शुरुआत में ही इस बात को भली-भांति समझ लेना जरूरी है कि अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है कि साल 2026 में ही स्विफ्ट का कोई तैयार और पूरी तरह से समानांतर विकल्प बाजार में उतार दिया जाएगा।
नई दिल्ली में होने वाले इस आगामी सम्मेलन के दौरान क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट, आपपसी कारोबार के लिए स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाओं जैसे अहम मुद्दों पर भारत की भूमिका बेहद अहम रहने वाली है। यही वजह है कि ब्रिक्स 2026 को वैश्विक आर्थिक ढांचे में संभावित बदलावों की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।
लेकिन असल सच्चाई किसी एक ब्रांड नए भुगतान नेटवर्क के अचानक लांच होने से कहीं ज्यादा गहरी है। असल प्रयास अलग-अलग देशों के पहले से मौजूद पेमेंट सिस्टम्स को एक-दूसरे के साथ जोड़ना, आपसी व्यापार के लिए डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी CBDC के चलन को मजबूत करना है। अगर ये तमाम प्रयास आने वाले वक्त में अपने बड़े पैमाने पर कामयाब होते हैं, तो यह अमेरिकी आधिपत्य और डॉलर पर आधारित ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर सकते हैं।
SWIFT और अमेरिकी वित्तीय शक्ति का गहरा संबंध
स्विफ्ट नेटवर्क का अमेरिकी वित्तीय ताकत से सीधा और गहरा नाता है क्योंकि यह दुनियाभर में होने वाले अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन के लिए एक अत्यंत सुरक्षित मैसेजिंग सिस्टम के तौर पर काम करता है। स्विफ्ट खुद एक खाते से दूसरे खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर नहीं करता, बल्कि दुनिया भर के बैंकों के बीच भुगतान से जुड़े जरूरी निर्देश और संदेश भेजने का काम करता है। चूंकि दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल करता है, इसलिए अमेरिकी वित्तीय संस्थान इस पूरे तंत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा जगजाहिर है। स्विफ्ट के माध्यम से होने वाले तमाम अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में अकेले डॉलर की हिस्सेदारी लगभग आधी रही है। इसी वजह से अमेरिका के बैंक और वित्तीय संस्थान ग्लोबल पेमेंट चेन के सबसे बड़े केंद्र बने हुए हैं।
ब्रिक्स देशों का असली मकसद क्या है?
ब्रिक्स देशों के बीच सीमा-पार भुगतान को अधिक सुगम और सरल बनाने की यह मांग कोई आज की नहीं है। रूस के ऊपर पश्चिमी देशों की तरफ से जब से कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं, तब से इस मुद्दे की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ गई है। ब्रिक्स देशों के भीतर यह वैचारिक समझ काफी मजबूत हुई है कि ग्लोबल ट्रेड के लिए किसी एक अकेले देश या एक ही वित्तीय नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भर रहना बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम पैदा कर सकता है। भारत की तरफ से भी इस दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं और काम को आगे बढ़ाया जा रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने 11 अगस्त 2026 को यह जानकारी दी थी कि ब्रिक्स देश क्रॉस-बॉर्डर भुगतानों के लिए फास्ट पेमेंट सिस्टम्स को आपस में जोड़ने और सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं के बीच आपसी संपर्क स्थापित करने जैसे तमाम विकल्पों पर बेहद गंभीरता से विचार-विमर्श कर रहे हैं।
