लखनऊ से सटे मलिहाबाद के आम कारोबारियों और बागबानों के लिए यह सीजन उम्मीद के उलट निराशा लेकर आया है। दशकों से जिस फसल की कमाई पर वे टिके थे, वही इस बार उनके गले की फांस बन गई है। वजह है कीटनाशकों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, जिसके चलते जापान ने यहां के आम का आयात रोक दिया है। सिर्फ जापान ही नहीं, अमेरिका भी अब इन किसानों का आम नहीं उठा रहा।
निर्यात के रास्ते एक के बाद एक बंद
खाड़ी और यूरोपीय देशों तक आम भेजना भी मुश्किल हो चला है। अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का सीधा असर आम के निर्यात पर पड़ा है, क्योंकि किराया इतना बढ़ गया है कि व्यापारी वहां माल भेज ही नहीं पा रहे। इस पर मौसम की मार अलग रही। मार्च में मौसम के उतार चढ़ाव, बारिश और ओलों ने आम का आकार और रंगरूप दोनों बिगाड़ दिए, जिससे एक्सपोर्ट क्वालिटी का फल मिलना ही कठिन हो गया। किसान बताते हैं कि बेमौसम बारिश के बाद फल को कीड़ों से बचाने के लिए उन्हें और ज्यादा कीटनाशक छिड़कना पड़ा, और यही बात निर्यात पर भारी पड़ गई।
बीस साल का कारोबार और एक झटका
मलिहाबाद के माल इलाके में बिशन पाल सिंह का 15 बीघे में फैला आम का बाग है। पिछले बीस साल से वे अमेरिका और जापान को आम भेजते आ रहे हैं। बिशन ने जापान को 8-8 लाख रुपये तक का आम भेजा है, जबकि पिछले साल करीब तीन लाख रुपये का माल वहां गया था। इस बार भी उन्होंने पूरे साल जापान और अमेरिका भेजने की पक्की तैयारी की थी।
तैयारी का अंदाजा इसी से लगाइए कि जब आम डाल पर बेहद छोटा था, तभी हर फल पर अलग-अलग खास पैकेट चढ़ाया गया, ताकि छिड़काव का कीटनाशक फल तक न पहुंचे। पैकेट बांधने के लिए अलग से मजदूर लगाए गए। उम्मीद अच्छी कमाई की थी, मगर जापान और अमेरिका दोनों ने माल लेने से ही इनकार कर दिया। नतीजा यह कि जो आम जापान में डेढ़ सौ रुपये में जाता था, उसे अब लोकल मंडी में 28 से 35 रुपये में बेचना पड़ रहा है।
नकली और जहरीले कीटनाशकों का खेल
मलिहाबाद के 80 साल के कलीमुल्ला खान को आम पर किए गए काम के लिए पद्मश्री मिला है। उनका साफ कहना है कि आमों पर जहरीले कीटनाशक छिड़के जा रहे हैं जो भारी नुकसान करते हैं। बाजार में नकली कीटनाशक तक बिक रहे हैं, जिन्हें किसान अनजाने में छिड़क रहे हैं। उनके मुताबिक जापान में खाने-पीने की चीजों को लेकर बेहद सख्ती बरती जाती है, इसीलिए वह यह आम नहीं ले रहा, जबकि हमारे यहां तकरीबन हर आम में खतरनाक कीटनाशक मौजूद है।
मंडी में रफ्तार से बिक रहा वही आम
दिलचस्प यह है कि जिस आम को जापान ने ठुकरा दिया, वही मलिहाबाद की मंडी में धड़ल्ले से बिक रहा है। आढ़तियों का तर्क है कि बिना कीटनाशक के छिड़काव के आम पैदा हो ही नहीं सकता, और जब हर फल-सब्जी में कीटनाशक है तो आम भी अछूता नहीं। यह पहला मौका नहीं है। अस्सी के दशक में भी जापान ने फ्रूट फ्लाई की वजह से भारत के आम पर रोक लगाई थी। बाद में ट्रीटमेंट के तरीके बदले गए और 2006 में भारत ने दोबारा जापान को आम भेजना शुरू किया। अब करीब बीस साल बाद जापान ने फिर वही दरवाजा बंद कर दिया है।
निर्यात से पहले होने वाला ट्रीटमेंट
मलिहाबाद में निर्यात के लिए एक पैक हाउस बना हुआ है। यहां के मैनेजर सचिन बताते हैं कि जापान भेजने से पहले आम का खास ट्रीटमेंट किया जाता है, जिसे वेपर हीट ट्रीटमेंट यानी VHT कहते हैं। इसमें आमों को कुछ देर के लिए गर्म हवा के चेंबर में रखा जाता है, ताकि फल के भीतर के कीड़े और लार्वा खत्म हो जाएं और कीटनाशक का असर भी मिट जाए। हाल ही में जापान की एक टीम भारत आई और उसने मलिहाबाद, महाराष्ट्र समेत देश के दूसरे हिस्सों में लगे प्लांट देखे। टीम को इसी प्रक्रिया में खामियां मिलीं, और उसके बाद ही जापान ने आम लेने से मना किया।
दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, फिर भी संकट
भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक है। दुनिया भर के कुल उत्पादन का 40 से 45 फीसदी आम अकेले भारत में होता है। अकेले यूपी में करीब 2.8 लाख हेक्टेयर में आम के बाग हैं, जहां हर साल लगभग सत्तर लाख मीट्रिक टन आम पैदा होता है। इसमें लखनऊ के माल, मलिहाबाद और काकोरी बेल्ट का बड़ा हिस्सा है। आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में करीब 30 हजार टन आम का निर्यात हुआ, जो जापान के अलावा UAE, अमेरिका, ब्रिटेन, कुवैत और कतर तक भेजा गया। अकेले जापान को हर साल दो हजार मीट्रिक टन तक आम जाता रहा है। अब उत्पादकों को असली डर यह सता रहा है कि कहीं बाकी देश भी भारत से आम लेना बंद न कर दें।













