हरियाणा सरकार ने गुरुग्राम और नूह जिलों में एक निजी कंपनी को समानांतर बिजली वितरण का अधिकार दिए जाने के नियामक आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया है। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने स्पष्ट किया है कि राज्य प्रशासन इस विनियामक निर्णय के विरुद्ध विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण, जिसे संक्षेप में एप्टेल के नाम से जाना जाता है, का दरवाजा खटखटाएगा। यह पूरा विवाद हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग द्वारा एक निजी वितरण इकाई को दिए गए 25 साल के परिचालन लाइसेंस से जुड़ा हुआ है, जिससे राज्य में बिजली वितरण के मौजूदा ढांचे में भारी बदलाव की संभावना बन गई है।
नियामक आयोग का आदेश और लाइसेंस की शर्तें
विवाद की जड़ में हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग का वह आदेश है, जिसके तहत इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड को विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 14 के प्रावधानों के अंतर्गत समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस स्वीकृत किया गया है। कंपनी के अनुसार, विनियामक आयोग का यह आधिकारिक आदेश 19 अक्टूबर की तारीख का है। इस स्वीकृति के माध्यम से कंपनी को गुरुग्राम और नूह दोनों राजस्व जिलों में विद्युत आपूर्ति का नेटवर्क तैयार करने और बिजली वितरित करने का अधिकार 25 वर्षों की अवधि के लिए प्रदान किया गया है।
इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड ने इस परियोजना को लेकर अपनी व्यापक व्यावसायिक रणनीति भी साझा की है। कंपनी ने जानकारी दी है कि वह इन दोनों जिलों में अपने बिजली वितरण नेटवर्क और बुनियादी ढांचे को स्थापित करने के लिए पांच वर्षों की समयावधि में 4,717 करोड़ रुपये का पूंजीगत निवेश करने की योजना बना रही है। कंपनी का अनुमान है कि उसका नेटवर्क तैयार होने के बाद वह वित्त वर्ष 2027-28 तक उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति शुरू कर सकेगी।
राज्य सरकार का विरोध और ऊर्जा मंत्री का रुख
हरियाणा के ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए राज्य सरकार के इस कड़े रुख की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने कहा कि विनियामक आयोग के इस आदेश को एप्टेल के समक्ष पूरी मजबूती से चुनौती दी जाएगी। अनिल विज ने रेखांकित किया कि सरकार पहले दिन से ही इन दोनों संवेदनशील और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जिलों में समानांतर बिजली वितरण प्रणाली स्थापित करने के पक्ष में नहीं रही है।
ऊर्जा मंत्री ने इस प्रक्रिया के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि निजी कंपनी ने यह आवेदन सीधे विनियामक आयोग के समक्ष प्रस्तुत किया था। विनियामक आयोग एक स्वायत्त और स्वतंत्र संस्था के रूप में काम करता है, जिसके कारण यह अर्जी राज्य के ऊर्जा विभाग के माध्यम से नहीं भेजी गई थी। जब आयोग ने इस प्रस्ताव पर विचार शुरू किया और औपचारिक रूप से राज्य सरकार से उसका पक्ष और जवाब मांगा, तो सरकार ने स्पष्ट तौर पर इस प्रस्ताव के प्रत्येक बिंदु का विरोध दर्ज कराया था। सरकार का कहना है कि समीक्षा प्रक्रिया के दौरान उसका रुख पूरी तरह अडिग और निरंतर रहा है कि सार्वजनिक बिजली वितरण प्रणाली के समानांतर निजी व्यवस्था को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
समानांतर वितरण मॉडल और उपभोक्ताओं पर प्रभाव
समानांतर वितरण व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं पर नजर डालें तो यह मौजूदा व्यवस्था को तुरंत समाप्त नहीं करती है। वर्तमान में इन दोनों जिलों में बिजली आपूर्ति का कार्य सरकारी क्षेत्र की वितरण उपयोगिता दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम संभाल रही है। आयोग द्वारा जारी किए गए नए लाइसेंस के बाद भी दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम का कामकाज बंद नहीं होगा और वह अपनी आपूर्ति पहले की तरह जारी रखेगी।
