सड़क हादसों के दौरान कार में सवार लोगों की जिंदगी बचाने के लिए एयरबैग को आधुनिक ऑटोमोबाइल का एक बेहद अहम पैसिव सेफ्टी फीचर माना जाता है। टक्कर होते ही यह बेहद तेज गति से गुब्बारे की तरह फूल जाता है, जिससे आगे या बगल में बैठे मुसाफिर स्टीयरिंग व्हील, डैशबोर्ड या खिड़की की साइड से सीधे टकराने से बच जाते हैं। इस तकनीक ने अनगिनत जिंदगियां बचाई हैं, लेकिन सुरक्षा का यह दायरा तभी काम करता है जब कार के भीतर सही नियम अपनाए जाएं। गलत तरीके से बैठने, सुरक्षा बेल्ट नजरअंदाज करने या सिस्टम में किसी किस्म की तकनीकी गड़बड़ी होने पर यह सुरक्षा कवच खुद गहरी चोट और खतरे की वजह बन सकता है। एक लोकप्रिय एसयूवी में दुर्घटना के दौरान एयरबैग न खुलने के आरोपों के बाद इस पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली और जरूरी सावधानियों को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
वर्तमान समय में बिकने वाली अधिकांश गाड़ियों में फ्रंटल, साइड और कर्टेन एयरबैग का विकल्प सामान्य रूप से मिलने लगा है। ये सभी उपकरण आपात स्थिति में यात्रियों को गंभीर आघात से बचाने के लिए तैयार किए गए हैं, मगर जरा सी लापरवाही ड्राइवर और साथ बैठे सहयात्री दोनों के लिए भारी पड़ सकती है। यदि क्रैश के वक्त शरीर की मुद्रा सही न हो, तो एयरबैग के अप्रत्याशित दबाव से हड्डियों और मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है। इस जोखिम को पूरी तरह टालने और इस तकनीक का सही लाभ उठाने के लिए सफर के दौरान कुछ बुनियादी आदतों पर अमल करना बेहद जरूरी है।
सीटबेल्ट लगाना है सबसे अनिवार्य शर्त
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि कार में एयरबैग मौजूद है तो सीटबेल्ट की आवश्यकता नहीं रह जाती, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। तकनीकी नजरिए से सीटबेल्ट एक एक्टिव सेफ्टी सिस्टम है, जबकि एयरबैग पैसिव सेफ्टी श्रेणी में आता है। एयरबैग का डिजाइन इस तरह तैयार किया जाता है कि वह सीटबेल्ट के साथ मिलकर ही काम करे। यदि कोई व्यक्ति बिना बेल्ट लगाए बैठा है और अचानक टक्कर होने पर एयरबैग तेजी से खुलता है, तो आगे की ओर झटका खा रहा शरीर किसी मुक्केबाजी बैग की तरह उछलकर सीधे एयरबैग से जा टकराएगा। इस भीषण टकराव से गर्दन, सिर और चेहरे पर जानलेवा असर पड़ सकता है। अगली सीट पर सफर करते वक्त हमेशा सुरक्षा बेल्ट लॉक रखें, क्योंकि यही एकमात्र उपाय है जो एयरबैग से लगने वाले भारी झटके से शरीर को सुरक्षित रखता है।
स्टीयरिंग और डैशबोर्ड से रखें 10 इंच का फासला