इसका सीधा सा मतलब यह है कि फिलहाल किसी अचानक से सामने आने वाले नए स्विफ्ट का निर्माण लक्ष्य नहीं है। बल्कि कोशिश यह की जा रही है कि अलग-अलग देशों की मौजूदा डिजिटल पेमेंट क्षमताओं को आपस में जोड़कर अंतरराष्ट्रीय भुगतानों को आम लोगों और कारोबारियों के लिए बेहद आसान बना दिया जाए।
SWIFT नेटवर्क आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
इस पूरे खेल को समझने के लिए स्विफ्ट की कार्यप्रणाली को गहराई से जानना आवश्यक है। स्विफ्ट अपने आप में कोई ऐसा बैंक नहीं है जो किसी के खाते से पैसे निकालकर दूसरे के खाते में जमा कर दे। यह असल में दुनिया भर के बैंकों और वित्तीय घरानों के बीच भुगतान से जुड़े सुरक्षित संदेश भेजने और निर्देश पहुंचाने का एक बहुत बड़ा तकनीकी नेटवर्क है।
इसे एक उदाहरण के जरिए ऐसे समझ सकते हैं कि जब भी भारत का कोई बैंक किसी दूसरे देश के बैंक को अंतरराष्ट्रीय पेमेंट के सिलसिले में निर्देश भेजता है, तो इस पूरी प्रक्रिया के पीछे स्विफ्ट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही कारण है कि स्विफ्ट केवल एक साधारण तकनीकी नेटवर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम में इसकी पहुंच इसे एक बहुत बड़ी भू-राजनीतिक ताकत का जरिया भी बना देती है।
जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते रूस के कुछ चुनिंदा बैंकों को स्विफ्ट के इस नेटवर्क से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, तब पूरी दुनिया ने यह बखूबी देखा कि किसी अंतरराष्ट्रीय पेमेंट नेटवर्क तक सीधी पहुंच होना कितना मायने रखता है। यही मुख्य वजह है कि ब्रिक्स देशों के भीतर चल रही वैकल्पिक भुगतान प्रणाली की चर्चा को केवल एक सामान्य तकनीकी मामला नहीं माना जा रहा है।
- संदेश भेजना: जब आप भारत से किसी दूसरे देश में पैसे ट्रांसफर करते हैं, तो आपका बैंक एक बेहद सुरक्षित स्विफ्ट मैसेज तैयार करता है।
- SWIFT कोड: दुनिया भर के हर एक बैंक की विशेष शाखा को 8 से 11 अंकों का एक यूनिक कोड मिलता है, जिसे स्विफ्ट कोड या BIC कहा जाता है। यह कोड इस बात की पहचान करता है कि पैसा दुनिया के किस देश, किस बैंक और किस शाखा में पहुंचना है।
- मध्यस्थ बैंक: अगर भेजने वाले बैंक और पाने वाले बैंक का आपस में कोई सीधा खाता नहीं है, तो बीच में कॉरेस्पोंडेंट बैंकों की मदद ली जाती है और स्विफ्ट संदेश के माध्यम से भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
क्या BRICS Pay कभी स्विफ्ट का सीधा विकल्प बन पाएगा?
यही वह जगह है जहां सबसे ज्यादा सावधानी बरतने और गहराई से सोचने की जरूरत है। ब्रिक्स पे के नाम से एक साझा भुगतान व्यवस्था का विचार लंबे समय से सामने आता रहा है, लेकिन इसे अभी से स्विफ्ट का कोई स्थापित और पूर्ण विकल्प मान लेना बिल्कुल भी सही नहीं होगा। स्विफ्ट का यह विशाल नेटवर्क कई दशकों की मेहनत के बाद खड़ा हुआ है, जिसके साथ दुनिया भर के हजारों बैंक और वित्तीय संस्थान जुड़े हुए हैं।
दूसरी तरफ यदि हम ब्रिक्स देशों की बात करें तो उनके बैंकिंग और पेमेंट सिस्टम्स एक-दूसरे से काफी अलग हैं। भारत का यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI), चीन की अपनी अलग डिजिटल भुगतान व्यवस्था और रूस की वित्तीय प्रणालियां एक जैसी तकनीक और नियमों पर काम नहीं करतीं, जिसके कारण एक साझा ढांचा तैयार करने में अभी लंबा समय लग सकता है।


















