उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के विकासखंड झंझरी के अंतर्गत आने वाली ग्राम सभा केशवपुर पहाड़वा में खेती की नई तस्वीरें सामने आ रही हैं। यहां के किसान अब लकीर के फकीर बने रहने के बजाय पारंपरिक तौर-तरीकों के साथ आधुनिक तकनीकों और जैविक खेती का मेल बैठा रहे हैं। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए इलाके के एक युवा किसान ने जैविक खाद और नई तकनीकों के सहारे गन्ने की खेती में एक अलग ही मुकाम हासिल किया है। इस अनोखे प्रयोग से उन्हें न केवल लागत घटाने में मदद मिल रही है, बल्कि बंपर पैदावार की उम्मीद भी बंध गई है।
जैविक खाद और वर्मी कंपोस्ट का हो रहा इस्तेमाल
प्रगतिशील किसान प्रिंस सिंह ने अपनी खेती के तौर-तरीकों पर खुलकर बात की है। उनका साफ कहना है कि गन्ने की बंपर फसल तभी संभव है जब खेत की मिट्टी अंदर से उपजाऊ और सेहतमंद हो। मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए रासायनिक खादों के बजाय गोबर की सड़ी खाद और अन्य जैविक विकल्पों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे मिट्टी में प्राकृतिक जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और उसकी उर्वरक क्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। गन्ने की इस फसल के लिए वर्मी कंपोस्ट और पारंपरिक गोबर की खाद का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।
लेजर तकनीक से बुवाई और पांच बीघा में खेती
इस आधुनिक खेती की सबसे बड़ी खासियत इसकी बुवाई का तरीका है। प्रिंस सिंह ने अपने खेतों में गन्ने की बुवाई के लिए लेजर विधि का सहारा लिया है, जिससे पौधों को एक समान दूरी और सही गहराई मिलती है। वर्तमान में वह करीब पांच बीघा जमीन पर गन्ने की खेती कर रहे हैं। इस पूरी खेती में उनकी लागत बेहद कम यानी लगभग 20 से 25 हजार रुपये के बीच आई है। कम लागत के बावजूद फसल की सेहत को देखकर उन्हें पूरी उम्मीद है कि प्रति बीघा लगभग 80 से 90 क्विंटल तक गन्ने का उत्पादन आसानी से हासिल हो जाएगा।
पिछले तीन साल से कर रहे जैविक खेती
जैविक खेती का यह सफर कोई अचानक उठाया गया कदम नहीं है। प्रिंस सिंह पिछले तीन साल से लगातार जैविक पद्धति से ही फसलें उगा रहे हैं। गन्ने के अलावा उनकी अन्य फसलों में भी केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है। उनका दृढ़ विश्वास है कि जैविक खाद का प्रयोग करने से जमीन की सेहत सुधरती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बची रहती है।
गन्ने की खास किस्में और बंपर लंबाई
अपने खेतों में उन्होंने गन्ने की दो प्रमुख किस्मों को जगह दी है, जिनके नाम 16201 और 14201 हैं। स्थानीय कृषि जानकारों और उनके अपने अनुभव के मुताबिक, ये दोनों किस्में गोंडा के क्षेत्रीय वातावरण और आबोहवा के लिए बेहद मुफीद मानी जाती हैं। इन खास किस्मों के गन्ने की लंबाई सामान्यतः 10 से 12 फीट तक चली जाती है। आधुनिक लेजर तकनीक और जैविक खाद के इस बेहतरीन तालमेल से उन्हें पूरा भरोसा है कि इस सीजन में गन्ने की बंपर पैदावार के साथ-साथ बंपर मुनाफा भी कमाने को मिलेगा।

















