भारत में उद्यमशीलता को नई दिशा देने के लिए नीतिगत स्तर पर कई बुनियादी बदलाव किए गए हैं। शुरुआती विचार को एक ठोस वाणिज्यिक उत्पाद में तब्दील करने, उत्पादन आरंभ करने और फिर उसे ग्राहकों तक पहुंचाने की राह अब पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित हो चुकी है। देश भर के नए उद्यमी और छोटे कारोबारी अभिनव उत्पादों के साथ बाजार में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, किसी भी नए उद्यम के सामने सबसे चुनौतीपूर्ण पड़ाव प्रोटोटाइप तैयार करने के बाद उसे कानूनी मानकों पर खरा उतारना और वाणिज्यिक स्तर पर ग्राहकों के हाथों तक सुरक्षित पहुंचाना होता है। इस पूरी यात्रा में सरकारी सहायता योजनाएं और तकनीकी मानकों का अनुपालन दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरे हैं।
शुरुआती पूंजी और वित्तीय मदद के लिए सरकारी पहल
नया उद्यम शुरू करते समय पूंजी जुटाना सबसे पहली जरूरत होती है, लेकिन यह पूरी यात्रा का केवल एक चरण भर है। केंद्र सरकार की स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम नए उद्यमियों को बिल्कुल शुरुआती दौर में सहारा देती है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य उद्यमियों को प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट साबित करने, उत्पाद का प्रोटोटाइप विकसित करने, उसकी लैब टेस्टिंग कराने और बाजार में पहली बार कदम रखने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है। कई बार बेहतरीन तकनीकी समझ रखने वाले उद्यमियों के पास शुरुआती परीक्षणों के लिए धन नहीं होता, जहां यह सीड फंड योजना उनके लिए काफी मददगार साबित होती है।
इसके साथ ही, छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के उद्देश्य से सरकार ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज के लिए क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट की व्यवस्था की है। यह ट्रस्ट सूक्ष्म और लघु उद्योगों को बिना किसी पारंपरिक कोलैटरल अथवा संपत्ति को गिरवी रखे बैंकों से कर्ज हासिल करने की सुविधा देता है। जब वित्तीय जोखिम को साझा करने की व्यवस्था मौजूद होती है, तो बैंकों के लिए भी शुरुआती चरण के उद्योगों को ऋण देना आसान हो जाता है। इस प्रकार फंडिंग, क्रेडिट और तकनीकी सहायता के लिए बनाई गई नीतियां नए उद्यमों की रीढ़ बन रही हैं।
आइडिया से वाणिज्यिक उत्पाद तक का सफर और टेस्टिंग की बाधाएं
उत्पाद आधारित स्टार्टअप्स और एमएसएमई के लिए सिर्फ एक अच्छा विचार होना ही पर्याप्त नहीं होता। किसी भी अवधारणा से अंतिम उत्पाद तक पहुंचने के लिए क्रमबद्ध चरणों से गुजरना पड़ता है। इनमें सबसे पहले प्रोटोटाइप डेवलपमेंट होता है, जिसके बाद कठोर टेस्टिंग, विनियामक सर्टिफिकेशन, आधिकारिक अप्रूवल, पूर्ण स्तर का कमर्शियल प्रोडक्शन और अंततः बाजार में वितरण शामिल हैं। कारोबार स्थापित करने और विनियामक मंजूरियां दिलाने में सहयोग करने वाली परामर्शदाता फर्म जेआर कम्प्लायंस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ऋषिकेश मिश्रा के अनुसार, पैसा तो बस कहानी की शुरुआत है। उनका मानना है कि वास्तविक कठिनाई तब सामने आती है जब उद्यमी अपने विचारों को बाजार के अनुकूल, प्रमाणित उत्पाद का रूप देने का प्रयास करते हैं।
अक्सर देखा गया है कि नए और छोटे उद्यमों के पास विस्तृत परीक्षण और प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए न तो पर्याप्त तकनीकी संसाधन होते हैं और न ही जरूरी तकनीकी जानकारी। इस कमी के कारण उत्पाद के विकास में अप्रत्याशित देरी होती है और कुल परियोजना लागत में भारी वृद्धि हो जाती है। देश में किफायती और सुलभ टेस्टिंग सुविधाओं की अनुपलब्धता भी छोटी इकाइयों के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
