पटना के कदमकुआं इलाके में स्थित अत्याधुनिक वेंडिंग मार्केट आज अपनी बदहाली और ग्राहकों के सन्नाटे से जूझ रहा है। फरवरी 2025 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने करीब 9 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बनी इस दो मंजिला इमारत का बड़े तामझाम के साथ उद्घाटन किया था। पटना नगर निगम द्वारा तैयार इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य उन छोटे फल और सब्जी विक्रेताओं को एक गरिमामय, व्यवस्थित और सुरक्षित छत मुहैया कराना था, जो लंबे समय से सड़कों और पटरियों पर अतिक्रमण कर व्यापार करने को मजबूर थे।
सपनों का बाजार और हकीकत का सन्नाटा
उद्घाटन के बाद एक साल का वक्त बीत चुका है और यह मार्केट अब पूरी तरह क्रियाशील है। नगर निगम प्रशासन इस मॉडल की सफलता से इतना उत्साहित है कि वे शहर के अन्य हिस्सों में भी 31 नए वेंडिंग जोन बनाने की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं। इन नए केंद्रों के लिए जमीन चयन का काम जारी है। लेकिन अगर आप इस मार्केट के भीतर मौजूद दुकानदारों से बात करेंगे, तो आपको विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का कड़वा अंतर साफ नजर आएगा।
सुविधाएं भरपूर लेकिन बिक्री नदारद
इस मार्केट में बिजली, पंखे, रौशनी और सामान व्यवस्थित रखने के लिए बेहतरीन बुनियादी ढांचा मौजूद है। विक्रेता इस बात को स्वीकार करते हैं कि पहले के मुकाबले अब उन्हें कड़ी धूप, तेज बारिश और उड़ती धूल से मुक्ति मिल गई है। एक व्यवस्थित दुकान में बैठने से उन्हें एक पहचान मिली है, लेकिन उनके चेहरों पर सुकून नहीं, बल्कि आर्थिक चिंता साफ दिखती है। फल विक्रेता कन्हैया गुप्ता के अनुसार, उनकी कमाई का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है।
बाहर के ठेलों से जूझता अंदर का व्यापार
समस्या की जड़ मार्केट के बाहर सड़क पर फिर से सक्रिय हो गए अवैध ठेले हैं। शाम होते ही जब आम ग्राहक खरीदारी के लिए बाहर निकलते हैं, तो वे वेंडिंग मार्केट के भीतर जाने के बजाय सड़क किनारे लगे ठेलों से ही सब्जियां और फल खरीदकर निकल जाते हैं। कन्हैया गुप्ता का कहना है कि उनके पुराने ग्राहक भी अब बाहर से ही सौदा कर लेते हैं, जिससे मार्केट के अंदर सन्नाटा पसरा रहता है। आलम यह है कि कई दुकानदार मजबूरन अपनी दुकान को अंदर छोड़कर शाम के समय बाहर ठेला लगाने को विवश हो गए हैं।
वेंडिंग जोन या सन्नाटा पसरा अस्पताल
दुकानदारों की हताशा का स्तर इसी से समझा जा सकता है कि वे इसे 'वेंडिंग अस्पताल' का नाम दे रहे हैं। विक्रेता राजेश कुमार का कहना है कि दिनभर पंखे के नीचे बैठकर सिर्फ मोबाइल पर फिल्में देखकर समय काटना पड़ता है। उनके लिए धूप और बारिश से बचाव तो है, लेकिन पेट भरने की कोई गारंटी नहीं बची है। दुकानदारों का दर्द है कि बाहर से दिखने में यह इमारत भले ही बेहद शानदार और गुलाब के फूल जैसी सुंदर लगती हो, लेकिन अंदर बैठे व्यापारियों के लिए यह कांटों भरा जीवन बन गया है।
अतिक्रमण और प्रशासनिक विफलता का चक्र
नगर निगम समय-समय पर अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाता है, लेकिन यह केवल एक रस्मी कार्यवाही बनकर रह जाती है। जैसे ही नगर निगम की टीम वहां से हटती है, सड़क पर फिर से ठेलों का जमावड़ा लग जाता है। दुकानदारों का मानना है कि जब तक सड़क पर बिकने वाले ठेलों पर पूरी तरह सख्ती नहीं बरती जाएगी, ग्राहक अंदर आने की जहमत नहीं उठाएंगे।
पिंक मार्केट का खाली पड़ा हिस्सा
मार्केट की संरचना के अनुसार, ग्राउंड फ्लोर पर फल और सब्जी विक्रेताओं को जगह दी गई है, जबकि पहली मंजिल को 'पिंक मार्केट' के रूप में विकसित किया जाना था। हालांकि, एक साल बाद भी पहली मंजिल की स्थिति यह है कि वहां किसी भी दुकान का आवंटन नहीं हो सका है और पूरा फ्लोर खाली पड़ा है। बाजार की भव्यता और खालीपन का यह दृश्य विकास के दावों पर सवालिया निशान लगाता है।











