मुर्गी पालन के क्षेत्र में सफलता इस बात पर टिकी है कि आप मुर्गियों का प्रबंधन किस वैज्ञानिक तरीके से कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के पशु चिकित्सा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ विपिन कुमार के अनुसार, पोल्ट्री व्यवसाय मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है, जिनमें बॉयलर मुर्गियां, जिनका उद्देश्य मांस उत्पादन है, और लेयर मुर्गियां, जिन्हें मुख्य रूप से अंडे प्राप्त करने के लिए पाला जाता है। इन दोनों प्रकार की मुर्गियों की शारीरिक और उत्पादन संबंधी आवश्यकताएं अलग होती हैं, इसलिए इनके लिए तय की गई जगह का पैमाना भी भिन्न होता है।
जगह का सही चयन
बॉयलर नस्ल की मुर्गियों के लिए यदि आप डीप लिटर सिस्टम का उपयोग कर रहे हैं, तो प्रत्येक पक्षी को रहने के लिए कम से कम 1 वर्ग फीट का स्थान देना अनिवार्य है। लेयर मुर्गियों के मामले में प्रबंधन थोड़ा अलग हो जाता है। यदि लेयर मुर्गियों को डीप लिटर सिस्टम में रखा जा रहा है, तो उन्हें प्रति पक्षी 1.5 से 2 वर्ग फीट जगह चाहिए। वहीं, यदि आप आधुनिक केज सिस्टम यानी पिंजरा पद्धति अपनाते हैं, तो लेयर मुर्गियों को प्रति पक्षी 0.5 से 0.8 वर्ग फीट स्थान देना पर्याप्त माना जाता है।
पोल्ट्री हाउस का वैज्ञानिक डिजाइन
डॉ विपिन कुमार का सुझाव है कि फार्म का निर्माण करते समय वैज्ञानिक मानकों का पालन करना चाहिए। सबसे पहले, फार्म की जमीन को सतह से 1.5 से 2 फीट ऊपर उठाना चाहिए, ताकि फर्श में नमी न आए और स्वच्छता बनाए रखने में आसानी हो। फार्म की साइड वॉल की ऊंचाई 6 से 7 फीट होनी चाहिए, जबकि भवन के मध्य यानी सेंटर की ऊंचाई 10 से 12 फीट रखी जानी चाहिए। इस तरह का ढांचा बेहतर वेंटिलेशन यानी हवा के प्रवाह के लिए सबसे उपयुक्त होता है, जो पक्षियों के स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, एक आदर्श पोल्ट्री फार्म की चौड़ाई 22 से 25 फीट के बीच रखनी चाहिए, जिससे ताजी हवा का आवागमन बना रहे।
सुरक्षा के उपाय और फार्म दूरी
बीमारियों के प्रसार को रोकने के लिए फार्मों के बीच उचित दूरी रखना बेहद जरूरी है। यदि आप एक से अधिक पोल्ट्री यूनिट संचालित कर रहे हैं, तो दो फार्मों के बीच 50 से 100 फीट की दूरी का अंतर जरूर रखें। यह दूरी किसी भी प्रकार के संक्रामक वायरस को एक फार्म से दूसरे तक फैलने से रोकने में मददगार साबित होती है। सही वैज्ञानिक मानकों और उचित जगह के प्रबंधन से मुर्गी पालन व्यवसाय न केवल अधिक सुरक्षित हो जाता है, बल्कि किसी भी प्रकार के विपरीत समय या बीमारी के प्रकोप के दौरान होने वाले संभावित नुकसान को भी न्यूनतम किया जा सकता है।