घरेलू लैब की ऊंची लागत और संस्थागत सहयोग की जरूरत
एक छोटी मैन्युफैक्चरिंग अथवा टेक फर्म के लिए अपनी खुद की अत्याधुनिक प्रयोगशाला स्थापित करना और महंगे वैज्ञानिक उपकरण खरीदना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं होता। भारी पूंजीगत व्यय से बचने के लिए छोटे कारोबारियों को बाहरी स्वतंत्र प्रयोगशालाओं और परीक्षण केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह निर्भरता कई बार समय और खर्च दोनों को बढ़ा देती है।
इस समस्या के समाधान के रूप में सरकारी संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों और मान्यता प्राप्त परीक्षण संगठनों के बीच व्यापक समन्वय की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यदि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों और सरकारी शोध केंद्रों में मौजूद उन्नत लैब बुनियादी ढांचे तक छोटे व्यवसायों को साझा आधार पर पहुंच दी जाए, तो टेस्टिंग की प्रक्रिया काफी सरल, तेज और किफायती बन सकती है।
रेगुलेटरी मानक और कानूनी दस्तावेजों की अनिवार्यता
कारोबार को कानूनी रूप से वैध और उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित बनाने के लिए कड़े मानकों का अनुपालन अनिवार्य होता है। उत्पादन की मुख्य प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही सभी नियामक औपचारिकताओं को समझ लेना बेहद जरूरी है। भारत में विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग मानक तय हैं, जैसे भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस, टेलीकॉम उपकरण प्रमाणन यानी टीईसी, वायरलेस प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन यानी डब्ल्यूपीसी, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड यानी एईआरबी और पर्यावरण सुरक्षा से जुड़ा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर।
अधूरे दस्तावेज तैयार करना, आवश्यक टेस्ट रिपोर्ट न होना या नियामक दिशा-निर्देशों की अनदेखी करना किसी भी उद्यम के लिए महंगा सौदा साबित हो सकता है। इससे सर्टिफिकेशन जारी होने की समयसीमा महीनों खिंच जाती है और अतिरिक्त खर्च का बोझ बढ़ता है। जेआर कम्प्लायंस के ऋषिकेश मिश्रा ने रेखांकित किया कि उनकी फर्म ने देश भर में 10,000 से अधिक कंपनियों को 5,000 से ज्यादा सर्टिफिकेशन हासिल करने में सहायता दी है। वे बीआईएस, टीईसी, डब्ल्यूपीसी, एईआरबी और ईपीआर जैसे क्षेत्रों में विनियामक परामर्श सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।
बाजार में सफल प्रवेश के लिए प्रमाणित उत्पाद की प्राथमिकता
भारत में नवाचार से भरे विचारों वाले उद्यमियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता केवल उसी उद्यम को मिलती है जो प्रोटोटाइप से आगे बढ़कर पूरी तरह प्रमाणित और कानूनी रूप से सुरक्षित उत्पाद बाजार में उतारता है। सरकारी योजनाओं जैसे स्टार्टअप इंडिया और सीड फंड स्कीम का अधिकतम लाभ उठाते हुए पूंजी की व्यवस्था करना और साथ ही अनिवार्य परीक्षण मानकों को बिना किसी चूक के पूरा करना ही किसी नए कारोबार को टिकाऊ बनाता है। जब कोई उत्पाद सभी तकनीकी मानकों, सर्टिफिकेशन और सरकारी स्वीकृतियों की कसौटी पर खरा उतरकर बाजार में आता है, तो ग्राहकों के बीच उसका भरोसा मजबूत होता है और व्यावसायिक विकास की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं।



