इस व्यवस्था के लागू होने पर आम उपभोक्ताओं को तत्काल कोई कदम उठाने या बदलाव करने की आवश्यकता नहीं होगी। उपभोक्ताओं के पास यह विकल्प तब उपलब्ध होगा जब इलेवन पावर का भौतिक बुनियादी ढांचा और आपूर्ति लाइनें उनके संबंधित रिहायशी या व्यावसायिक क्षेत्रों तक पहुंच जाएंगी। इसके बाद उपभोक्ता अपनी पसंद के अनुसार वर्तमान सरकारी आपूर्तिकर्ता के साथ बने रहने या निजी कंपनी की सेवाओं को चुनने का निर्णय ले सकेंगे।
राजनीतिक विरोध और सार्वजनिक उपक्रमों पर असर की चिंताएं
इस विनियामक निर्णय के सार्वजनिक होते ही राज्य की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। इंडियन नेशनल लोक दल के संरक्षक और पूर्व मंत्री संपत सिंह ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए सार्वजनिक बिजली क्षेत्र के भविष्य पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संपत सिंह ने कहा कि इलेवन पावर को गुरुग्राम और नूह के लिए समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस देने का निर्णय कोई सामान्य विनियामक आदेश नहीं है।
संपत सिंह ने इस फैसले को हरियाणा के सार्वजनिक बिजली क्षेत्र, किसानों, ग्रामीण उपभोक्ताओं और गरीबों के हितों पर एक बड़ा और गंभीर आघात बताया है। उनका तर्क है कि बिजली जैसी बुनियादी और अनिवार्य सेवा का मुख्य उद्देश्य मुनाफा कमाने से पहले जनसेवा होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हरियाणा के बिजली वितरण इतिहास में यह पहला अवसर है जब एक ही भौगोलिक क्षेत्र में दो वितरण एजेंसियों को संचालन की अनुमति दी गई है। अब तक राज्य के किसी भी हिस्से में वितरण का कार्य या तो पूरी तरह से राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम द्वारा किया जाता था या फिर किसी निजी कंपनी द्वारा, लेकिन एक ही आपूर्ति क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करने वाली दो समानांतर एजेंसियों की व्यवस्था पहले कभी नहीं रही।
राजस्व संतुलन और कानूनी प्रक्रिया
संपत सिंह ने इस फैसले के पीछे सरकार के रुख पर भी सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया में सरकार की भूमिका पूरी तरह अलग-थलग नहीं दिखती। उन्होंने विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया कि दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम के कुल राजस्व में गुरुग्राम का योगदान अत्यधिक और असंगत रूप से अधिक है। इसके अतिरिक्त, गुरुग्राम पूरे राज्य में उन गिने-चुने क्षेत्रों में शामिल है जहां बिजली वितरण हानियां सबसे कम स्तर पर दर्ज की जाती हैं। ऐसे उच्च राजस्व वाले क्षेत्र में निजी कंपनी के प्रवेश से सरकारी वितरण निगम की वित्तीय सेहत पर भारी दबाव पड़ सकता है, जिससे कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों को मिलने वाली सब्सिडी और सस्ती बिजली पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
अब यह पूरा मामला विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के न्यायिक दायरे में जाने को तैयार है। एक तरफ जहां राज्य सरकार विनियामक आयोग के फैसले को कानूनी रूप से निरस्त कराने के लिए अपील की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ निजी कंपनी 2027-28 के अपने आपूर्ति लक्ष्य और 4,717 करोड़ रुपये के निवेश की तैयारी में है। जब तक न्यायाधिकरण इस पर कोई स्थगन या अंतिम निर्णय नहीं देता, तब तक दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम गुरुग्राम और नूह में अपनी नियमित सेवाएं जारी रखेगा।



