ड्राइविंग सीट पर बैठने वाले व्यक्ति और बगल के पैसेंजर दोनों के लिए अपनी कुर्सी की स्थिति सही रखना अनिवार्य है। तकनीकी सिफारिशों के मुताबिक, ड्राइवर की छाती और स्टीयरिंग व्हील के बीच कम से कम 10 इंच की खाली जगह होनी चाहिए। सीट को इस तरह पीछे सरकाकर सेट करना चाहिए जिससे शरीर स्टीयरिंग से बहुत ज्यादा सटा हुआ न रहे। ऐसा करने से एयरबैग को अपने पूरे आकार में फैलने के लिए पर्याप्त जगह और समय मिल जाता है। यदि कोई स्टीयरिंग या डैशबोर्ड के एकदम करीब बैठकर गाड़ी चलाता है, तो एयरबैग खुलते समय उसका पहला तीव्र प्रहार सीधे चेहरे अथवा सीने पर पड़ता है, जिससे आंतरिक रक्तस्राव या फ्रैक्चर जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
स्टीयरिंग व्हील पर हाथों की 9 और 3 बजे वाली पकड़
गाड़ी चलाते समय स्टीयरिंग पर हाथ रखने का तरीका भी चोट से बचने में बड़ी भूमिका निभाता है। स्टीयरिंग को हमेशा घड़ी की सुइयों के अनुसार 9 और 3 बजे की स्थिति में दोनों तरफ से पकड़ना चाहिए। पुराने दौर में सिखाई जाने वाली 10 और 2 बजे की मुद्रा अब आधुनिक एयरबैग वाली गाड़ियों के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। 10 और 2 की स्थिति में हाथ रखने पर जब एयरबैग बीच से विस्फोटक गति से निकलता है, तो ड्राइवर के हाथ झटके से उछलकर रियर व्यू मिरर या गाड़ी के ए-पिलर से टकरा सकते हैं। इससे कलाई टूटने या बांह में गहरी चोट लगने का अंदेशा बढ़ जाता है। इसके अलावा, हाथों को स्टीयरिंग के बीच वाले हिस्से से हमेशा दूर रखना चाहिए ताकि एयरबैग के खुलने का रास्ता बाधित न हो।
दरवाजे या खिड़की से सटकर बैठने से बचें
जिन गाड़ियों में साइड और कर्टेन एयरबैग लगे होते हैं, उनमें खिड़की या दरवाजे के पैनल पर सिर टिकाकर अथवा झुककर बैठना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। साइड से टक्कर होने पर यह एयरबैग पलक झपकते ही बाहर आता है। यदि कोई यात्री दरवाजे के बहुत नजदीक सटा हुआ बैठा है या खिड़की पर कोहनी रखकर झुका हुआ है, तो एयरबैग सीधे उसके सिर या पसलियों पर वार कर सकता है। ऐसे में जीवन रक्षक फीचर ही चोट का बड़ा कारण बन जाता है। इस खतरे से बचने के लिए हमेशा अपनी सीट के बीच में पीठ सीधी करके बैठना चाहिए और दरवाजों से उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए, जिससे साइड एयरबैग को सुरक्षित रूप से तैनात होने का पूरा स्थान मिल सके।
डैशबोर्ड पर पैर रखने की गलती कभी न करें
लंबे सफर के दौरान आगे की सीट पर बैठने वाले सहयात्री अक्सर आराम पाने के लिए अपने पैर डैशबोर्ड पर रख लेते हैं, जो अत्यंत घातक आदत है। डैशबोर्ड के भीतर पैसेंजर साइड एयरबैग छिपा होता है। टक्कर की स्थिति में जब यह हजारों न्यूटन के बल के साथ खुलता है, तो उस पर रखे पैर या घुटने भयानक रूप से मुड़कर चेहरे अथवा कूल्हे से टकरा सकते हैं, जिससे हमेशा के लिए अपंगता हो सकती है। इसके अलावा, छोटे बच्चों को कभी भी अगली सीट पर नहीं बैठाना चाहिए। फ्रंट एयरबैग का तीव्र धमाका बच्चों के नाजुक शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। छोटे बच्चों को हमेशा पिछली सीट पर स्थापित की गई उपयुक्त चाइल्ड सीट में बैठाकर ही सफर करना चाहिए। ये छोटी सावधानियां हादसे के वक्त पूरे परिवार की सलामती सुनिश्चित करती हैं।


















