खरीफ सीजन शुरू होते ही खरगोन जिले के खेतों में सोयाबीन की बुवाई ने रफ्तार पकड़ ली है। यहां कपास के बाद सोयाबीन को सबसे अहम फसल के तौर पर देखा जाता है, इसलिए किसान अच्छी पैदावार की आस लिए दिन रात खेतों में जुटे हैं। लेकिन जानकार आगाह कर रहे हैं कि बुवाई के वक्त की गई एक मामूली सी चूक पूरी मेहनत पर पानी फेर सकती है। इस बार कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से उन्हीं पुरानी गलतियों से बचने की अपील की है, जो हर साल नुकसान की वजह बनती हैं।
सबसे आम गलती कहां हो रही है
विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़ी संख्या में किसान आज भी दशकों पुराने ढर्रे पर ही खेती कर रहे हैं। इनमें सबसे बड़ी भूल है बुवाई के समय बीज और खाद दोनों को एक साथ खेत में डाल देना। इसका सीधा असर बीज के अंकुरण और पौधों की शुरुआती बढ़त पर पड़ता है। नतीजा यह होता है कि कई जगह पौधे कमजोर रह जाते हैं और उपज उम्मीद से कहीं कम निकलती है।
क्यों खतरनाक है बीज और खाद को मिलाना
खरगोन के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह के मुताबिक सोयाबीन बेहद नाजुक फसल है और इसकी खेती में जरा सी लापरवाही भारी पड़ सकती है। उन्होंने बताया कि कई किसान बुवाई के दौरान उर्वरक को सीधे बीज में मिला देते हैं, जिसका बीज पर उल्टा असर होता है। कई बार तो बीज जल तक जाते हैं या उनका अंकुरण ही प्रभावित हो जाता है। उनकी सलाह है कि किसानों को बुवाई के समय खास सतर्कता बरतनी चाहिए और बीज तथा उर्वरक को कभी आपस में मिलाकर नहीं डालना चाहिए, वरना फसल की शुरुआती ग्रोथ बिगड़ती है और आगे चलकर पैदावार घट जाती है।
सोयाबीन में खाद डालने का सही तरीका
डॉ. सिंह बताते हैं कि सबसे सही तरीका यह है कि बुवाई से पहले ही खेत में पूरी मात्रा में उर्वरक डाल दिया जाए और उसके बाद ही बीज बोए जाएं। ध्यान देने वाली बात यह है कि जितनी खाद डालनी हो, वह एक ही बार में पूरे खेत में डाल देनी चाहिए। बाद के इस्तेमाल के लिए उर्वरक बचाकर रखने से पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता। विशेषज्ञों का कहना है कि खाद का सही प्रबंधन होने पर सोयाबीन की फसल मजबूत होती है और उत्पादन भी बढ़िया मिलता है। इसके साथ ही खेत की नमी बनाए रखना और तय समय पर खरपतवार पर काबू पाना भी उतना ही जरूरी है।
अब बदलनी होगी खेती की पुरानी सोच
डॉ. सिंह का मानना है कि किसानों को अब पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके अपनाने होंगे। आधुनिक तकनीक और सही सलाह के सहारे खेती की जाए तो लागत घटती है और पैदावार बढ़ती है। खासकर सोयाबीन जैसी संवेदनशील फसल में अगर शुरुआत में ही पूरी सावधानी रखी जाए, तो बेहतर उपज के साथ अच्छा मुनाफा भी कमाया जा सकता है।













